आज कन्दरा से उठ साधक!

खन-खन बजी मनुज की बेड़ी, छलके पापों के पैमाने।
आज कन्दरा से उठ साधक! तू ही सुना क्रान्ति के गाने।
धर्म ध्वजा लेकर जीवन के सही मर्म तक जाना तुझको,
युग की भाषा में भूले-भटकों को मार्ग सुझाना तुझको,
धर्म विहीना राजनीति हो, अर्थनीति या सामाजिकता,
शोषण भ्रष्टाचार पनपते वहीं, नाचतीं नंगी पशुता,
आगे बढ़ तू ही प्रपंच के सिंहासन की नींव हिलाने।
आज कन्दरा से उठ साधक!.....

तुमुल नाद कर आनन्दम् के आदर्शों का दीप जला दे,
घोर निराशा की घड़ियों में तू आशा की अलख जगादे,
घर-घर जा सन्देश सुना दे, जग जायें सब सोने वाले,
बन निमित्त कर्तव्य निभा दे, साथ चलेंगे चलने वाले,
इस विराट के नाट्य मंच पर अभिनय करता चल दीवाने।
आज कन्दरा से उठ साधक.........

भाग्यवान वह जिसे चुना हो प्रभु ने आकर स्वयं धरा पर,
परम पिता के पुत्र-पुत्रियां धन्य हो र्गइं जीवन पाकर,
वे शिव की सन्तान विश्व-मानवता की वे मर्यादा हैं,
वे ही कृष्ण-सखा हैं, उनकी अमर बनी गौरव-गाथा हैं,
देश-काल से ऊपर उठकर तू बढ़ता चल सीना ताने।

आज कन्दरा से उठ साधक!.....


--चंद्र प्रकाश आत्रेय 

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