हाल के वर्षों में एक नया शोध का क्षेत्र उभरा है – न्यूरो-इकोनॉमिक्स। यह दिमाग और आर्थिक फैसलों के बीच के रिश्ते को समझता है। पुरानी अर्थशास्त्र की थ्योरी कहती थी कि इंसान हर फैसले में अपना ज़्यादा से ज़्यादा फायदा देखता है। लेकिन असल ज़िन्दगी में ऐसा नहीं होता। हमारे फैसलों पर भावनाओं, हार्मोन्स और सामाजिक रिश्तों का बहुत गहरा असर होता है।
एक प्रयोग किया गया, जिसमें दो लोगों को कुछ पैसे आपस में बाँटने को कहा गया। थ्योरी के हिसाब से पहले व्यक्ति को अपना ज्यादा रखना चाहिए था, लेकिन उसने निष्पक्षता को प्राथमिकता दी। यानी इंसान सिर्फ अपने फायदे के बारे में नहीं सोचता, बल्कि उसे यह भी लगता है कि क्या सही है और क्या गलत। दूसरे प्रयोग में जब उन लोगों को ऑक्सीटोसिन नामक हार्मोन दिया गया, तो उन्होंने और भी ज़्यादा बाँटा। ऑक्सीटोसिन को 'भरोसे का हार्मोन' भी कहा जाता है। यह हमें दूसरों के प्रति सहानुभूति और विश्वास का अनुभव कराता है। इससे साफ होता है कि हमारे अंदर सहयोग की एक जैविक प्रवृत्ति मौजूद है।
बोनोबो बंदरों पर हुए अध्ययन और भी हैरान करने वाले हैं। ये चिंपांज़ी के करीबी रिश्तेदार हैं, लेकिन व्यवहार में एकदम अलग। चिंपांज़ी में आक्रामकता और अजनबियों के प्रति शत्रुता होती है, जबकि बोनोबो मिलनसार और जिज्ञासु होते हैं। जब केले तक पहुँचने के लिए सहयोग की ज़रूरत पड़ी, तो बोनोबो ने आसानी से एक-दूसरे की मदद की, जबकि चिंपांज़ी ऐसा नहीं कर पाए। वैज्ञानिकों ने पाया कि बोनोबो में एक 'सामाजिक जीन' होता है जो ‘वैसोप्रेसिन’ नामक रसायन के जरिए काम करता है। चिंपांज़ी में यह जीन नहीं है। और सबसे दिलचस्प बात यह है कि इंसानों में भी यही जीन है। इसका मतलब यह नहीं कि हम सब स्वभाव से सहयोगी हैं, लेकिन यह ज़रूर कह सकते हैं कि सहयोग हमारी जन्मजात क्षमता है।
| बोनोबो बंदर |
लेकिन इस क्षमता को विकशित करना है, तो सही माहौल चाहिए। भरोसा किसी भी समाज की सामाजिक पूँजी होती है। जिन समाजों में भरोसा ज़्यादा होता है, वहाँ निवेश बढ़ता है, अपराध घटता है और लोग खुश रहते हैं। एक सर्वेक्षण में पाया गया कि नॉर्वे जैसे देशों में भरोसा 65% तक है, जबकि ब्राज़ील में मात्र 3%। यह अंतर कोई संयोग नहीं है – यह सीधे तौर पर समाज में आय की असमानता से जुड़ा है। जहाँ अमीर-गरीब का अंतर कम होता है, वहाँ भरोसा ज़्यादा होता है।
'स्पिरिट लेवल' नामक प्रसिद्ध किताब ने 30 साल के शोध के आधार पर दिखाया कि कम असमानता वाले समाज स्वास्थ्य, शिक्षा, सुरक्षा और खुशी के हर पैमाने पर बेहतर होते हैं। वहाँ कैदियों की संख्या कम होती है, कम हिंसा होती है, किशोर गर्भधारण कम होता है, और मानसिक बीमारी भी कम होती है। यहाँ तक कि अमीर लोग भी ज़्यादा समतावादी समाज में ज़्यादा खुश रहते हैं। यह सब बताता है कि असमानता कम करना हर किसी के फायदे में है। दुर्भाग्य से, आज की नव-उदारवादी नीतियाँ इस दिशा में काम नहीं कर रही हैं। सरकारें मुक्त बाजार पर जोर देती हैं, लेकिन बिना नियमन के बाजार भरोसे को तोड़ देते हैं।
