कृषि और उद्योग

भारतवर्ष एक कृषि प्रधान देश है -- स्कूल से लेकर आई.ए.एस की परीक्षाओं तक, भारतवर्ष पर जब भी कोई लेख लिखा जाता है, तो उसमें यह पंक्ति ज़रूर लिखी जाती है। लेकिन कागज़ के पन्नों के अलावा खेती-किसानी की यह प्रधानता देश में कहीं नज़र नही आती। प्रधानता अगर किसी की नज़र आती है, तो वो है उद्योग और पूंजीपतियों की। जहां एक ओर, पूंजीपति करोड़ों कमा रहे हैं, अरबों खाकर विदेश जा रहे हैं और खरबों की टैक्स छूट पा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर, लाचार किसान फसल का दाम दुगना करवाने के लिए सड़क पर डण्डे खा रहे हैं।
24 अक्टूबर को दिल्ली स्थित टाउन हॉल में सूचना और तकनीकी की विभिन्न कंपनियों के कर्मचारियों से बात करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि उद्योगों को किसानों और खेतिहर मजदूरों के उत्थान और कल्याण के लिए भी काम करना चाहिए। अगले ही दिन, उनके इस वक्तव्य की गूंज मुकेश अम्बानी के शब्दों में भी सुनाई दी, जिन्होंने दिल्ली में आयोजित 'इंडिया मोबाइल कांग्रेस 2018' नामक कार्यक्रम में कहा कि सूचना और तकनीकी उद्योग की मदद से देश चौथी औद्योगिक क्रांति ला सकता है, जिसके माध्यम से किसानों की आय दुगनी करने और रोज़गार पैदा करने का सपना साकार होगा।
मोदी और मुकेश -- देश के दो सबसे शक्तिशाली व्यक्ति -- कह रहे हैं कि जब पूंजीपति कमाएंगे और ध्यान देंगे, तभी खेती की तरक्की होगी। यह नैरेटिव या परिपाटी सत्तर साल से चल रही है। आज़ादी के बाद से कृषि पर जनसँख्या का बोझ कम करने के नाम पर उद्योगों को बढ़ावा दिया गया। बोझ कम हुआ और हो रहा है: आज प्रतिदिन लगभग 2000 किसान खेती छोड़ रहे हैं -- लेकिन बेहतर विकल्प के लिए नहीं, बल्कि इसलिए कि आज खेती आत्महत्या का दूसरा नाम बन चुकी है।
अगर उद्योगों को आधुनिक भारत का मंदिर कहा जाए, तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी, लेकिन हर सरकार इन मंदिरों की पुजारी बन, पूंजीपति रूपी देवमूर्तियों को देश के जल,जंगल, जमीन, खनिज पदार्थ, मानव श्रम आदि का भोग लगाकर उनका स्तुति, वंदन और परिक्रमा कर रही है। और क्यों न करें ! आखिर उनके ही प्रसाद से ही तो चुनाव समर जीत कर सत्ता प्राप्त की जाती है।
देश की तरक्की के नाम पर किये जा रहे इस पूरे कर्मकांड में, खेती भीख का कटोरा बन चुकी है, जिसे लिए भिखारी हो चुके किसान 'आधुनिक भारत के इन मंदिरों' की चारदीवारी के बाहर बैठे हैं।
इन समस्याओं का समाधान तभी किया जा सकता जब 'प्रउत अर्थव्यवस्था' पर आधारित निम्नलिखित कदम उठाए जाएं:
1. संविधान के अनुच्छेद 39(सी) के अनुसार देश के संसाधनों का कुछ हाथों में केंद्रीकरण न होने दें, जिसके लिए अमीरी रेखा लागू हो, यानी एक निश्चित सीमा तक ही धन संग्रह करने की छूट हो।
2. क्षेत्र,संसाधन,आवश्यकता, रोज़गार आदि के आधार पर उद्योगों का विकेंद्रीकरण किया जाए।
3. विभिन्न चरणों में सहकारिता लागू कर, कृषि को उद्योग का दर्जा दिया जाए।


रवींद्र सिंह 
राष्ट्रीय लोक संपर्क सचिव 
प्राउटिष्ट ब्लॉक, इंडिया (पीबीआई)

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