लक्षण:-
छाती में जोर से शब्द होना, छाती में दर्द होना, श्वाँस लेने में कष्ट होना, हाथ-पाँव
का थरथर काँपना आदि।
कारण:-
हृदय रोग होने के अनेक कारण हैं :
पाकस्थली
को जो हर समय बहुत अधिक भाराक्रान्त करके रखते हैं, उनकी पाकस्थली में अधिक परिमाण
में रक्तसंचालन की आवश्यकता होती है और इस रक्त को चलाने के लिए हृदय यन्त्र को अत्यधिक
परिश्रम करना पड़ता है, जिसके फलस्वरूप यह दुर्बल हो जाता है। 35-40
वर्ष की उम्र के बाद भी जो लोभवश अत्यधिक आमिष खाद्य ग्रहण करते हैं उन्हें भी हृदय
रोग होता है। क्योंकि आमिष खाद्य रक्त में अम्ल भाग बढ़ा देता है और उस रक्त को दोषमुक्त
करने के लिए हृदय-यन्त्र को अत्यधिक परिश्रम करने के कारण दुर्बल हो जाना पड़ता है।
रक्त में अम्लदोष के बढ़ जाने पर देह का भीतरी यन्त्र क्रमशः दुर्बल हो जाता है और वे
हृदय यन्त्र की दुर्बलता के प्रत्यक्ष या परोक्ष कारण होते हैं।
अत्यधिक
तेल या चर्बी जातीय खाद्य ग्रहण और तदनुरूप शारीरिक परिश्रम नहीं करने के फलस्वरूप स्नायुपुंज चर्बी-प्रधान हो जाता है और उनके लिये हृदय यन्त्र को यथायथ रूप से सहायता
करना असंभव हो जाता है, फलस्वरूप हृदय यन्त्र दुर्बल हो जाता है। इस चर्बी के स्नायु-धमनी
के भीतर जमते रहने पर रक्त संचालन क्रिया को ठीक रूप से चालू रखने के लिए हृदय को अत्यन्त
अधिक परिश्रम करना पड़ता है जिसके फलस्वरूप अल्प समय में ही वह दुर्बल हो जाता है।
यकृत
की दुर्बलता के फलस्वरूप भी प्रायः देह उद्वृत्त चर्बी स्नायु धमनी के भीतर संचित होने का अवसर पाती है। और स्वाभाविक
नियम में हृदय यन्त्र दुर्बल हो जाता है (इस प्रकार के रोगी को साधारणतः पुराना आमाशय
रोग रहता है)।
थोड़ी
भूख या भूख नहीं रहने पर एक साथ अतिरिक्त खाद्य ग्रहण भी इस रोग का एक कारण है, क्योंकि
एक साथ बहुत अधिक खाद्य ग्रहण करने पर पाकस्थली का आकार बड़ा हो जाता है और वह ऊध्र्वस्थ
हृदय यन्त्र के ऊपर चाप देता रहता है।
जो
व्यक्ति नियमित रूप से जलपान नहीं करते हैं, साधारणतः वे दोपहर और रात के भोजन के समय
अधिक भोजन करते हैं। दिन-प्रतिदिन इस तरह की व्यवस्था के चलते रहने पर पाकस्थली का
आकार बढ़ जाता है और इससे हृदय रोग होता है।
कोष्ठकठिनता
इस रोग का एक और कारण है। कोष्ठ साफ नहीं रहने पर संचित मल पेट के भीतर सड़ता जाता है
और उसके फलस्वरूप दूषित बीजाणु उत्पन्न होता है। यह जब हृदय यन्त्र पर आक्रमण करने
का अवसर पाता है तब हृदय रोग होता है।
जो
अतिरिक्त क्रोधी होते हैं उन्हें रोग से आक्रान्त होने की पर्याप्त संभावना रहती है।
क्योंकि क्रोध के समय मुख और सिर में हठात अतिरिक्त रक्त संचालन का प्रयोजन होता है
(जिसके फलस्वरूप मुख लाल हो जाता है)। इस अतिरिक्त संचालन के लिए हृदय यन्त्र को हठात