इसे एक प्रयोग से समझा जा सकता है – चिंपांज़ी को पैसे (टोकन) से व्यापार करना सिखाया गया। जब एक इंसान रेफरी था, तो व्यापार ठीक चला। जैसे ही निगरानी हटी, धोखाधड़ी शुरू हो गई। इससे साबित होता है कि नियमन और नैतिकता के बिना कोई बाजार टिकाऊ नहीं हो सकता। यही बात इंसानी समाज पर भी लागू होती है – भरोसा, ईमानदारी और सहयोग केवल अच्छे गुण नहीं हैं, बल्कि आर्थिक ताकत भी हैं।
अब बात करते हैं नैतिकता की। एक सहकारी समाज बिना नैतिक आधार के नहीं टिक सकता। श्री सरकार दो नैतिक प्रणालियाँ देते हैं – मूल मानवीय मूल्य और नव-नैतिकता (नियो-एथिक्स)। मूल मानवीय सिद्धांत सार्वभौमिक हैं और किसी धर्म या संस्कृति से बँधे नहीं हैं। इनमें दस सिद्धांत हैं – झूठ न बोलना, चोरी न करना, हिंसा न करना, असंग्रह (अत्यधिक उपभोग से बचना), संतोष आदि। ये सिद्धांत सामाजिक प्रगति के लिए ज़रूरी हैं। सरकार कहते हैं कि जो काम सामूहिक प्रगति को बढ़ावा दे, वह पुण्य है, और जो बाधा डाले, वह पाप है।
इनमें सबसे महत्वपूर्ण है – दूसरों को अपने स्वार्थ के लिए इस्तेमाल न करना। यह सहानुभूति का सिद्धांत है – दूसरे के दुख-सुख को अपना समझना। जब हम किसी इंसान, जानवर या पेड़-पौधे को केवल उसकी उपयोगिता से न देखकर उसके अस्तित्वगत मूल्य से देखते हैं, तो हम सहानुभूति का व्यवहार करते हैं। इसी सिद्धांत पर गहन पारिस्थितिकी (डीप इकोलॉजी) टिकी है।
नैतिकता और कानून के बीच अक्सर बड़ा अंतर होता है। आज के पूँजीवादी समाज में सीईओ को करोड़ों रुपए का वेतन और पेंशन मिलती है, जो कानूनी तो है लेकिन नैतिक नहीं। श्री सरकार कहते हैं कि अधिकतम आय और न्यूनतम आय के बीच एक अनुपात होना चाहिए। कई सहकारी व्यवसाय पहले से ही यह करते हैं। इसी तरह, अत्यधिक उपभोग नैतिक रूप से गलत है क्योंकि संसाधन सीमित हैं। हरित नारा – 'कम करो, पुन: उपयोग करो, पुनर्चक्रण करो' – केवल पर्यावरणीय नहीं बल्कि नैतिक अनिवार्यता भी है।
दूसरी नैतिक प्रणाली है – नव-नैतिकता। यह समूहों के बीच के संबंधों से जुड़ी है। हर समाज में समूह बनते हैं – जाति, भाषा, धर्म, राष्ट्र आदि। यह स्वाभाविक है, लेकिन जब एक समूह दूसरे पर अपनी सत्ता थोपने लगता है, तो यह साम्राज्यवाद बन जाता है। श्री सरकार इसे 'मानसिक बीमारी' कहते हैं। चाहे वह राष्ट्रवाद हो, जातिवाद हो या पुरुष प्रभुत्व – सब यही बीमारी है। इसका इलाज है – आध्यात्मिक विकाश, यानी स्थूल से सूक्ष्म की ओर बढ़ना। प्रगति का मतलब है संकीर्णता छोड़कर व्यापक चेतना की ओर बढ़ना।
अब आते हैं समतावाद पर। समाजवादियों ने भौतिक समानता लागू करने की कोशिश की, लेकिन वे विफल रहे। सरकार कहते हैं कि 100% समानता असंभव है, क्योंकि प्रकृति में विविधता और गतिशीलता ही सब कुछ है। लेकिन अधिक समानता बेहतर होती है – यह विज्ञान भी कहता है। प्रउत का समाधान है – न्यूनतम आय की गारंटी दी जाए ताकि किसी की बुनियादी जरूरतें अधूरी न रहें, और अधिकतम आय इसकी एक निश्चित गुणज (जैसे पाँच या दस गुना) हो। जैसे-जैसे अर्थव्यवस्था बढ़े, न्यूनतम आय भी बढ़नी चाहिए। इसके अलावा प्रतिभा और मेहनत को भी पुरस्कार मिलना चाहिए ताकि उत्पादकता बनी रहे।
