विकाश की गाड़ी


अगर परिवार में एक सदस्य बीमार है और उसके जीवन को बचाने के लिए काफी पैसा खर्च हो रहा हो, तो उसके खर्च में कटौती करके परिवार के दूसरे सदस्य के मनोरंजन या विलासिता पर खर्च नहीं किया जाता। लेकिन जब बात देश के पैसे को खर्च करने की आती है यानी अर्थव्यवस्था की, तो इस सामान्य समझ को दरकिनार कर दिया जाता है, और कठिन शब्दावली वाली भाषा में बताने की कोशिश की जाती है कि मुट्ठीभर लोगों की सुविधा बढ़ाने से कैसे अर्थव्यवस्था को फायदा होगा, विकाश दर बढ़ेगी और देश खुशहाली की ओर बढ़ेगा।

ऐसा ही कुछ बुलेट ट्रैन के सम्बन्ध में भी हुआ है जिसे सरकार ने हाल ही में  हरी झंडी दिखाई है। देश को बताया जा रहा है कि इससे देश की अर्थव्यवस्था को गति मिलेगी। आलोचक क़र्ज़, ब्याज,समयावधि और मुद्रा अवमूल्यन आदि की गणना करके बता रहे हैं कि बुलेट ट्रैन के लिए जापान से लिया गया यह क़र्ज़ महंगा साबित होगा। साथ ही इसे चलाने और रख-रखाव का खर्च इसके किराये से पूरा नहीं हो पाएगा, जो प्रधानमंत्री भी मानते हैं।  लेकिन चलिए ये तो हुई हिसाब-किताब की बातें, जो शायद आम आदमी को समझ न आयें। लेकिन जब ये पूछा जाता है कि आज जबकि जनता भेड़-बकरियों की तरह ऐसी रेलगाड़ियों में यात्रा करने लिए मजबूर है, जो न जाने कब पटरी से खिसक जाए, तो ऐसी महँगी परियोजना पर खर्च करने की क्या आवश्यकता है, तो तर्क दिया जाता है कि ऐसा विरोध हमेशा से होता आया है और ये वही करते हैं जो तरक्की नहीं चाहते, जो पिछली सदी में अटके रहना चाहते हैं। उदाहरण दिया जाता है कि जब रंगीन टीवी देश में आया तो विरोध हुआ,सेलफोन आया तो विरोध हुआ, सैटेलाइट अंतरिक्ष में छोड़े गए, तो भूख और कुपोषण की दुहाई देकर विरोध हुआ।

दरअसल विरोध के ये स्वर तब तक सुनाई देते रहेंगें जब तक देश में एक भी व्यक्ति जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं से वंचित रहेगा। देश भी एक परिवार है और इसके लिए भी हमें खर्च की प्राथमिकताएं निश्चित करनी होंगी। सबसे पहले मूल आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए खर्च करना होगा और फिर उससे कम जरूरी चीजों पर, और आखिर में --अगर कुछ बचे तो -- विलासिता पर । लेकिन पूंजीवाद और तथाकथित लोकतंत्र के  वर्तमान घालमेल में उत्पादन और वितरण की प्राथमिकताओं का यह क्रम पूरी तरह से नदारद है।

इसलिए मुट्ठीभर लोगों को, जो विकाश की दौड़ में पहले ही बहुत आगे निकल गए हैं, बुलेट ट्रैन में बैठाकर और तेजी से आगे भेजने की बजाये थोड़ा धीमा कर दिया जाए और पीछे आने वाले मुसाफिरों की बेपटरी हो चुकी विकाश की गाड़ी को पटरी पर वापस लाया जाए, तो कोई हर्ज़ नहीं होगा। और अगर ऐसा नहीं हुआ तो देश रुपी यह परिवार बिखर जाएगा। 

-- रवींद्र सिंह

Image Courtesy: https://newswire.net/


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