अत्यन्त परिश्रम करना पड़ता है इसलिए जो स्वभाव से क्रोधी होते हैं उनका हृदय यन्त्र
दुर्बल हो जाता है। इसी तरह अतिरिक्त लज्जा में भी हृदय यन्त्र के दुर्बल होने की संभावना
रहती है।
अतिरिक्त
भय से शरीर के विभिन्न अंशों से रक्त हट जाता है और वही सब रक्त हठात विपुल परिमाण
में हृदय यन्त्र के समीप जाकर जमा हो जाता है, इसलिए अत्यन्त भय में हृदय यन्त्र टिप
टिप या धड़धड़ तो करता है, किन्तु प्रायः अतिक्रियता
के फलस्वरूप उसकी क्रिया बन्द हो जाने पर मृत्यु भी हो सकती है। (इस प्रकार काल्पनिक
भूत के भय में प्रायः हृदय यन्त्र की क्रिया बन्द हो जाने से मृत्यु होते भी देखा गया
है। मृत्यु के ठीक पूर्व क्षण में अथवा कुछ बाद कभी-कभी यह रक्त मुख से होकर बाहर हो
जाता है। लोग समझते हैं कि भूत ने मार दिया है)। इसीलिये देखा जाता है कि भीरु स्वभाव
के लोग प्रायः हृदय रोग से पीड़ित होते हैं।
ठीक
इसी प्रकार कामेन्द्रिय का व्यवहार भी हृदय यन्त्र को अतिक्रिय बना देता है और श्वाँस
क्रिया को दीर्घायित कर देता है। इसलिए जो स्वभाव से कामुक होते हैं वे भी प्रायः हृदय
रोग से आक्रान्त होते हैं। युवकों में अतिरिक्त शुक्रस्खलन के फलस्वरूप भी हृदय रोग
देखा जाता है।
मद,
तम्बाकू, बीड़ी, सिगरेट या अन्यान्य नशे की वस्तुओं का अत्यधिक मात्रा में व्यवहार करने
पर कोष्ठकाठिन्य रोग का उद्भव होता है जो हृदय रोग की सृष्टि के अन्यतम कारण है। इसके
अतिरिक्त नशे की सभी वस्तुएँ रक्त में अम्ल भाग बढ़ा देती हैं, देह की ग्रन्थिसमूह को
दुर्बल बना देती हैं और शेष पर्यन्त हृदय यन्त्र में इस ग्रन्थिसमूह की सक्रिय सहयोगिता
से वंचित होकर रोगग्रस्त हो जाती हैं।
किसी
जीवनक्षयी या चिर रोग में अधिक दिन रहने पर रक्त को पुनर्जीवित करने के लिए हृदय यन्त्र
को अत्यन्त परिश्रम करना पड़ता है। इसके चलते वह दुर्बल हो जाता है। इसीलिए देखा जाता
है कि बेरीबेरी, निमोनिया, यक्ष्मा, मधुमेह, प्रमेह, उपदंश या स्त्री-व्याधि में मनुष्य
जितने अधिक दिनों तक भोगता रहता है, हृदय यन्त्र के अत्यन्त दुर्बल क्षणों में उसकी
क्रिया बन्द हो जाती है और रोगी की मृत्यु होती है।
प्रातः:
उत्क्षेप मुद्रा (अधिक जल नहीं पीना होगा), योगमुद्रा, दीर्घप्रणाम, भुजंगासन, वायवी
मुद्रा या वायवी प्राणायाम और पादहस्तासन।
सन्ध्या:
योगमुद्रा, दीर्घ प्राणायाम, भुजंगासन, पादहस्तासन, वायवी मुद्रा या वायवी प्राणायाम।
मन
में ध्यान रखना होगा कि रोग के बढ़ने की अवस्था में एकमात्र उत्क्षेप मुद्रा छोड़कर और
कोई आसन, मुद्रा नहीं करना होगा। रोग के प्रकोप के कुछ कम हो जाने पर ही आसन, मुद्रा
आदि का अनुशीलन करना होगा। रोगी के एक प्रकार से स्वस्थ हो जाने के बाद पादहस्तासन
के बदले कूर्मासन का अभ्यास करना होगा। व्यापक स्नान विधि भी रोगी की विशेष रूप से