यहाँ एक संतुलन चाहिए – समतावाद (बराबरी) और योग्यतावाद (प्रतिभा को पुरस्कार) के बीच। दोनों का अपना महत्व है और दोनों के बीच तनाव स्वाभाविक है। इसे दबाने के बजाय, हमें इसे रचनात्मक संवाद का हिस्सा बनाना चाहिए।
दिलचस्प बात यह है कि राजनीतिक झुकाव का एक जैविक पहलू भी है। शोध बताता है कि जो लोग खतरे के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं, वे रूढ़िवादी नीतियों को समर्थन देते हैं – जैसे रक्षा खर्च, सज़ा, देशभक्ति। जबकि जो कम संवेदनशील होते हैं, वे उदार नीतियों – जैसे शांतिवाद, विदेशी सहायता, बंदूक नियंत्रण – का समर्थन करते हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि राजनीति सिर्फ जीन से तय होती है, लेकिन यह बताता है कि ये मतभेद गहरे हैं और लंबे समय तक रहेंगे। सहकारी समाज में भी हमें इन मतभेदों को सम्मानपूर्वक संभालना होगा।
श्री सरकार अर्थशास्त्र को चार भागों में बाँटते हैं – जन अर्थशास्त्र, सामान्य अर्थशास्त्र, वाणिज्यिक अर्थशास्त्र और मनो-अर्थशास्त्र। मनो-अर्थशास्त्र सबसे दिलचस्प है क्योंकि यह मानवीय भावनाओं, इच्छाओं और मानसिकता पर केंद्रित है। इसके दो भाग हैं – पहला शोषण से बचाने के तरीकों पर काम करता है, और दूसरा सूक्ष्म मानवीय आकांक्षाओं को पूरा करने से जुड़ा है। इनमें ललित कलाओं – संगीत, चित्रकला, साहित्य – का बहुत महत्व है। कला हमें स्वार्थ और संकीर्णता से ऊपर उठाती है।
वेनेजुएला का 'एल सिस्टेमा' कार्यक्रम इसका जीता-जागता उदाहरण है। गरीब बच्चों को संगीत सिखाया गया और ऑर्केस्ट्रा में शामिल किया गया। इससे उनमें अनुशासन, सहयोग, आत्मविश्वास और सामाजिक जागरूकता पैदा हुई। आज लाखों बच्चे इससे लाभान्वित हुए हैं और वे समाज के जिम्मेदार सदस्य बने हैं। लेकिन एक सावधानी भी ज़रूरी है – कला को राजनीति के इस्तेमाल से बचाना चाहिए। हिटलर और स्टालिन ने कला का दुरुपयोग किया था, इसलिए कलाकारों को अपनी स्वतंत्रता बनाए रखनी चाहिए।
निष्कर्ष यह है कि मानव स्वभाव में स्वार्थ और सहयोग दोनों हैं। हमें सहयोग को प्रोत्साहित करना है और स्वार्थ पर नियंत्रण रखना है। विज्ञान साबित करता है कि सहयोग हमारी जन्मजात क्षमता है – हमारे जीन, हार्मोन और दिमागी संरचना इसे संभव बनाती है। लेकिन यह क्षमता अपने आप नहीं खिलती – इसके लिए सही संस्कृति, नैतिक शिक्षा और समतावादी नीतियाँ चाहिए। सरकार, समाज और व्यक्ति – तीनों को मिलकर काम करना होगा।
सहकारी समाज बनाना कोई यूटोपिया नहीं है। यह कठिन ज़रूर है, लेकिन असंभव नहीं। अगर हम नैतिकता, भरोसा और समानता को गंभीरता से लें, तो एक बेहतर दुनिया बनाई जा सकती है। हाँ, इसके लिए संघर्ष करना होगा – लेकिन संघर्ष का फल मीठा होता है। विज्ञान हमें आशा देता है, नैतिकता दिशा देती है, और सामूहिक इच्छा शक्ति हमें मंज़िल तक पहुँचाती है। यही सहयोग का सच्चा अर्थ है – एक-दूसरे के पूरक बनना, एक-दूसरे पर भरोसा करना, और मिलकर आगे बढ़ना।
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