छद्म राजनीति -- मनोज कुमार


राजहित में नीति अवश्य ही राजनीति हो सकती है, किंतु आजकल राजनीति का स्वांग रचने के पीछे स्वहित के अलावा और कुछ भी नहीं रहता। व्यक्तिगत जीवन में तो कुछ हद तक क्षम्य भी हो सकता है, पर सार्वजनिक जीवन में अक्षम्य अपराध है। 

आजकल नेताओं का बड़बोलापन जिस तरह से बढ़ रहा है, उस हिसाब से उनकी राजनीति के कारण देश का भला होना नामुमकिन है। जनता की भलाई तो असंभव है। 

चुनावी मौसम में जिस हिसाब से वायदा किया जाता है, देश की जनता आचरज में पड़ जाती है। अब तो प्रतिव्यक्ति न्यूनतम आय की गारंटी देने का भी स्वांग रचा जा रहा है। किंतु बड़ी चालाकी से न्यूनतम आय कितने रुपये की होगी, यह वायदा नहीं करते। पिछली सरकार ने एक बार ₹32 रोजाना कमानेवाले को गरीबी रेखा से ऊपर माना था। रोजगार की गारंटी के नाम पर मनरेगा चला। परिवार के एक सदस्य को साल में 100 दिन की रोजगार की गारंटी ! साल में प्रति व्यक्ति कितनी आय हुई, यह किसी से छिपा नहीं है। भाई मेरे!समझने का कोशिश करो। इससे 100 गुना ज्यादा नेतागण और पूँजीपति लोग अपने पालतू कुत्तों पर खर्च करते हैं। मतलब सामान्य जन का एक कुत्ते के बराबर भी महत्व नहीं है।

वर्तमान सरकार खूब दंभ भर रही है। देश का खजाना अपार धन से भरा हुआ है। हम ने देश की जनता के लिए खजाना खोल दिया है। सच्चाई यह कि अगर खूब भूखे को अगर रोटी का एक नेवाला भी मिल जाए, तो थोड़ी  देर के लिए उसे खूब आनन्द मिलता है। पूँजीपतियों के द्वारा संचालित सरकार की भी यही प्रवृत्ति है। ये लोग जनता को चार साल तक भूखा रखकर जीर्ण-शीर्ण कर देते हैं और अंतिम दौर में थोड़ा-थोड़ा सबके झोली में डाल देते हैं ताकि अत्यंत दरिद्रता में जी रहे लोगों को आंशिक तृप्ति मिल जाए। सत्ता हासिल करने का यह अभी तक का लाजवाब तरीका है, चाहे किसी की भी सरकार हो। क्योंकि भारतीयों में क्षणिक सुख प्राप्तकर पिछले दुख भूलने की आदत लग गई है। भविष्य की तो लेशमात्र भी चिंता नहीं है।

किसानों के खाते में 5 हेक्टेयर तक प्रतिवर्ष 6 हजार रु. आएँगे। क्या इन्होंने बजट बनाते वक्त किसानों से पूछ लिए था कि इन्हें 5 हेक्टेयर में खेती करने में कितना खर्च होता है और कितना आमदनी होती है? मध्यम वर्ग तो बहुत खुश हो रहा है  कि इन्हें टैक्स सलैब में ₹5,00,000 तक की छूट मिली है। क्या आपको मालूम भी है कि हम कितने जगह पर टैक्स देते हैं। जीएसटी के माध्यम से टैक्स क्लेकशन बढ़ा है। टैक्स से छुटकारा नहीं मिला है। गरीब से गरीब व्यक्ति भी जिन सामानों का उपयोग करता है उसके माध्यम से टैक्स चुकाता है। किंतु मध्यम वर्ग, खासकर वेतनभोगी लोग दुगुना टैक्स चुकाते हैं। यह छूट उन्हें बेवकूफ बनाकर खुश करने का शातीर तरीका है।

भारी-भरकम टैक्स से  ईमानदार लोग को लूटकर बेइमानों को परोक्ष रुप से सहायता करना है। हलाँकि बड़े-बड़े काम इन पैसों से होते हैं। लेकिन जिस अनुपात में आम जनता टैक्स चुकाती है उस अनुपात में उनके लिए काम नहीं होता। यदि होता तो बेरोजगारी इतनी अधिक नहीं होती। गरीबी का मूल कारणों में से  बेरोजगारी सबसे बड़ा कारण है।  रोजगार देने के नाम पर स्किल डेवलपमेंट मात्र एक छलावा है, क्योंकि नौकरियाँ नगण्य है और हैं भी तो संतोषजनक वेतन नहीं है। स्टार्टप से भी सबको रोजगार नहीं मिल सकता क्योंकि इसके लिए भी पूँजी चाहिए और वह मिलती है बैंक से ,ब्याज पर , जिसे समय पर नहीं चुकाने से क्या होता है सबको मालूम है। 'मेक इन इंडिया' से भी रोजगार बढ़ने के आसार नहीं है ।  क्योंकि किसी भी बाहरी कंपनी को  भारत में आकर मुनाफा कमाना मूल उद्देश्य है -- रोजगार देना नहीं। हर क्षेत्र में केवल मुनाफाखोरी, फिर काहे का रोजगार। रोजगार के वगैर 'सर्वजनहिताय सर्वजनसुखाय' का नारा मात्र छलावे के सिवाय और कुछ नहीं है।

