वर्तमान केंद्र सरकार ग्रेट निकोबार द्वीप पर एक तथाकथित "बड़ी विकाश परियोजना" को आगे बढ़ा रही है। उसे प्रगति का प्रतीक बताया जा रहा है। लेकिन जो लोग पर्यावरण की रक्षा की बात करते हैं, और जो लोग मानव अधिकारों को सबसे ऊपर रखते हैं, उनकी नज़र में यह परियोजना बहुत खतरनाक है। यह दक्षिण एशिया के आखिरी बचे हुए घने उष्णकटिबंधीय जंगलों में से एक को पूरी तरह मिटा देने की योजना है। और यह विनाश हमारे देश में होने वाले सबसे बड़े विनाशों से एक है।
ग्रेट निकोबार कोई साधारण "जंगल की ज़मीन" नहीं है। यह एक जीवित, साँस लेता हुआ, अद्भुत प्राकृतिक चमत्कार है – बेहद समृद्ध और दुर्लभ। यह द्वीप 'इंडो-बर्मा जैव विविधता हॉटस्पॉट' नामक बेहद खास क्षेत्र में आता है। यहाँ के जंगल पुराने और घने हैं। इसका मतलब है कि ये पेड़-पौधे और जीव-जंतु हजारों सालों से बिना किसी बड़े मानवीय हस्तक्षेप के विकशित हुए हैं।
ये जंगल कार्बन का बड़ा भंडार भी हैं
इस तरह के घने उष्णकटिबंधीय जंगल अपने ऊपरी हिस्से और मिट्टी दोनों में बहुत अधिक मात्रा में कार्बन जमा करते हैं। ये जलवायु परिवर्तन के खिलाफ प्राकृतिक ढाल का काम करते हैं। अगर इन्हें नष्ट कर दिया जाए, तो यह कार्बन हवा में घुल जाएगा, और इसे वापस जमा होने में सैकड़ों साल लग जाएँगे। ये जंगल पानी को भी संतुलित रखते हैं। ये बारिश के पैटर्न को नियंत्रित करते हैं, ज़मीन के नीचे पानी भरते हैं, और मिट्टी को बहने से रोकते हैं। यह चक्रवात और सुनामी से पीड़ित इस द्वीप के लिए बहुत ज़रूरी है।
अनमोल जैव विविधता का खज़ाना
वैज्ञानिकों ने बार-बार कहा है कि यहाँ की कई प्रजातियाँ अभी भी दर्ज नहीं हैं, यहाँ तक कि विज्ञान इन्हें जानता तक नहीं है। इस बिल्कूल अछूये जंगल को नष्ट करने का मतलब है – औषधियों, पारिस्थितिकी और विकाश से जुड़े उस ज्ञान को हमेशा के लिए मिटा देना जिसकी हमें इस बदलती जलवायु के दौर में बहुत ज़रूरत पड़ सकती है।
यहाँ कई ऐसी प्रजातियाँ हैं जो दुनिया में और कहीं नहीं मिलतीं। जैसे:
- निकोबार मेगापोड – यह एक ज़मीन पर रहने वाला पक्षी है। यह जंगल के कूड़े-करकट से बहुत बड़े ढेर बनाता है, जिनमें यह अपने अंडे सेता है।
- विशाल लेदरबैक समुद्री कछुआ – यह गलाथिया खाड़ी में अंडे देता है। यह हिंद महासागर के सबसे ज़रूरी अंडे देने वाले स्थलों में से एक है।
- यहाँ के सरीसृप, मेंढक-मेंढकी, और कीड़े-मकोड़े दुनिया में कहीं और नहीं पाए जाते।
- यहाँ मूंगे की चट्टानें (कोरल रीफ) और मैंग्रोव के जंगल हैं। ये दोनों मिलकर ज़मीन और समुद्र को जोड़ने वाली एक लंबी श्रृंखला बनाते हैं।
