एकमात्र समाधान : पूंजीवाद से मुक्ति

टीचिंग तो हो रही पर लर्निंग नही हो रही है, क्योंकि हमारी वर्तमान शिक्षा व्यवस्था विरोधाभासों से भरी है। एक तरफ तो हम विद्यार्थी को सिखा रहे हैं 'विद्या ददाति विनयम', तो दूसरी ओर हम उसे सबसे आगे रहने के लिए कह रहे हैं; किसी भी कीमत पर टॉप करने के लिए कह लिए कह रहे हैं। 

उपरोक्त बातें दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने दिल्ली के स्कूलों के अध्यापकों के एक सम्मेलन में कहीं। बातें बिल्कुल सही हैं। ऐसी ही बातें आमिर खान ने अपनी फिल्मों -- जैसे 'तारे जमीन पर' और 'थ्री इडियट्स' -- के जरिये कहने की कोशिश की है। किसी भी कीमत पर सफलता पाने की होड़ माता-पिता में और उनके माध्यम से बच्चों में इतनी बढ़ चुकी है कि असफलता की स्थिति में वे आत्महत्या तक कर रहे हैं। हर साल दसवीं और बारहवीं के परीक्षा परिणाम के बाद आत्महत्या की ख़बरें आम बात हो चुकी है। राजस्थान के कोटा शहर में, जहां देशभर से बच्चे विभिन्न कोचिंग सेंटर्स में इंजीनियरिंग व मेडिकल कालेजों में प्रवेश के लिए प्रतियोगिता परीक्षाओं की तैयारी के लिए जाते हैं, हर साल गलाकाट होड़ से पैदा हुए तनाव की भेंट चढ़ते हैं। कोटा में 2013-2017 तक 58 विद्यार्थियों ने आत्महत्या की। अभी दिसम्बर 2018  में चार दिन के भीतर 3 विद्यार्थियों ने आत्महत्या कर ली। यह सिर्फ एक शहर की कहानी है। 

विश्वभर में वर्तमान शिक्षा व्यवस्था इतनी दोषपूर्ण हो चुकी है कि यह दोष बड़े बुद्धिजीवियों और चिंतकों को ही नही बल्कि आम अभिभावकों को भी नज़र आने लगे हैं, और यही कारण है कि अमेरिका जैसे देश में  -- जहां के स्कूल-कॉलेज में अपने बच्चों को पढ़ने के लिए भेजने में ज्यादातर अभिवावक गर्व का अनुभव करेंगे -- दस लाख से ज्यादा परिवार अपने बच्चों को स्कूल नही भेजते। अमेरिका समेत कई देशों में शिक्षित एवं जागरूक माता-पिता 'अनस्कूलिंग' या 'होमस्कूलिंग' के आंदोलन के साथ जुड़ रहे हैं। भारतवर्ष में भी 10 हज़ार से अधिक शिक्षित परिवार अपने बच्चों को स्कूल नही भेज रहे हैं, और यह संख्या तेजी से बढ़ रही है। 

लेकिन क्या शिक्षा व्यवस्था के दोषों को मात्र पाठ्यक्रम, पाठ्यपुस्तक, अध्यापकों या  पढ़ाने के ढंग को बदल देने भर से दूर किया जा सकता है? कतई नहीं ! क्योंकि इन दोषों की जड़ शिक्षा व्यवस्था ने नहीं, बल्कि हमारी अर्थव्यवस्था में है। 

इसमें कोई दो राय नही है कि शिक्षा का उद्देश्य प्रत्येक व्यक्ति को सही अर्थ में मनुष्य बनाना है, नाकि होड़ लगाने वाली हृदयविहीन मशीन। लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि किसी भी शिक्षा प्रणाली का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य है :  व्यक्ति में ऐसा कौशल पैदा करना जिसके माध्यम से वह उपयुक्त रोज़गार प्राप्त कर सके। लेकिन, आज स्थिति यह है कि आप कोई भी विषय पढ़ लें या कोई भी कोर्स कर लें, इस बात कि कोई गारंटी नहीं है कि आप कोई रोज़गार प्राप्त कर पाएंगे। क्योंकि बेरोज़गारी अपने चरम पर है। देश में 368 चपरासी के पदों के लिए 23 लाख लोग तक आवेदन कर देते हैं, जिनमें पीएचडी और इंजिनीयर तक शामिल हैं। एक करोड़ नौकरियां हर साल पैदा  करने के वादे के साथ आई सरकार के शासन में एक करोड़ से ज्यादा रोज़गार खत्म किये जा चुके हैं। 