दरसल बहुत लोग इस षड्यंत्र को जानते हैं, लेकिन इनके खिलाफ जंग छेड़ने की हिम्मत नहीं है। इसका क्या  कारण है ? सबसे पहले इन पूँजीपतियों ने हमारी शिक्षापद्धति को धर्मविमुख बनाकर पंगु बनाया ताकि सारी मानसिक बुराईयों के हम गुलाम बन जाएँ। मानसिक बुराईयों का गुलाम मनुष्य कभी भी अन्याय के विरुद्ध संग्राम नहीं कर सकता।

पश्चिमी सभ्यता-संस्कृति का बढ़ावा देकर अश्लीलता के माध्यम से हमारी सभ्यता-संस्कृति को छद्म संस्कृति में परिवर्तित कर दिया गया है, जिसके कारण तेजी से युवाशक्ति का चारित्रिक पतन हुआ और हो रहा है। 

सभी सरकारें नशा उत्पादन को संरक्षण देकर हमारी जनता को नशाखोरी के दलदल में धकेलने का काम करती रहीं हैं। 

भारतीय इतिहास को तोड़-मरोड़कर पेश किया गया। सुभाषचंद्र बोस सरीखे सच्चे सिपाही को अहिंसावादियों के सामने बौना करके दिखाया गया। सरदार भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु, चंद्रशेखर जैसे जाँबाज क्रांतिकारियों को आतंकवादी का दर्जा देकर युवापीढ़ी को गुमराह किया जाता रहा ताकि युवाशक्ति अन्याय के विरुद्व हथियार न उठावें। अहिंसावादियों की तरह गिड़गिड़ाते रहें। शिवाजी, महाराणाप्रताप जैसे वीरों को वह स्थान नहीं मिला जो अकबर को मिला। ये सब चंद उदाहरण हैं कि कैसे भारत की युवापीढ़ी को संग्रामविमुख किया गया है।

अब ज़रा भारत सरकार की अर्थनीति पर भी विचार करके देखते हैं:

सभी सरकारें गरीब मजदूर-किसान के कल्याण करने के नाम पर सत्ता पर काबिज होती हैं, क्योंकि भारत में गरीबों की संख्या ज्यादा है, वे उनके लिए करती क्या हैं ?

 मुफ्त में अनाज, वृद्धावस्था पेंशन, मुफ्त शिक्षा, सबसिडी, छात्रवृत्ति, निशुल्क चिकित्सा, कम ब्याज दर पर ऋण इत्यादि अनेक कल्याणकारी योजनाओं के नाम पर आज तक सरकारें गरीब, मजदूर, किसान,नवयुवकों से वोट लेकर सत्ता हासिल करती रही हैं। किंतु क्या आजादी के 71 साल में भी इनकी दयनीय स्थिति में सुधार हुआ? यह यक्ष प्रश्न है और हम सब भलिभाँति जानते हैं कि दिनों-दिन हालात बिगड़ती जा रही है। अतः उपर्युक्त सभी नीतियाँ समस्या का समाधान नहीं है। केवल आमजन को मूर्ख बनाकर पूँजिपतियों का सुरक्षा कवच बनाकर रखना किसी भी सरकार की नीति है, क्योंकि उन्हीं की कृपा से सरकार बनती हैं।

 कल्याणकारी सरकार की नीति होनी चाहिए :