सहायता करती है।
पथ्य:
दूध और फल इस रोग का एकमात्र खाद्य और पानीय है। सुबह और शाम का जलपान दूध और फल से
ही सम्पन्न करना होगा। दोपहर में भी कोष्ठ परिष्कार और लघुपाच्य खाद्य खूब कम मात्रा
में ग्रहण करना होगा। भात को रोगी के लिए वर्जन करना ही अच्छा है, अन्यथा अल्प परिमाण
में सिझा चावल या भात खाया जा सकता है।
रात्रि
भोजन में दूध और फल छोड़कर कुछ नहीं खाना ही उचित है। सूर्यास्त के बाद रोगी को केला
नहीं खाना चाहिए। दूध की जगह घोल का व्यवहार कर सकते हैं। भोजन के साथ अलग से नमक का
व्यवहार रोगी के लिए हानिकारक है। भोजन के अन्त में कुछ समय दक्षिण नासिका से श्वाँस
को प्रवाहित रखना होगा।
विधि
निषेध: पाकस्थली को परिष्कृत रखना, रक्त के क्षार भाग को बढ़ाना, हृदय-यन्त्र को अतिरिक्त
परिश्रम से रक्षा करना रोगी का प्रधान कर्तव्य है। रोग के बढ़ने की अवस्था में सब समय
शवासन में सोये रहना उचित है। यहां तक कि मल-मूत्र त्याग करने के लिए भी शय्या का त्याग
करना उचित नहीं है। रोगी को कभी एक साथ अधिक
परिमाण में भोजन करना उचित नहीं है। अर्थात् थोड़ा-थोड़ा करके अनेक बार खाना उचित है।
रोग के बढ़ने की अवस्था में केवल दूध,
फल का रस (विशेषकर संतरे और टमाटर का रस) मधु या जल-घुम, पालक, कलमी, वेता (बथुआ),
पुनर्नवा, शुशुनी या शुलफा साग का क्वाथ छोड़कर और कुछ भी खाना उचित नहीं है। प्यास
के समय नीबू के अल्प रस से मिश्रित जल ही पान करना उचित है। दिवानिद्रा, रात्रि जागरण,
लोभवश उदरपूर्ण का अभ्यास रोगी के लिए अत्यन्त हानिकारक है। भोजघर में साधारणतः गुरुपाक
भोजन होता है। इसलिए भोजघर में नहीं खाना ही उचित है।
रोगी
को रात में आठ-साढ़े आठ के बीच शयन करना उचित है। मन में ख्याल करना उचित है कि अल्प
परिमाण में पालक, वेतो, कल्की, शुलफा, शुशुनी या पुनर्नवा शाक इस रोग में अत्यन्त हितकर
हैं। बड़ी इलायची भी रोग-मुक्ति में विशेष रूप से सहायता करती है। रोगी को कोष्ठ परिष्कार
की ओर खूब नजर रखनी होगी। रोगी के लिए 9 घण्टा सोना आवश्यक है। क्रोध और कामरिपु से
मन को सदा दूर रखना होगा। शारीरिक और मानसिक परिश्रम, अतिकथन और मैथुन कठोर रूप से
परित्याज्य हैं ।
1. प्रत्येक
दिन सवेरे और सायंकाल में मधु के साथ एक चम्मच बड़ी इलायची का चूर्ण (छिलका के साथ चूर्ण) सेवन करने से अच्छा फल होता है।
2. शुलफा
शाक का क्वाथ मधु मिलाकर पीने से हृदय रोग में विशेष उपकार होता है।
3. दारुचीनी
का चूर्ण एक चम्मच कुछ मधु के साथ दोनों वक्त सेवन करने पर इस रोग में अच्छा फल होता
है।
4. भूमिकुष्मांड
का चूर्ण एक आना भर कुछ मधु के साथ दोनों वक्त सेवन करना चाहिये।
--श्री प्रभात रंजन सरकार
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