केंद्र सरकार और राज्य सरकारें रोज़गार पैदा करने में पूरी तरह असमर्थ है और इसलिए बेरोज़गारों को 'जॉब सीकर' की बजाय 'जॉब क्रिएटर' बनने की सलाह दे रही है। यानी रोज़गार ढूंढों मत, रोज़गार दो। दूसरी ओर, एससी, एसटी, ओबीसी, पटेल,मराठा,जाट, सवर्ण आक्षण आदि के नाम पर बची-खुची नौकरियों को झपटने के लिए खूनी लड़ाइयां लड़ी जा रहीं हैं। निजी क्षेत्र में भी रोज़गार बढ़ने के स्थान पर छंटनी बढ़ रही है। एप्पल जैसी बड़ी कंपनियों ने अपनी बिक्री में भारी कमी के संकेत देकर आने वाले दिनों में बड़ी वैश्विक मंदी के संकेत दे दिए हैं।  जिन्हे रोज़गार मिला हुआ है, उन्हें पूरा वेतन नहीं मिल रहा है।  8 और 9 जनवरी को पूरे भारतवर्ष में श्रमिकों की हड़ताल हुई। श्रमिकों की बड़ी मांग यह थी कि न्यूनतम वेतनमान लागू करवाया जाए। नौकरियों की कमी और मजदूरों की अधिकता के कारण पूंजीपति उनका आसानी से शोषण कर रहे हैं। 

इन परिस्थितियों में अगर माता-पिता और शिक्षक बच्चों पर दबाव बढ़ा कर उन्हें किसी भी तरह सफल होने का दबाव बढ़ा रहे हैं, तो वे बिल्कुल दोषी नहीं है। दोषी है तो यह पूंजीवादी अर्थव्यवस्था, जो स्वार्थ, भोगवाद, मुनाफाखोरी, धनसंग्रह और आर्थिक विषमता को बढ़ावा देकर रोज़गार के अवसरों को कम से कम करती जा रही है। शिक्षाव्यवस्था, शिक्षक और माता-पिता ऐसी अर्थव्यवस्था में अपने शिक्षार्थियों या बच्चों को फिट करने के लिए मजबूर हैं; न चाहते हुए भी, वे  उन्हें इस अंधी चूहादौड़ में झोंक रहे हैं। 

इसलिए जो शिक्षा व्यवस्था में सुधार चाहते हैं; जो अपने बच्चों के लिए रोज़गार चाहते हैं; जो मज़दूरों-श्रमिकों को उनका अधिकार दिलाना चाहते हैं और सबके लिए शोषणरहित एवं सुखदायक समाज चाहते हैं, उन्हें यह समझ लेना चाहिए कि पूंजीवादी व्यवस्था में रहते हुए उनकी ईच्छा पूरी नहीं हो सकती।  इस व्यवस्था द्वारा सुझाया गया कोई भी समाधान मात्र एक मरीचिका है।  अगर वे समाधान चाहते हैं, तो उन्हे अपने सभी भय,पूर्वाग्रहों,आशंकाओं तथा पाखंड को त्याग कर एक कंठ से घोषणा करनी होगी कि उन्हें पूंजीवाद स्वीकार नहीं है। उन्हें इसका विकल्प ढूँढना होगा।  

प्राउटिष्टों के लिए यह सुनहरा अवसर है, क्योंकि विकल्प उनके पास है। वे इसे अपने तक ही सीमित रख कर पाप का भागी न बनें !

 -- रवीन्द्र सिंह

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