यह जैव विविधता बदलने लायक नहीं है। यह अनमोल है।
हरियाणा के अरावली में पेड़ लगाने की बात – बिल्कुल बेतुकी
ग्रेट निकोबार में पेड़ काटने के बदले भारत सरकार ने हरियाणा के अरावली पहाड़ियों में पेड़ लगाने की बात कही है। यह बिल्कुल बेतुकी बात है, और इसमें बहुत बड़े भ्रष्टाचार की बू आती है। ग्रेट निकोबार और हरियाणा के अरावली – दोनों बिल्कुल अलग-अलग इकोसिस्टम (पारिस्थितिकी तंत्र) हैं। अरावली पहाड़ियाँ सूखे, विरल जंगल वाला इलाका है। उसकी तुलना ग्रेट निकोबार के घने उष्णकटिबंधीय जंगल से नहीं की जा सकती। जैव विविधता, कार्बन धारण करने की क्षमता, जलवायु नियंत्रण – इनमें कोई तुलना नहीं है।
जंगल से जुड़ा हुआ आदिवासी जीवन
ग्रेट निकोबार के मूल निवासी हैं – शोम्पेन और निकोबारी लोग। उनके लिए यह जंगल कोई "संसाधन" नहीं है। यह उनकी पहचान है, उनका पेट पालने का साधन है, उनकी संस्कृति है, उनका इतिहास है।
खासकर शोम्पेन लोग जंगल के अंदर ही छोटे-छोटे समूहों में, अर्ध-घुमंतू जीवन जीते हैं। पेड़-पौधों, जानवरों और मौसम के चक्र के बारे में उनका ज्ञान एक ऐसी पारिस्थितिकीय समझ है, जिसे आधुनिक विज्ञान अभी समझना शुरू ही कर रहा है। उनके आवास को तोड़ने का मतलब है – उनकी पूरी जीवन-दृष्टि को तोड़ देना।

इतिहास की सीख
इतिहास ने बार-बार दिखाया है कि जब ऐसे समुदायों पर तेज़ "विकाश" थोपा जाता है, तो उनमें बीमारियाँ फैलती हैं और उनकी आबादी तेज़ी से घटने लगती है। उनकी संस्कृति बिखर जाती है। अपने पैरों पर खड़े रहने वाले ये लोग आर्थिक रूप से कमज़ोर हो जाते हैं। कोई भी मुआवज़ा उस जीती-जागती संस्कृति के नुकसान की भरपाई नहीं कर सकता, जो ज़मीन से जुड़ी हुई है।
विनाश का पैमाना
इस परियोजना में क्या क्या प्रस्तावित है:
- लगभग 130–150 वर्ग किलोमीटर (लगभग 50 हज़ार टेनिस कोर्ट के बराबर) जंगल को हटाया जाएगा।
- लगभग 1 मिलियन (10 लाख) पेड़ काटे जाएँगे।
- एक विशाल जहाज़ी बंदरगाह (ट्रांशिपमेंट पोर्ट), हवाई अड्डा, बिजली संयंत्र और एक बड़ा शहर बनाया जाएगा।
लेकिन सिर्फ़ संख्याएँ पूरा नुकसान नहीं बता सकतीं। यह कोई चुनिंदा पेड़ काटने का काम नहीं है। यह पूरे जंगल के नक्शे को ही बदल डालने वाला काम है:
- सड़कें जंगल को टुकड़ों में काट देंगी, जिससे जानवर अलग-थलग पड़ जाएँगे।
- रोशनी, शोर और प्रदूषण पहले से अछूते इलाकों में भी घुस जाएगा।
- समुद्र के किनारे बनने वाली बड़ी दीवारें और बाँध मिट्टी और रेत के बहाव को बदल देंगे, जिससे मूंगे की चट्टानें और कछुओं के अंडे देने वाले समुद्री किनारे नष्ट हो जाएँगे।
