सेंटीमेंट ऑफ यूनिटी


राजनैतिक जोड़-तोड़, जोर-जबरदस्ती, सुविधा, मजबूरी या कभी नेक इरादे के चलते, पुराने देश टूटते और नए बनते हैं।1947 में, भारतवर्ष से टूट कर अलग देश बना पाकिस्तान, और फिर 1971 में, पाकिस्तान से टूट कर बना बांग्लादेश। सरदार पटेल, वी.पी. मेनन और माउंट बैटन के प्रयासों से 565 रजवाड़ों और रियासतों ने मन से या बेमन सेे भारत का हिस्सा बनना स्वीकार किया, और इस तरह देश का वर्तमान मानचित्र उभरा।

आधुनिक भारत के गठन में सरदार पटेल ने महत्वपूर्ण योगदान दिया, जिसके प्रति श्रद्धांजलिस्वरूप उनकी 182 मीटर ऊंची प्रतिमा का निर्माण प्रधानमंत्री मोदी जी ने करवाया। कुछ लोग इस ऊंचाई को मोदी जी के अहंकार की ऊंचाई का प्रतीक मानते हैं। या फिर मोदी जी शायद यह चाहते हैं कि इतनी ऊंचाई से सरदार देख सकें कि उनका बनाया नक्शा आज भी वैसा ही है -- एक और अखंड।

मैं सोचता हूँ कि उदघाटन समारोह में अगर सरदार की प्रतिमा झुक कर मोदी जी के कान में कुछ कह पाती, तो जरूर कहती कि देश सिर्फ सीमाओं से नही बनता। देश तो सिर्फ देह है, उसकी आत्मा है उसमें बसने वाले लोग, जिनमें एकता और अखंडता के लिए 'स्टेचू ऑफ यूनिटी' से भी ज्यादा महत्वपूर्ण है 'सेंटीमेंट ऑफ यूनिटी' अर्थात एक ऐसा भाव या विचार जो देशवासियों को जोड़ने के लिए एक सूत्र का काम कर सके।

देश एक भौगौलिक-राजनैतिक इकाई है। राजनीति शास्त्र के अनुसार राज्य या देश की परिभाषा है: एक निश्चित सीमा में बंधी भूमि जिस पर जनसंख्या निवास करती हो, और जो एक ऐसी सरकार द्वारा शासित हो जिसके पास प्रायः सभी भीतरी एवं बाहरी निर्णय लेने का अधिकार हो। दुनिया के ज्यादातर देश इस परिभाषा के अंतर्गत आते हैं। भारतवर्ष भी इसका अपवाद नही है।

जब एक देश में रहने वाले लोग एक समान भाव या विचार से जुड़ जाते हैं, तो वे लोग या देश एक राष्ट्र कहलाता है। उदाहरण के लिए, सन 47 से पहले, देश की भूमि भले रजवाड़ो-रिसायतों में बंटी रही हो, परंतु अंग्रेजी शासन से स्वतंत्रता प्राप्त करने की प्रबल आकांक्षा ने इस विशाल भूखंड पर बसने वाले करोड़ों लोगों को एक छंद में आंदोलित कर दिया था। भिन्न-भिन्न राजाओं-नवाबों के अधीन होने के बावजूद वे मन-प्राण से एक राष्ट्र थे।

परंतु देश के आज़ाद होते ही, विदेशी शासन के खिलाफ बना सेंटिमेंट (भाव) खत्म हो गया और हिन्दू-मुस्लिम भाव हावी हो गया, जिसका परिणाम हुआ : विभाजन। उसके बाद से तो पूरा देश राष्ट्र तभी बनता है जब उस पर पड़ोसी देश हमला करता है या दूसरे देश, खासकर पाकिस्तान, के साथ क्रिकेट मैच हो। बाकी समय हम हिन्दू हैं, मुसलमान हैं, अगड़े हैं या पिछड़े हैं।

70 साल के अनुभव से एक बात तो तय है कि इतनी भिन्नताओं ओर विचित्रताओं वाले इस देश में धर्ममत, बोली, भाषा, वेषभूषा आदि के आधार पर एकता का भाव पैदा करना मुश्किल है। ऐतिहासिक इमारतें या नेताओं की प्रतिमाएं आज की पीढ़ी में कौतुहल तो पैदा करतीं हैं, परंतु वह इनसे खुद को जोड़ नही पाती,क्योंकि उनकी दुनिया अलग है, उनकी चुनोतियाँ, समस्याएं और उद्देश्य अलग हैं। इंटरनेट के माध्यम से पूरी दुनिया के संपर्क में आ चुके भारतवासियों में एकता पैदा करने के लिए एक नया विचार, एक नया भाव या सेंटीमेंट चाहिये।

महान दार्शनिक, विचारक और आध्यात्मिक गुरु श्री प्रभात रंजन सरकार के अनुसार, आज हम दो सेंटीमेंट्स के आधार पर एकता ला सकते है: (1) ब्रह्मांडवाद (2) शोषण-विरोधी भाव।

ब्रह्मांडवाद का सार है :

परमात्मा हैं पिता हमारे और प्रकृति माता,
अखिल ब्रह्मांड है घर हमारा और सब जीवों से नाता।


यदि इस भावना को प्रत्येक देशवासी के मन में बैठाने का प्रयास किया जाए, तो हर मनुष्य न सिर्फ दूसरे मनुष्य से जुड़ेगा बल्कि दूसरे जीवों और प्रकृति के साथ भी उचित व्यवहार करेगा।

दूसरा है शोषण-विरोधी भाव अर्थात हमारा शोषण करने वाला चाहे हमारा सगा भाई हो, हमारे मज़हब, जात या देश का हो या दूसरे देश का, हम उसका विरोध कर उसे रोकेंगे।

लेकिन समस्या यही है कि इन सेंटिमेंट के साथ वर्तमान जोड़तोड़ की दलगत राजनीति नही की जा सकती। अधिकतर वर्तमान दलों और राजनैतिक नेताओं के लिए इन भावनाओं का प्रचार-प्रसार करना आत्महत्या करने जैसा होगा।

इसलिए, आज जो भी राजनीतिज्ञ देश की खुशहाली के लिए काम करने का दावा करते हैं, उन्हें प्रतीकों की राजनीति छोड़ कर, सही प्रयोजन की राजनीति करके दिखानी होगी, और प्रतिमाओं की नही, बल्कि अपने चरित्र की ऊंचाई से जनता को प्रभावित करना होगा। तभी सरदार का सपना साकार होगा।



रवींद्र सिंह 
राष्ट्रीय लोक संपर्क सचिव 
प्राउटिष्ट ब्लॉक, इंडिया (पीबीआई)

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