जान के बदले जान: ये कैसा विधान ? -- आचार्य दिलीप



जान के बदले जान -- यह एक वहशी या बर्बर समाज की सोच है? किसी आवेश में आकर किसी की जान लेना तथा किसी की जान सरकारी तंत्र के द्वारा सुनियोजित ढंग से क़ानूनी प्रक्रिया के द्वारा जीत के उत्सव के रूप में लेना दो अलग सी बातें हैं। मैं जो लिख रहा हूँ उस पर तीखी विपरीत प्रतिक्रियाएँ होने की पूरी सम्भावनाएँ हैं।   

इस सम्बन्ध में मुझे श्रीमती प्रियंका वाड्रा के सम्बन्ध में एक घटना याद आई जिसका यहाँ पर उल्लेख करना आवश्यक समझता हूँ।  कुछ समय पहले, वो जेल में नलिनी से मिलने गई थीं।  नलिनी उनके पिता राजीव गांधी की हत्या के मामले में आजीवन कारावास की सजा काट रही है।  जैसा मुझे सुनने को मिला कि प्रियंका ने उसे व्यक्तिगत रूप से माफ़ कर दिया है। यह जानकर मेरे अन्दर उनके प्रति अच्छी भावना जगी थी।  मैं यहाँ पर अपने पाठको को स्पष्ट कर दूँ की एक राजनेत्री की दृष्टि से वो मुझे एक बड़ी साधारण सोच की महिला लगती हैं। 

तो प्रश्न है : क्या सभ्य समाज का काम जान लेना है ? जान तो परमात्मा देते हैं और वही लेते भी हैं। लेकिन समाज में अनुशासन बना रहे उसके लिए दंड विधान का होना भी आवश्यक है, परन्तु दंड के विधान का एक तात्पर्य  यह भी है कि अपराधी को अपनी कुकृत्य का बोध हो और वह फिर समाज में साधारण जीवन यापन का सुयोग पा सके। फाँसी की सजा देकर हम उस मनुष्य को अपने जीवन में सुधार और प्रायश्चित का मौका नहीं दे रहे हैं। इसके अलावा, हमें नहीं भूलना चाहिए कि हमारी कानून व्यवस्था में कई कमियाँ हैं और पुलिस, जाँच प्रक्रिया, वकील, न्यायधीश आदि के स्तर पर हुई लापरवाही और भूल की संभावना को भी नकारा नहीं जा सकता है। ऐसे में यदि किसी निर्दोष को अपनी जान से हाथ धोना पड़े, तो उसका जिम्मेदार कौन होगा? 

बलात्कार तथा हत्या के मामले, जब से मानव समाज बना है, समाज में घटित हो रहे हैं।  बलवान स्त्री या पुरुष, निर्बल स्त्री या पुरुष पर अपनी इच्छा थोपता रहा है तथा इसमें काम पिपासा की भावना भी शामिल है।  ताकतवर समाज (स्त्री या पुरुष) दूसरों को गुलाम बनाकर अपने शारीरिक तथा मानसिक क्षुधा को मिटाता रहा है।  ऐसा मनोभाव मनुष्य में जन्मगत निहित है हालाँकि ऐसा करने से मनुष्य की अधोगति होती है, मनुष्य जड़ता के दलदल फंसा रहता है।  

मानव मन उत्तरोत्तर विकाश करता गया तथा उसके अन्दर धार्मिक भावना उजागर हुई जैसे कि क्षमा भाव, दया भाव, करुणा भाव, सेवा भाव इत्यादि और इन्ही भावनाओं की वजह से आज हम एक सभ्य समाज में रह रहे है ।  मनुष्य का विकाश पथ पशुत्व से उठकर देवत्व की तरफ चलना है ।  देवत्य का पथ ही मनुष्य के तथा समाज के प्रगति का पथ है।

 हमारे शास्त्रों में ऐसा उल्लिखित है की यदि कोई घर में आग लगाने आये, माँ-बहन की इज्जत से खिलवाड़   करे, तो उसे आताताई माना जाता है तथा ऐसा करने वाले की यदि आत्मरक्षा के दौरान हत्या भी हो जाए, तो उसे क्षम्य माना गया है।  बलात्कारी भी आताताई के अन्तर्गत आएँगे।  

यहाँ यह भी स्पष्ट करना होगा की अपराधी अपराध करने से पहले दंड विधान की बात नहीं सोचता है।  दंड विधान का डर यदि होता तो सारे अपराध समाप्त हो गए होते । मनुष्य अपराध दो कारणों से करते हैं : अभावगत तथा स्वभावगत।  

अभावगत अपराध अभावपूर्ति होने के साथ ही कम हो जाते हैं। स्वभावगत अपराधी मानसिक विकृतियों  या विशिष्ट हार्मोन्स के कम तथा अधिक क्षरण के कारण अपराध करते हैं।  ऐसे लोगो के अन्दर अपराध करने की प्रवृति को शल्य चिकित्सा के द्वारा या दवाओं से  रोका जा सकता है अथवा ठीक किया जा सकता है । दंड विधान में इस प्रकार की चिकित्सिक जाँच तथा उसका उपचार भी शामिल होना चाहिए।      

इस सदी के महान दार्शनिक श्री प्रभात रंजन सरकार के अनुसार एक विकशित समाज में फाँसी (कैपिटल पनिशमेंट) का प्रावधान नहीं होना चाहिए। विश्व के 102 देशों में मृत्युदंड को खत्म कर दिया गया है। इसलिए जहाँ तक निर्भया मामले में चार दोषियों को फाँसी की सजा का प्रश्न है, तो मेरी राय, बिना किसी क्षुद्र भावना में बहे, श्री प्रभात रंजन सरकार जी के साथ है।  

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