और यह सब एक ऐसे इलाके में होगा, जहाँ भूकंप बहुत आते हैं, और जो 2004 की हिंद महासागर सुनामी को अब तक नहीं भूला है।
कमज़ोर आर्थिक तर्क
हमें बताया जा रहा है कि यह बलिदान इसलिए ज़रूरी है, ताकि भारत एक वैश्विक जहाज़ी अड्डा (ट्रांशिपमेंट हब) बना सके। हमें बताया जाता है कि हमें सिंगापुर और कोलंबो के बंदरगाहों से प्रतिस्पर्धा करनी है।
लेकिन यह दलील बहुत कमज़ोर है। वैश्विक व्यापार अब अनिश्चित दौर में है। भू-राजनीतिक तनाव, क्षेत्रीयकरण और धीमी वृद्धि ने सबको प्रभावित किया है। पहले से मौजूद बंदरगाह काफी कुशल हैं और जहाज़ों के नेटवर्क में गहरे जुड़े हुए हैं। इतने दूर, इतने नाज़ुक, भूकंप-प्रभावित द्वीप पर, बहुत बड़ी कीमत चुकाकर नया बंदरगाह बनाने की योजना, उसकी उपयोगिता पर बड़े सवाल खड़े करती है।

- विशाल लेदरबैक समुद्री कछुआ – यह गलाथिया खाड़ी में अंडे देता है। यह हिंद महासागर के सबसे ज़रूरी अंडे देने वाले स्थलों में से एक है।
- यहाँ के सरीसृप, मेंढक-मेंढकी, और कीड़े-मकोड़े दुनिया में कहीं और नहीं पाए जाते।
- यहाँ मूंगे की चट्टानें (कोरल रीफ) और मैंग्रोव के जंगल हैं। ये दोनों मिलकर ज़मीन और समुद्र को जोड़ने वाली एक लंबी श्रृंखला बनाते हैं।
यह जैव विविधता बदलने लायक नहीं है। यह अनमोल है।
हरियाणा के अरावली में पेड़ लगाने की बात – बिल्कुल बेतुकी
ग्रेट निकोबार में पेड़ काटने के बदले भारत सरकार ने हरियाणा के अरावली पहाड़ियों में पेड़ लगाने की बात कही है। यह बिल्कुल बेतुकी बात है, और इसमें बहुत बड़े भ्रष्टाचार की बू आती है। ग्रेट निकोबार और हरियाणा के अरावली – दोनों बिल्कुल अलग-अलग इकोसिस्टम (पारिस्थितिकी तंत्र) हैं। अरावली पहाड़ियाँ सूखे, विरल जंगल वाला इलाका है। उसकी तुलना ग्रेट निकोबार के घने उष्णकटिबंधीय जंगल से नहीं की जा सकती। जैव विविधता, कार्बन धारण करने की क्षमता, जलवायु नियंत्रण – इनमें कोई तुलना नहीं है।
जंगल से जुड़ा हुआ आदिवासी जीवन
ग्रेट निकोबार के मूल निवासी हैं – शोम्पेन और निकोबारी लोग। उनके लिए यह जंगल कोई "संसाधन" नहीं है। यह उनकी पहचान है, उनका पेट पालने का साधन है, उनकी संस्कृति है, उनका इतिहास है।
खासकर शोम्पेन लोग जंगल के अंदर ही छोटे-छोटे समूहों में, अर्ध-घुमंतू जीवन जीते हैं। पेड़-पौधों, जानवरों और मौसम के चक्र के बारे में उनका ज्ञान एक ऐसी पारिस्थितिकीय समझ है, जिसे आधुनिक विज्ञान अभी समझना शुरू ही कर रहा है। उनके आवास को तोड़ने का मतलब है – उनकी पूरी जीवन-दृष्टि को तोड़ देना।
इतिहास की सीख
