श्रीलंका संकट का सबक



1948 में स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद  श्रीलंकावासियों को एक ऐसी सरकार मिली जिसमें अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त, उद्यमी तमिल शक्तिशाली पदों पर थे। उनके खिलाफ नाराजगी ने सिंहली लोगों को बौद्ध पुजारियों के वर्ग द्वारा प्रचारित 'सिंहली ओनली' नीति को अपनाने के लिए प्रेरित किया। सिंहली लोगों (जो श्रीलंका का सबसे बड़ा समुदाय है) द्वारा अपने 'बहिष्कार' के इस सिद्धांत ने तमिल लोगों को एक अलग तमिल राज्य के लिए हथियार उठाने और युद्ध छेड़ने के लिए प्रेरित किया। 

इसका एक परिणाम यह हुआ कि जहाँ एक ओर भारत के पास अपने 140 करोड़ लोगों के लिए 14 लाख 50 हज़ार सैनिक हैं,  तो श्री लंका के पास अपनी 2 करोड़ 30 लाख की आबादी के लिए ढाई लाख सैनिक हैं। यह तुलनात्मक रूप से बहुत अधिक है। एक छोटा सा देश अपने साधनों या आवश्यकता से परे जाकर अपने बजट को हथियार और सेना पर लुटा रहा है। सौभाग्य से, आज बड़े पैमाने पर स्वतःस्फूर्त शांतिपूर्ण नागरिक विरोध में यह नहीं झलकता।
 


अल्पसंख्यकों के खिलाफ वर्चस्ववादी बहुसंख्यक अत्याचारों की भूख एक समुदाय से शुरू होकर उसी पर खत्म नहीं होती है।  एक बार जब सर्वोच्चतावादी छद्म-राष्ट्रवाद की इस विखंडनकारी भावना की चिंगारी भड़कती है, तो फिर यह जंगल की आग बन कर हर संभव कमजोर वर्ग और समुदाय को स्वाहा किए बिना नहीं बुझती। ठीक उसी तरह, तमिल 'विद्रोह' को बेरहमी से कुचलने वाली सैन्यवादी सरकार बार-बार सत्ता में आती रही, और उसने तमिलों के अलावा अन्य अल्पसंख्यकों जैसे ईसाईयों और मुस्लिमों को भी निशाना बनाना शुरू कर दिया।

समावेशी दृष्टिकोण' द्वारा सामाजिक विभाजनों को हल करने का समझदार मार्ग अपनाने की बजाय श्रीलंकाई गोटाबाया राजनीतिक परिवार ने कट्टरपंथी बौद्ध पुरोहितों के साथ हाथ मिलाकर अल्पसंख्यकों को निशाना बनाया।


लालची पूंजीवादी गुट ने सत्तारूढ़ गोटाबाया परिवार को चीन, विश्व बैंक और अन्य एजेंसियों ने बुरे वक्त में और सनकी परियोजनाओं के लिए भारी-भरकम कर्ज लेने के लिए उकसाया। इसके अलावा, कोविड, आतंकवाद, यूक्रेन युद्ध आदि ने श्री लंका की कमाई का मुख्य जरिया अर्थात पर्यटन उद्योग भारी नुकसान पहुँचाया है, और देश को दिवालियेपन की धकेल दिया है।

इस प्रकार, श्रीलंका का संकट राजनीतिक और आर्थिक दोनों है। मनो-आर्थिक शोषण की एकत्रित शक्तियों के प्रभाव ने इस संसाधन संपन्न देश को घुटनों पर ला दिया है। पूँजीवादी हितों को बढ़ावा देने के लिए बहुसंख्यक वर्चस्ववादी राजनीति का रास्ता अपनाने वाली श्रीलंकाई सरकार ने आज देश को जिस दुर्गति में डाल दिया है, वैसी ही बुरी स्थिति में जाने के लिए कई और देश कतार में खड़े हैं।  


इसलिए, जो लोग मानव समाज के कल्याण की कामना करते हैं, उन्हें पूरी शक्ति से केवल इस नव्य-मानवतावादी विचार को बढ़ावा देना होगा कि सम्पूर्ण मानव जाति एक है। हम इस बात को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते कि आज विभिन्न राष्ट्रों के नेतृत्व के सामने एक साथ कई संकट खड़े हैं, जिनका हल नव्य-मानवतावाद और प्रउत अर्थव्यवस्था को अपनाए बिना नहीं किया जा सकता। 




लेखक:  सुरेंद्र रेड्डी, रवींद्र सिंह 


Post a Comment

0 Comments