देश के हर क्षेत्र का विकास हो तथा वहाँ के लोग अपने शारीरिक, मानसिक तथा अध्यात्मिक विकास की सभी सुविधाएँ एवं अवसर पा सकें, इस उद्देश्य से प्रउत भारतवर्ष को 44 समाजार्थिक इकाइयों या समाजों में पुनर्गठित करने का सुझाव देता है। ये समाज वर्तमान राज्यों की तरह भाषा या राजनैतिक नफे-नुकसान के आधार पर नहीं बल्कि निम्नलिखित सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक कारकों पर आधारित हैं:
1. समान आर्थिक समस्याएँ जैसे स्थानीय उत्पादों के लिए बाज़ार की कमी, श्रम अर्थात काम करने वालों की कमी या अधिकता, यातायात या संचार की समस्याएँ और सिचाईं की कमी आदि समाज के गठन का पहला आधार है। इन सभी समस्याओं और उनके समाधान को अच्छी तरह समझना होगा ।
2. समान आर्थिक क्षमताएँ- एक समाजार्थिक इकाई में रहने सभी लोगों के पास आर्थिक खुशहाली प्राप्त करने के लिए समान अवसर होने चाहिए। अमीर और गरीब के बीच की खाई को तेजी से कम किया जाना चाहिए ताकि समाज की सामूहिक संपत्ति में बढ़ोतरी हो।
3. प्रजातीय समानताएँ: इन समाजार्थिक इकाइयों का तीसरा आधार है प्रजातीय या नस्लीय समानता। स्वार्थी तत्वों ने हमेशा नस्लीय भेदभाव को बढ़ावा दिया है,जिसकी वजह से शक्तिशाली प्रजातियों ने कमजोर प्रजातियों का शोषण किया है। यह आवश्यक है कि एक प्रजाति दूसरी प्रजाति का सम्मान करे और उससे घुले-मिले परन्तु यह तभी हो सकता जब हर प्रजाति बराबर शक्तिशाली और आत्मनिर्भर हो। उन्हें जबरन या भय से एक नहीं किया जा सकता।
4. भावनात्मक विरासत जैसे समान भाषा, साहित्य, एतिहासिक परम्परायें, समान रीति-रिवाज और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति लोगों के समूह को एकसूत्र में बाँधती हैं।प्रउत का मानना है की वह सभी मानवीय भावनाएं जो मानव समाज को जोड़ती हैं उन्हें बढ़ावा दिया जाना चाहिए जबकि फूट पैदा करने वाली भावनाओं का त्याग किया जाना चाहिए ।
5. समान भौगोलिक विशेषताएँ जैसे स्थलाकृति ,वर्षा,नदियाँ ,सिचाईं आदि का समाज के गठन में ध्यान रखा जाना चाहिए ।
उपरोक्त आधार पर समाजों का गठन किये जाने के बाद, आम जनता की आर्थिक आज़ादी के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए निम्नलिखित बातों का पालन करना आवश्यक है:
1. न्यूनतन आवश्यकताओं की पूर्ति की गारंटी : रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा और बीमारी में अच्छा इलाज आदि न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति की गारंटी प्रत्येक व्यक्ति को देनी होगी। यह न सिर्फ हर व्यक्ति का अधिकार है बल्कि ऐसा होने पर पूरे समाज का भी विकास तेजी से होगा ।
2. बढ़ती क्रय क्षमता की गारंटी : सामाजिक इकाई में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति की खरीदने की शक्ति को लगातार बढ़ाते जाना होगा। इसके लिए स्थानीय कच्चे माल पर स्थानीय लोगों का अधिकार होना चाहिए । कच्चे माल को नहीं बल्कि तैयार माल को ही बाहर भेजा जाना चाहिए । उपलब्ध कच्चे माल के पास उद्योग स्थापित किये जाने चाहिए, जिनमे 100 % स्थानीय लोगों को नौकरी दी जानी चाहिए।
यहाँ यह समझना आवश्यक है की स्थानीय व्यक्ति का तात्पर्य हर उस व्यक्ति से है जिसने अपने सामाजिक और आर्थिक हितों को उस समाजार्थिक इकाई के हितों के साथ मिला दिया हो जिसमे वह रहता है । उदाहरण के लिए यदि भोजपुरी समाज में पैदा हुआ कोई व्यक्ति मुंबई (सहयाद्री समाज) में रहता है और अपनी रोजीरोटी के लिए पूरी तरह से मुंबई पर निर्भर है तो वह स्थानीय माना जाना चाहिए जबकि हरयाणवी समाज में रहना वाला कोई मराठी व्यक्ति जिसके सामाजिक और आर्थिक सरोकार मुंबई से नहीं जुड़े हैं वह मुंबई के लिए बाहरी व्यक्ति है । स्थानीय व्यक्ति होना जाति, धर्म, रंग, भाषा, जन्म आदि पर निर्भर नहीं होना चाहिए।
3. आर्थिक निर्णय स्थानीय लोगों के हाथ : स्थानीय अर्थव्यवस्था से सम्बंधित सभी योजनायें एवं नीतियाँ स्थानीय लोगों के हाथ में होना आवश्यक है। स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार औद्योगिक और कृषि वस्तुओं का उत्पादन एवं उनका वितरण स्थानीय लोगों के हाथों होना चाहिए । आर्थिक आज़ादी के लिए यह एक आवश्यक शर्त है।
4. बाहरी लोगों के दखल पर रोक : किसी भी समाज की अर्थव्यवस्था के विकास के लिये यह आवश्यक है कि बाहरी लोगों को स्थानीय आर्थिक गतिविधियों में भाग लेने से रोक जाए । वर्ना स्थानीय पैसा बाहर चला जायेगा और स्थानीय अर्थव्यवस्था कमजोर होगी। इसके अलावा बाहरी वस्तुओं को स्थानीय बाज़ारों में नहीं बेचा जाना चाहिये क्योंकि ऐसा होने पर भी पैसा बाहर चला जायेगा और स्थानीय उद्योग-धंधे कमजोर हो जायेंगे।
5. स्थानीय भाषा का उपयोग : आर्थिक प्रजातंत्र के लिए आवश्यक है कि सभी सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक गतिविधियों में स्थानीय भाषा का उपयोग किया जाए। शिक्षा संस्थानों में शिक्षा का माध्यम तथा प्रशासनिक कामकाज और संचार में स्थानीय भाषा को ही प्राथमिकता दी जानी चाहिए। ऐसा न होने पर स्थानीय लोगों के मन में हीन भावना जन्म लेती है और वे शोषण का शिकार हो जाते हैं ।
प्रउत के अनुसार 44 समाजों के गठन और उन्हें आत्मनिर्भर बनाने की प्रक्रिया में दो या दो से अधिक समाजों को मिला कर एक बड़ी इकाई बनाई जा सकती है, यदि
1) वे आर्थिक रूप से समान विकसित हों;
2 ) सांस्कृतिक रूप से घुलमिल जाएं;
3) उनके बीच अच्छी संचार तथा यातायात व्यवस्था स्थापित हो जाए, और
4 ) यदि उन्हें प्रशासनिक रूप से प्रभावशाली ढंग से संभाला जा सके ।
इस तरह एक दिन पूरा भारतवर्ष ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया एक समाजार्थिक इकाई, एक समाज बन जायेगा। ■

0 Comments