इतिहास ने बार-बार दिखाया है कि जब ऐसे समुदायों पर तेज़ "विकाश" थोपा जाता है, तो उनमें बीमारियाँ फैलती हैं और उनकी आबादी तेज़ी से घटने लगती है। उनकी संस्कृति बिखर जाती है। अपने पैरों पर खड़े रहने वाले ये लोग आर्थिक रूप से कमज़ोर हो जाते हैं। कोई भी मुआवज़ा उस जीती-जागती संस्कृति के नुकसान की भरपाई नहीं कर सकता, जो ज़मीन से जुड़ी हुई है।
विनाश का पैमाना
इस परियोजना में क्या क्या प्रस्तावित है:
- लगभग 130–150 वर्ग किलोमीटर (लगभग 50 हज़ार टेनिस कोर्ट के बराबर) जंगल को हटाया जाएगा।
- लगभग 1 मिलियन (10 लाख) पेड़ काटे जाएँगे।
- एक विशाल जहाज़ी बंदरगाह (ट्रांशिपमेंट पोर्ट), हवाई अड्डा, बिजली संयंत्र और एक बड़ा शहर बनाया जाएगा।
लेकिन सिर्फ़ संख्याएँ पूरा नुकसान नहीं बता सकतीं। यह कोई चुनिंदा पेड़ काटने का काम नहीं है। यह पूरे जंगल के नक्शे को ही बदल डालने वाला काम है:
- सड़कें जंगल को टुकड़ों में काट देंगी, जिससे जानवर अलग-थलग पड़ जाएँगे।
- रोशनी, शोर और प्रदूषण पहले से अछूते इलाकों में भी घुस जाएगा।
- समुद्र के किनारे बनने वाली बड़ी दीवारें और बाँध मिट्टी और रेत के बहाव को बदल देंगे, जिससे मूंगे की चट्टानें और कछुओं के अंडे देने वाले समुद्री किनारे नष्ट हो जाएँगे।
और यह सब एक ऐसे इलाके में होगा, जहाँ भूकंप बहुत आते हैं, और जो 2004 की हिंद महासागर सुनामी को अब तक नहीं भूला है।
कमज़ोर आर्थिक तर्क
हमें बताया जा रहा है कि यह बलिदान इसलिए ज़रूरी है, ताकि भारत एक वैश्विक जहाज़ी अड्डा (ट्रांशिपमेंट हब) बना सके। हमें बताया जाता है कि हमें सिंगापुर और कोलंबो के बंदरगाहों से प्रतिस्पर्धा करनी है।
लेकिन यह दलील बहुत कमज़ोर है। वैश्विक व्यापार अब अनिश्चित दौर में है। भू-राजनीतिक तनाव, क्षेत्रीयकरण और धीमी वृद्धि ने सबको प्रभावित किया है। पहले से मौजूद बंदरगाह काफी कुशल हैं और जहाज़ों के नेटवर्क में गहरे जुड़े हुए हैं। इतने दूर, इतने नाज़ुक, भूकंप-प्रभावित द्वीप पर, बहुत बड़ी कीमत चुकाकर नया बंदरगाह बनाने की योजना, उसकी उपयोगिता पर बड़े सवाल खड़े करती है।
पर्यावरणविद् और अर्थशास्त्री एक जैसा सवाल पूछ रहे हैं:
जलवायु संकट के दौर में पारिस्थितिकी का पूरा पतन
आज पूरी दुनिया जलवायु के बिगड़ने से जूझ रही है। गर्मी की लहरें, भारी बारिश और बाढ़, बड़ी-बड़ी जंगल की आग, बढ़ते तूफान और चक्रवात, और जैव विविधता का ढहना – ये सब हो रहा है। ऐसे समय में, एक घने उष्णकटिबंधीय जंगल को नष्ट करना सिर्फ़ एक स्थानीय समस्या नहीं है। यह वैश्विक तबाही की तरफ एक और कदम है।
बड़े निकोबार जैसे उष्णकटिबंधीय जंगल:
सीधा नैतिक सवाल
यह सिर्फ़ तकनीकी या आर्थिक बहस नहीं है। यह एक नैतिक सवाल है।
