हिटलर को जानना क्यों जरूरी है ?


हिटलर ने जर्मन लोगों को एकजुट करने के प्रयास में नस्लवाद का इस्तेमाल किया और... उसके दृष्टिकोण के परिणामस्वरूप विश्व युद्ध और जर्मनी का लगभग विनाश हुआ।

श्री प्रभात रंजन सरकार 

(कणिका में प्रउत-२१)

        

भारत में आम बोलचाल की भाषा में ‘हिटलर’ शब्द ख़ूब इस्तेमाल होता है । ख़ास तौर से एक विशेषण के तौर पर । यदि कोई यहाँ अपनी ज़िद पर अड़ना अपनी आदत बना लेता है और अपनी राय को ही आख़िरी फ़ैसला समझता है , तो हम इसे ‘हिटलर’ के विशेषण से नवाज़ देते हैं। भारत की राजनीति में भी यदा- कदा नेता एक दूसरे को ‘हिटलर’ कहते रहे हैं। क्या यह इतनी सामान्य बात है कि बातचीत में ही सही ,किसी को हिटलर कह दिया जाए । इसलिए मैने सोचा कि हिटलर के उन निजी पक्षों पर लिखता हूँ ,जो आम जनता में ज़्यादा चर्चित नहीं हैं । फिर आप ख़ुद तय कीजिएगा कि किसे हिटलर कहना है किसे नहीं ।

20 अप्रैल, 1889 को ऑस्ट्रिया में जन्मा हिटलर 1919 में सेना छोड़ कर नाजी पार्टी बना लेता है । जर्मनी तब पहले विश्वयुद्ध से जन्मी विश्वव्यापी आर्थिक मंदी की मार झेल रहा था । बढ़ती बेरोज़गारी से जनता परेशान थी । ऊपर से अपमान का एहसास कराती वर्साय की संधि । हिटलर ने अपने जोरदार भाषणों द्वारा देश की अर्थव्यस्था को ठीक करने की बात कही । जर्मन गौरव की वापसी की बात कही । वह साम्यवादियों और यहूदियों के ख़िलाफ़ नफ़रत फैलाते हुए 1933 में जर्मनी का चांसलर बन बैठा । इसके बाद शुरू हुआ, उसका दमन चक्र ।


हिटलर इस बात की खूब निगरानी करता था कि लोग उसका प्रॉपेगैंडा किसी भी तरीके से सुन रहे हैं या नहीं । वह अपने मन की बातों को मास कंटेंट बना कर रेडियो प्रोग्राम बनाता । चर्चित मास मीडिया की जरिये उसकी झूठी तारीफ़ें घर- घर तक पहुंचाई जाती । लोग रेडियो के जरिये फैलायी जा रही इन झूठी अफवाहों को सुन रहे हैं या नही, यह जांचने के लिए रेडियो वार्डेन रखे जाते थे। यह एक तरह से मीडिया मिसयूज़ करती हुई कम्यूनिकेशन की ‘हाइपर निडल थ्योरी’ थी । जनता को झूठी सूचनाएँ, अफ़वाहें लगातार इंजेक्ट की जा रही थीं और लोग हज़ार बार कहे गए झूठ को ही ‘सच’ समझने लगे थे। हिटलर ने सही सूचनाओं के सारे माध्यम काट दिए थे और ज़िम्मेदार पदों पर उन कठपुतलियों को बैठा रखा था, जिन्हें मैनेज करना आसान था ।


वह सेना और राष्ट्र के नाम पर लोगो से अपनी पार्टी के लिए समर्थन मांगा करता था। हर वर्ग के लिए अलग-अलग वादे जिनका तार्किकता से कोई लेना- देना नही। उसके चुनावी पोस्टरों में सिर्फ उसकी तस्वीरे होती थी। पार्टी के भीतर या बाहर उसी की चलती थी। मासूम लोग ‘मजबूत नेता की चाह’ और विकल्प न होने की बात करते हुए एक फासिस्ट नेता के चंगुल में किस तरह फँसते गए , लोगों को पता नहीं चला । सेना की शहादत का हिटलर ने जम कर इस्तेमाल किया और जर्मनी को एक – दूसरे से नफरत की प्रयोगशाला बना दिया। यहूदियों और साम्यवादियों के ख़िलाफ़ उसने इस तरह से ज़हर फैलाया कि लोगों को लगा कि जर्मनी की सारी समस्याओं के यही दोषी हैं । जर्मन लोग ऐसे बहके, कि जब जर्मनी को होश आया तब तक हिटलर जर्मनी तबाह कर अपनी प्रेमिका इवा ब्रान के साथ सुसाइड कर चुका था। 

कहते हैं कि औरते उस दौरान उसे एक नेता के तौर पर पसन्द करती थीं। लेकिन उसकी पार्टी में एक भी महिला डिप्टी नही थी। वह औरतों को सिर्फ बच्चे पैदा करने और पति को आत्मीयता से रोटी बना कर खिलाने की मशीन समझता था। वह भाषण देते हुए अक्सर कलाइयों का इस्तेमाल करता और अपनी आंखें मटकाता। यह कला उसने बेहद रियाज से सीखी थी। क्योंकि वह जानता था कि जनता उसे किस तरह अपना शहंशाह मान सकती है ।

वह शाकाहारी था। शाकाहार का हिमायती भी । वह महंगी सब्जियां खाता था। विडम्बना देखिए , जानवरो को नहीं मारने के उसने कठोर नियम बनाये थे लेकिन 60 लाख से ज्यादा इंसानों का कत्ल करवा दिया।उसके राष्ट्रवाद का आधार सिर्फ़ नफ़रत थी , जिसे वह अपने ही देश के ही एक वर्ग के ख़िलाफ़ फैलाया करता था । आम तौर पर चतुर तानाशाहों ने अपनी ज़मीन बचाने के लिए अपने ही देश के एक छोटे हिस्से को ‘बड़े वर्ग’ के ख़िलाफ़ खड़ा कर दिया । ऐसा करने पर देखा गया है लोग बुनियादी समस्याओं से ध्यान हटा कर हवाई मुद्दों के आधार पर उस ‘चालाक नेता’ को अपना समर्थन देते रहते हैं ।

सत्ता हासिल करने के बाद हिटलर ने युद्ध को ही अपना आगे का रास्ता चुना । युवा आबादी को सैन्य आबादी में बदल दिया । सारी जर्मन जाति को सैनिक प्रशिक्षण देने का आदेश दिया । पहले विश्वयुद्ध में थोपी गयी संधियों की अहवेलना करके उसने पड़ोसी देशों पर आक्रमण कर दिए । इस वजह से 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध भड़क उठा, जिसने पूरी दुनिया को न सिर्फ़ हिला दिया ,बल्कि दुनिया के सोचने का तरीक़ा भी हमेशा -हमेशा के लिए बदल दिया । जर्मनी की हार के साथ हिटलर भी अब हार महसूस करने लगा था । 30 अप्रैल, 1945 को हिटलर ने आत्महत्या कर ली । तो ये था उस तानाशाह का अंत , जिसका आधार था उन्मादी राष्ट्रवाद और नफ़रत । जर्मनी अपने उस अतीत पर , जहाँ लाखों बेगुनाहों का ख़ून बहा है, आज पछता रहा है । लेकिन आज भी हर देश में एक ऐसा वर्ग है जो सांप्रदायिक बँटवारे, उग्र राष्ट्रवाद और बेलगाम पूँजीवाद में यक़ीन रखता है  और जिसका पुरजोर विरोध करने की सख्त जरुरत है !


  लेखक: आशुतोष तिवारी



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