साम्प्रदायिकता के खिलाफ एकजुट हों नीतिवादी

  • रवींद्र सिंह


 आजकल फेसबुक, यूट्यूब, ट्विटर आदि जहाँ देखिये, एक संप्रदाय और मज़हब को मानने वाले दूसरे संप्रदाय के लोगों को खुलेआम धमकी और गाली-गलौज दे रहे हैं। कहीं किसी कोने में कोई एक मज़हब के खिलाफ जहर उगलता है और इंटरनेट पर डाल देता है और तुरंत वो ज़हर  हर किसी के दिलो-दिमाग में घुल जाता है। टीवी पर किसी न किसी सांप्रदायिक मुद्दे पर खून में उबाल पैदा कर देने वाली बहसें दिन-रात चल रही हैं। इन्हे पढ़-सुन कर लोग भी सोशल मिडिया पर टिप्पणियां कर रहे है। हर कोई अपने मत का अपने ढंग से समर्थन कर रहा है। जो तर्क-वितर्क नहीं कर सकते, वो कुतर्क रहे  हैं और मारामारी पर उतारू हो जाते हैं।  


भारतवर्ष में 6 मज़हब हैं : -- हिन्दू, इस्लाम, सिख, ईसाई, बौद्ध और जैन। हिन्दू में 3000 जातियां और 25,000  उपजातियां हैं। मुसलमानों में विभिन्न मतों के अनुसार 73 से 308 तक संप्रदाय हैं; ईसाई, बौद्ध और जैन मतों में भी कमोबेश ऐसा ही है। । इतनी भिन्नताओं और विचित्रताओं के कारण मतभेद और संघर्ष पैदा होना अस्वाभाविक नहीं है। अगर अकेले 2011 से 2017 तक की अवधि में 5000 से अधिक सांप्रदायिक दंगों की घटनायें हो चुकी हैं, तो पिछले 72 सालों में और उससे पहले कितने सांप्रदायिक और जातिगत दंगे हुए होंगे इसका अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं है। 

लेकिन यहाँ यह जानना महत्वपूर्ण है कि इन दंगों के लिए रोटी के संघर्ष में लगा आम आदमी इतना दोषी नहीं है जितना कि सांप्रदायिक और राजनैतिक नेतागण, जो अपनी सत्ता को बनाये रखने के लिए लोगों को जाति,मज़हब, भाषा, क्षेत्र आदि के आधार पर बांटे रखना चाहते हैं। सन 47 से पहले अंग्रेज़ों ने ऐसा करके इस देश के लोगों को  बांटे रखा। जाते-जाते भी वो मुस्लिम अल्पसंख्यकों के मन में हिन्दू बहुसंख्यकों का भय पैदा कर देश का बंटवारा कर गए। आज़ादी के बाद वही काम देश के नेता कर रहे हैं। वर्तमान तथाकथित लोकतान्त्रिक व्यवस्था की दलगत राजनीति में लगभग सभी पार्टियां लोगों को किसी न किसी आधार पर बाँट कर वोट बटोर लेना चाहती हैं। 

जहाँ एक ओर मुस्लिमों एवं दलितों का वोट बैंक की तरह से इस्तेमाल किया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर बहुसंख्यक हिन्दू आबादी के मन में यह भय बिठाया जा रहा है कि अल्पसंख्यक मुस्लिम आबादी कुछ ही समय में अपनी आबादी बढ़ा कर बहुसंख्यक हो जायेगी और देश पर कब्ज़ा कर लेगी , जबकि सच्चाई यह कि  अगर मुस्लिम आबादी वर्तमान वृद्धि दर से बढ़ती रही, तो उसे हिंदू जनसँख्या से ज्यादा होने में 200 वर्षों से अधिक लगेंगे, जो कि संभव नहीं दिखता क्योंकि मुसलमानों की वृद्धि दर में तेजी से कमी आ रही है: 2001 और 2011 के बीच मुस्लिम आबादी की वृद्धि दर में 5 प्रतिशत की कमी आई है। इसके अलावा मुस्लिम जनसँख्या वृद्धि दर हिन्दुओं से ज्यादा होने पर भी समाजार्थिक रूप से पिछड़े समुदायों जैसे अनुसूचित जाति और जनजाति तथा पिछड़े क्षेत्रों जैसे झारखण्ड, छत्तीसगढ़ और बिहार की जनसँख्या वृद्धि दर के बराबर है, जिससे यह स्पष्ट होता है उनकी जनसँख्या ज्यादा होने का कारण है सामाजिक,आर्थिक और शैक्षणिक पिछड़ापन, ना कि मात्र मज़हबी कट्टरपन्न। आदमी जितना गरीब होगा, उसके बच्चे उतने ही ज्यादा होंगे। 

इसी तरह बेरोज़गारी का कारण आरक्षण को बता कर निचली जातियों के खिलाफ ऊँची जाति के लोगों  के मन में वैमनस्य पैदा कर राजनीति की जा रही है। जबकि सच्चाई यह है आज देश में 4 प्रतिशत से भी कम रोज़गार सरकारी क्षेत्र में है, जिसमें आरक्षण लागू होता है, बाकी 96 प्रतिशत निजी क्षेत्र में कोई आरक्षण नहीं है। इसलिए बेरोज़गारी का कारण आरक्षण नहीं बल्कि रोज़गार की भारी कमी है। आज हर साल देश में कम से कम 1 करोड़ से अधिक नए रोज़गार चाहिए जबकि हर साल 5 लाख नौकरियां भी पैदा नहीं हो रही हैं।  

दरअसल बढ़ती जनसँख्या और बेरोज़गारी ही नहीं बल्कि दूसरी तमाम समस्याओं का एकमात्र कारण है कि आज देश की 80 प्रतिशत संपत्ति मात्र 10 प्रतिशत लोगों के हाथ में सिमट गई है और 90 प्रतिशत आबादी केवल 20 प्रतिशत संसाधनों के लिए छीनाझपटी कर रही है। लोग इस तथ्य से बेखबर रहें और संगठित होकर इस शोषण के खिलाफ न लड़ सकें, इसलिए धूर्त राजनीतिज्ञ उन्हें साम्प्रदायिकता और जातिगत संघर्ष में उलझाए रखना चाहते हैं। 

आज आवश्यकता है कि नैतिक लोग एकजुट होकर 'एक चौका, एक चूल्हा, एक है मानव समाज' के नारे का उद्घोष करें और सभी शोषितों को संघबद्ध कर पूंजीवादी शोषक व्यवस्था के खिलाफ विरामहीन संघर्ष छेड़ दें। 

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