क्या 21वीं सदी में, जब पारिस्थितिकी की सीमाओं का पूरा ज्ञान हमारे पास है, फिर भी हम:
सच तो यह है कि दुनिया के अधिकतर बचे हुए प्राकृतिक स्थानों को किसी भी तरह न छेड़ा जाए – ऐसा करना ही मानवता को बचाये रखने का एकमात्र रास्ता है।

बिना विनाश के विकाश
पर्यावरणविदों का नज़रिया विकाश का विरोध नहीं करता। वे एक अलग तरह का विकाश चाहते हैं:
अगर यह जंगल नष्ट हो गया, तो यह सिर्फ़ भारत के लिए त्रासदी नहीं होगी। यह पूरी दुनिया के लिए त्रासदी होगी।
क्या यह सच में राष्ट्रीय हित के लिए है, या सिर्फ़ "विकाश" का नाम देकर बड़ी-बड़ी निजी कंपनियों को मुनाफ़ा पहुँचाने के लिए है?
जलवायु संकट के दौर में पारिस्थितिकी का पूरा पतन
आज पूरी दुनिया जलवायु के बिगड़ने से जूझ रही है। गर्मी की लहरें, भारी बारिश और बाढ़, बड़ी-बड़ी जंगल की आग, बढ़ते तूफान और चक्रवात, और जैव विविधता का ढहना – ये सब हो रहा है। ऐसे समय में, एक घने उष्णकटिबंधीय जंगल को नष्ट करना सिर्फ़ एक स्थानीय समस्या नहीं है। यह वैश्विक तबाही की तरफ एक और कदम है।
बड़े निकोबार जैसे उष्णकटिबंधीय जंगल:
- उन कार्बन उत्सर्जनों को सोखते हैं जिन्हें हम कम करने में असफल हो रहे हैं।
- चरम मौसम की घटनाओं को कम करते हैं।
- उस जैव विविधता को संभाल कर रखते हैं जो पूरी दुनिया के इकोसिस्टम को स्थिर रखती है।
सीधा नैतिक सवाल
यह सिर्फ़ तकनीकी या आर्थिक बहस नहीं है। यह एक नैतिक सवाल है।
क्या 21वीं सदी में, जब पारिस्थितिकी की सीमाओं का पूरा ज्ञान हमारे पास है, फिर भी हम:
- हज़ारों सालों से फले-फूले प्राचीन जंगलों को मिटाना चाहेंगे?
- वहाँ के मूल निवासियों को उखाड़ फेंकेंगे?
- अनिश्चित और कमज़ोर आर्थिक फ़ायदों पर दाँव लगाएँगे?
सच तो यह है कि दुनिया के अधिकतर बचे हुए प्राकृतिक स्थानों को किसी भी तरह न छेड़ा जाए – ऐसा करना ही मानवता को बचाये रखने का एकमात्र रास्ता है।
बिना विनाश के विकाश
पर्यावरणविदों का नज़रिया विकाश का विरोध नहीं करता। वे एक अलग तरह का विकाश चाहते हैं:
- ऐसा विकाश जो पारिस्थितिकी की सीमाओं का सम्मान करे।
- ऐसा विकाश जो मूल निवासियों के अधिकारों और उनके ज्ञान को केंद्र में रखे।
- ऐसा विकाश जो थोड़े समय के फ़ायदे से ज़्यादा, लम्बे समय तक पृथ्वी पर जीवन को बनाये रखने पर ध्यान दे।
अगर यह जंगल नष्ट हो गया, तो यह सिर्फ़ भारत के लिए त्रासदी नहीं होगी। यह पूरी दुनिया के लिए त्रासदी होगी।
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– सौम्या दत्ता
– सौम्या दत्ता
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