1. रोजगारोन्मुखी शिक्षा को बढ़ावा देना
2. वैज्ञानिकता के साथ-साथ शिक्षा में नैतिकता का समावेश।अर्थात् नव्यमानवतावाद की शिक्षा।
3. मुफ्त में देना बंद करना चाहिए। बुढ़ा हो या जवान, स्त्री हो या पुरुष, यहाँ तक कि विक्लांग मनुष्य में भी। इन सब में कुछ न कुछ हुनर होता है, जिसका सदुपयोग कर इन्हें स्वाभिमान से जीना सिखाया जा सकता है। मुफ्त में देने से आलसी लोग की संख्या बढ़ रही है, जो देश व समाज के लिए अच्छा नहीं है।
4. आमदनी और मूल्य पर नियंत्रण होना आवश्यक है ताकि भोजन,वस्त्र,चिकित्सा,शिक्षा,स्वास्थ्य जैसी न्यूनतम आवश्यकताओं की गारंटी सभी को मिल सके। 
5. सरकार को ऐसी नीति पर काम करना चाहिए ताकि क्रयक्षमता लगातार बढ़ता रहे। 
6. शतप्रतिशत रोजगार कि गारंटी सभी को देनी होगी।

  इसके लिए सरकार को निम्नलिखित व्यवस्था करनी पड़ेगी :
 (1) ग्राम-स्तर पर मौजूद सभी संसाधनों का अधिकतम उपयोग का प्रशिक्षण उसी ग्राम के लोग को देना चाहिए। हमारा देश कृषिप्रधान है। अतः कृषि पर आधारित अनेक छोटे एवं मझोले उद्योग गाँवों में लगाए जा सकते हैं।
 (2) सहकारिता के माध्यम से पूँजी का जुगाड़ करना चाहिए। जरुरत पड़ने पर यदि सरकार को पूँजी देना भी पड़े तो बिना ब्याज के दिया जाना चाहिए। 
(3) कृषि को उद्योग की दर्जा मिले ताकि जो सुविधा उद्योगों को मिलती है वो सुविधाएं कृषकों को भी मिले।
(4) स्थानीय संसाधनों के आधार पर  का कार्यक्रम चलाना चाहिए ताकि रोजगार के लिए बाहर नहीं जाना पड़े।
 (5) खनिज-संपदा से संबंधित उद्योग उसी स्थान के आसपास लगना चाहिए, जहाँ वह उपलब्ध है।
 (6) सभी तरह के उद्योग-धंधों में स्थानीय लोग को काम में लगाना चाहिए। यदि उस लायक नहीं हों, तो प्रशिक्षण देकर उस लायक बनाना चाहिए।
 (7) कच्चा माल नो प्रॉफिट-नो लॉस  (न लाभ-न हानि) के आधार पर सरकार को उद्योगों के लिए उपलब्ध करना चाहिए।
 (8) सहकारिता के आधार पर चलाए जा रहे उद्योग-धंधों में श्रमिकों का भी शेयर होना चाहिए। ऐसा करने से मजदूरों का जीवन-स्तर दिन-प्रतिदिन उच्च होता जाएगा तथा उत्पादन भी बढ़ेगा।
 (9) अत्याधुनिक तकनीक के उपयोग किए जाने पर मजदूरों के छंटनी के बजाए काम के घंटे कम करना चाहिए। शेष समय का उपयोग उनके मानसिक,आध्यात्मिक विकास में हो ,ऐसा वातावरण बनाना चाहिए। 
 (10) किसी भी स्थिति में जनसंख्या का अधिक बोझ अर्थव्यवस्था के किसी एक क्षेत्र  पर नहीं पड़ना चाहिए।
  30% जनसंख्या कृषि में, 15% कृषि आधारित उद्योग में,15% कृषि हेतु उद्योगों में, 10% व्यापार में, 20% अन्य उद्योग में तथा 10% नौकरी में संलग्न की जानी चाहिए । यह है संतुलित अर्थ-व्यवस्था का मानक।

क्या उपर्युक्त सुझाव पर वर्तमान सरकार या भावी सरकार अमल करेगी? संभवतः नहीं। क्योंकि सभी सरकारें बाहर से सामान्य जनता के कल्याण के लिए शपथ लेती है, पर भीतर से चंद पूँजीपतियों के प्रति वफादारी निभाते हैं। और ऐसा करें भी क्यों न, सत्ता सुख जो भोगना है।

एक आँकड़े के अनुसार वर्तमान सरकार के कार्यकाल में 1% लोगों की संपत्ति में 39% की वार्षिक दर से वृद्धि हुई है, तो वहीं दूसरी ओर, शेष लोगों की संपत्ति में  3% की दर से बढ़ोतरी हुई है। इसीलिए आर्थिक विषमता में बेतहाशा वृद्धि हो रही है। चाहे किसी की भी सरकार हो, यही होता रहेगा। अतः देर-सवेर प्रउत अर्थनीति ही सभी समस्याओं का एकमात्र समाधान है।

उठो वीर जवानों ! नैतिकवानों ! विप्लव का शंख बज चुका है। उखाड़ फेकों इस सड़ी-गली अर्थ व्यवस्था को ! 


Post a Comment

0 Comments