मन का एक होना

ऋषि की वाणी है: "समानमस्तु वो मनो" अर्थात हमारे मन समान हों!

प्रायः यह देखा जाता है कि नाना विषयों पर मतैक्य नहीं होता। मत वैभिन्न्य के कारण परस्पर मनोमालिन्य भी हो जाता है, आपस में कटुता आ जाती है। उपर्युक्त आर्ष वाणी का अन्तर्निहित आशय यह है कि सभी चाहते हैं कि दूसरा व्यक्ति मेरे मन से चले अर्थात सभी मेरे मन के अनुकूल हों, सब का मन मेरे मन में मिल जायं।

स्वयं किसी और के मन से चलने की सोच से मन में ग्लानि आने लगती है, हीन भावना मन में जगने लगती है। ऐसा मालूम होने लगता है मानो दूसरा आदमी इस वजह से मुझसे श्रेष्ठ हो गया (क्योंकि मैं उसकी बात मान कर, उसके मार्ग दर्शन पर चल जो रहा हूं)। इस तरह के चिंतन से मन में अपने विचार, अपनी सोच, अपनी बात, अपने वाक्य, मनुष्य को श्रेष्ठ ही नहीं, सर्वश्रेष्ठ लगते हैं। अतः उसका स्वाभिमान और आत्मा-श्लाघा चरम पर होती है। मतैक्य स्थापित करने की अपेक्षा, अपना मत लोगों पर लादने की ही चेष्टा सामान्यतया नजर आती है। तब आपस में वैमनस्य का होना इसकी स्वाभाविक परिणति है, मनोमालिन्य में ही ऐसे चिंतन का अंत होता है। क्या इसका कोई निदान भी है ताकि हम मिलजुल कर सुख शांति से रह सकें और आगे बढ़ सकें?

हमारा सामान्य अनुभव है कि एक जाति, वंश, मजहब, क्षेत्र के लोगों में आपस में अधिक घनिष्ठता होती है। परिवार में प्रायः पाया जाता है कि एक माता-पिता की संतान होने के नाते परस्पर अधिक प्रेम और अपनापन होता है। अतः सभी मनुष्य यह भाव लें, ऐसा चिंतन-मनन करें, कि हम सभी एक माता-पिता की संतान हैं, तो अपनापन बढ़ेगा, आपस का प्यार बढ़ेगा। अलग-अलग परिवार, जाति, मजहब, क्षेत्र आदि का होने पर भी यह तो सब को मानना ही पड़ता है कि धरती, आकाश, हवा, पानी, अग्नि परम पुरुष ने, परमा प्रकृति ने बनाया है। फेफड़ा काम कर रहा है, हृदय में धड़कन है, प्राणों का स्पंदन है तो यह उनकी कृपा करुणा से ही है। जब वे हमसे इन्हें वापस ले लेते हैं तब मनुष्य और नहीं जी सकता-मर जाता है और उसे श्मशान ले जाना पड़ता है।

हमारे परम पिता एक हैं, हमारे सर्वोच्च नियंता एक हैं। उनके ऊपर कोई नहीं। वे ही हमारे जीवन सर्वस्व हैं। अतः यह भावधारा हमें एक सूत्र में बांधने में सर्वाधिक सहायक है। हमें सदा इसी भाव में रहना है कि हम एक पिता की संतान हैं तथा एक परिवार के सदस्य हैं। अतः मत की भिन्नता में भी स्नेह की एकता रहेगी। हममें मतभेद होगा, लेकिन मनभेद नहीं होगा। हमारे आदि और अंत, हमारे परमाश्रय एक ही हैं। अतएव हम भी एक हैं। भाई-भाई हैं।

जागतिक क्षेत्र में, कर्मों के इंद्र जाल में, हमें यही सोच कर चलना है कि सबके साथ बंधुत्वपूर्ण सहयोगिता का भाव रहेगा (क्योंकि सभी एक ही परिवार के हैं)। सभी एक-दूसरे के पूरक की भूमिका निभाएंगे। कोई हीन नहीं, कोई श्रेष्ठ नहीं। सभी परमा प्रकृति और परम पुरुष की वरद संतान हैं अतः मिलजुल कर ही काम करने और आगे बढ़ने की सोचेंगे, अर्थात् कोआर्डिनेटेड कोआपरेशन (बंधुत्वपूर्ण सहयोगिता), न कि सबार्डिनेटेड कोआपरेशन (शासित दासत्व मनस्तत्त्व की सहयोगिता)।

हमारे देह में यदि दिमाग सोचे वही सब कुछ है, पैर तो धूल धूसरित रहता है, कंकड़, पत्थरों की ठोकरें खाता चलता है अतः वह हीन है, नीच है-तब देह यथायथ भाव से नहीं चल पाएगा। मस्तिष्क (दिमाग) की अपनी भूमिका है तथा पैर की अपनी। कोई छोटा, कोई बड़ा नहीं। सभी के सहयोगपूर्ण साथ-साथ रहने से ही देह ठीक से काम करता है। इसीलिए कोआर्डिनेटेड कोआपरेशन।

तीसरी बात है कि साथ-साथ रहने, साथ चलने में अगर कोई द्वंद्व हो, कोई लड़ाई- झगड़ा हो तब वह एक ही मुद्दे पर -- ‘वह यह कि मुझे पाप शक्ति के विरुद्ध अनवरत संग्राम करना है। मैं पाप शक्ति से कभी समझौता नहीं करूंगा। जब तक पाप शक्ति पराजित नहीं हो जाती-मैं अनवरत संघर्ष करता रहूंगा”।

हमारी एकता का यह एक बहुत बड़ा माध्यम होगा कि हम संगठित व एकताबद्ध होकर पाप शक्ति के विरुद्ध संग्राम करें व इसे पराजित करें। पाप शक्ति से अभिप्राय है जो शक्ति हमारी वैयक्तिक और सामाजिक, शारीरिक, भौतिक, मानसिक आधिभौतिक व आध्यात्मिक उन्नति में बाधा डालती है-विघ्न के रूप में जो सामने आती है। उससे हमें सदा समझौतारहित संग्राम चलाते जाना है। इन तीन विंदुओं पर दृढ़ रहने से मन का मिलना, एक होना, सहज हो जाएगा, सभी एक मन से चलेंगे

--आचार्य संतोषानंद अवधूत

image courtesy: http://www.partyponty.hu

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