कैसी आज़ादी ?

आज से 70 साल पहले हिंदुस्तान ने अंग्रेज़ों से आज़ादी हासिल की; पाकिस्तान ने हिंदुस्तान से आज़ादी हासिल की; 1971 में बांग्लादेश  ने पकिस्तान से आज़ादी हासिल की और अब कुछ कश्मीर निवासी हिंदुस्तानी शासन से आज़ादी हासिल कर लेना चाहते हैं। सवाल यह है कि आखिर इतनी आज़ादियों से इन देशों की आम जनता को ऐसा क्या हासिल हो गया जो इन कश्मीरी वाशिंदों को हिंदुस्तान से अलग होकर मिल जायेगा ? स्वतंत्रता प्राप्ति के 70 साल बाद भी आज हिंदुस्तान की लगभग 66 प्रतिशत आबादी महीने में करीब

2000 रुपये ही कमा पाती है। 3000 बच्चे तो रोज़ भूख और कुपोषण से मर जाते हैं। हर साल लगभग 11000 किसान आर्थिक तंगी के चलते आत्महत्या कर रहे हैं। 1 लाख लोग तो हर साल साफ पानी न मिल पाने के कारण मारे जाते हैं। बेरोज़गारी का आलम तो ये है कि हर साल नौकरियां चाहिए 1 करोड़ 20 लाख से ज्यादा और मिल रहीं बमुश्किल 1 प्रतिशत  यानी 1 लाख 20 हज़ार । 

पाकिस्तान और बांग्लादेश के हालात भी बेहतर नहीं हैं। विख्यात पाकिस्तानी पत्रकार मुरतज़ा तालपुर के अनुसार  पाकिस्तान  में ऊपर से लेकर नीचे तक आर्थिक विषमता स्पष्ट दिखाई देती है। मात्र 22 लोगों के पास अरबों-खरबों की सम्पत्ति है और बाकी आबादी भूख और गरीबी में जीवन जीने के लिए मजबूर है। शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं हालत दयनीय है। ज्यादातर संस्थाएं सड़-गल चुकीं हैं। नैतिक मूल्यों का पूरी तरह से पतन हो  चुका है।  पाकिस्तान के एक अन्य प्रतिष्ठित अख़बार 'द डॉन' के अनुसार पाकिस्तान की कुल 20 करोड़ की आबादी में से लगभग 7 से 8 करोड़ लोगों को दो वक्त का भोजन जुटाना मुश्किल है। 35 प्रतिशत पाकिस्तानी गरीबी रेखा के नीचे रहते हैं। 45 प्रतिशत बच्चों का कुपोषण की वजह से शारीरिक विकाश नहीं हुआ है; 2 करोड़ 40 लाख बच्चे को स्कूल जाना नसीब नहीं है। बंग्लादेश की बात करें तो पता चलता है कि देश की कुल आबादी (16.5 करोड़) में से लगभग 13 करोड़ लोग गावों में रहते हैं। 3 करोड़ बंग्लादेशी राष्ट्रीय गरीबी रेखा से नीचे हैं, तो 1.5 करोड़ लोगों की हालत ऐसी है कि उन्हें दिनभर में भरपेट भोजन मिल जाए तो गनीमत है। 

कुल मिलाकर बात यह है कि मात्र राजनैतिक सत्ता बदलने से -- यानी अपना झंडा, अपना डंडा, अपना प्रधानमंत्री और पार्लियामेंट बना लेने से  -- कुछ नहीं होता। सत्ता परिवर्तन का उद्देश्य व्यवस्था परिवर्तन होना चाहिए। 1947 में राजनैतिक आज़ादी हासिल करने के बाद, देश की सत्ता और व्यवस्था मुट्ठीभर अंग्रेज़ों की सेवा छोड़ कर मुट्ठीभर पूंजीपतियों की सेवा में लग गई। आम जनता के हालात वही रहे, बल्कि उससे भी बदतर हो गए। 

ऐसे में, आज आम कश्मीरी हिंदुस्तानी कहलाये या पाकिस्तानी, क्या फर्क पड़ता है ? क्या उसकी रोजी-रोटी की समस्या को हल करने का पाकिस्तान के पास कोई  ऐसा फार्मूला है जो हिंदुस्तान के पास नहीं है? क्या पाकिस्तान के नेता हिंदुस्तानी नेताओं से ज्यादा नेकनियत वाले हैं? कड़वी सच्चाई तो यही है कि वे भी उसी शोषणकारी व्यवस्था के पोषक हैं जो आम भारतीयों का खून चूस रही है। 

इसलिए न सिर्फ कश्मीरियों को बल्कि बाकी हिंदुस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश के हर नागरिक को ये समझना जरूरी है कि अभी उन्हें आर्थिक आज़ादी  -- यानी देश की धन-संपत्ति में से उनका हिस्सा मिलने की गारंटी -- को हासिल करने के लिए लड़ना होगा। आर्थिक आज़ादी ही असली आज़ादी है -- बाकि सब छलावा !

--रवींद्र सिंह


image courtesy: http://images.indianexpress.com



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