कोरोना संकट और भारतवर्ष की प्रगति।

• प्रोफेसर रवि प्रताप सिंह

कोरोना वायरस की महामारी ने सबकुछ ठप्प कर के दुनिया के सामने अभूतपूर्व और विचित्र जटिलताएँ उत्पन्न कर दी हैं। इस महामारी के नियंत्रण के बाद दुनिया पहले जैसी नहीं रहेगी; आगे इसका स्वरूप कैसा होगा — यह स्वाभाविक प्रश्न बहुतों के मन-मस्तिष्क में हिलोरें ले रहा है। इस महामारी के चलते भारत सहित विश्व के समक्ष ऐसी जटिलताएं शुरू हुई हैं जिनके दूरगामी प्रभाव होने जा रहे हैं और जो प्रकारांतर से इसी बात को पुनः रेखांकित करती है कि भारत समेत विश्व की समस्याएँ सरकारों के बदलने से हल होने वाली नहीं हैं, व्यवस्था परिवर्तन करना होगा।


आर्थिक संकट—
दुनिया के अर्थशास्त्रियों ने सन 2019 के आखिरी महीनों से ही मंदी की आशंका जतायी थी। कोरोना संकट इस मंदी को खाद-पानी दे रहा है। अब तो अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आई एम एफ) भी कह रहा है कि यह मंदी 1930 की महामंदी से अधिक विकराल होने जा रही है। यह विकशित और विकाशशील दोनों ही तरह के राष्ट्रों को अपनी चपेट में ले रहा है। सीएमआईइ  की 7 अप्रैल की रिपोर्ट है कि भारत में कुल बेरोजगारी 23.4 प्रतिशत हो गयी है जबकि शहरी बेरोजगारी 30.9 प्रतिशत।

श्री प्रभात रंजन सरकार तथा भारतीय मूल के अमेरिकी प्रोफेसर रवि बत्रा के व्यवसाय चक्रों के  अध्ययन के आधार पर कहा जा सकता है कि सन् 2020 से आरम्भ यह महामन्दी छः वर्षों तक (सामाजिक, आर्थिक, मानसिक सभी क्षेत्रों में) चलेगी ही और फिर 2029-30 से 2036 तक स्फीति और महायुद्ध का काल होगा। इन उतार चढ़ावों की तीव्रता जितनी अधिक होगी आमजन के कष्ट और बर्बादी उतनी अधिक।  प्रउत विचारधारा मानती है कि लोकतांत्रिक, सार्वभौमिक, विज्ञान व नीतिपूर्ण समताकारी प्रवृत्तियों का विश्व सरकार के वास्तविक संयोजन द्वारा इन उतार चढ़ावों को हल्का किया जा सकता है और इनकी विकरालता को काफी कम किया जा सकता है। अब तक चल रही वैश्विक व्यवस्था अप्रासंगिक होती जा रही है।  इस व्यवस्था के आधार स्तम्भ --  विश्व स्वास्थ्य संगठन, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व बैंक आदि -- बहुत कमजोर साबित हुए हैं। ‘प्रउत’ है प्रगतिशील उपयोग तत्व [अंग्रेजी में 'प्रोग्रेसिव यूटिलाइजेशन थ्योरी'], जो  पूंजीवाद और साम्यवाद के अतिवादी सनक से अलग वैश्विक दृष्टि तथा स्थानीय जन विकाश की  एक समन्वित विचार प्रणाली है।

प्रउत है तो सामाजिक-आर्थिक दर्शन लेकिन यह अध्यात्म, योग व तंत्र के वैज्ञानिक व युक्तिसंगत पहलुओं से भी जुड़ा हुआ है। योग का ईश्वर प्रणिधान, मधुविद्या व  ध्यान मस्तिष्क की तरंगों की वक्रता को कम करके रक्तचाप तथा मन की व्यग्रता को नियंत्रित करता है। प्राणायाम प्राणवायु बढ़ाकर फेफड़े ही नहीं, बल्कि समस्त देह की  कोशिकाओं को भी पुनर्जीवित करता है। यौगिक आसन शरीर, खासकर मेरुदंड, को लचीला बनाकर विकारों को दूर करते है।  इन तीनों  को एक साथ व्यवहार कर रोग प्रतिरोध की क्षमता को काफी सुधार सकते हैं। कोविड-19 जैसे दुष्कर वायरसों से लड़ने हेतु अच्छी इम्मुनिटी यानी रोग प्रतिरोधता आवश्यक है।

प्रवासी श्रमिकों का पलायन व श्रम सम्बन्धों का संकट

लाकडाऊन के साथ ही दिल्ली व मुंबई जैसे महानगरों से जिस तरह जीविका और मौलिक सुविधाओं से वंचित होने के तात्कालिक संकट तथा संभावित आशंका के चलते दिहाड़ी मजदूरों को जैसे भागना पड़ा, इससे सभी परिचित हैं। इस पलायन में केंद्र सरकार की कार्ययोजना, दिल्ली सरकार की कार्यविधि तथा फैक्ट्रियों व संस्थाओं के मालिकों की असमर्थता व असहयोग—सभी की भूमिका पर प्रश्नचिह्न तो लगे ही हैं, इससे इन दिहाड़ी मजदूरों में विश्वास का बड़ा संकट भी उत्पन्न हो गया है।   सूरत के  प्रवासी श्रमिक तो बदहाली से परेशान हो विद्रोह करने के लिए ही विवश हो गए। ऐसे में इनको काम पर वापस लौटने से पहले बहुत सोचना पड़ेगा। श्रमिकों के अभाव में  इन फैक्ट्रियों व संस्थाओं को पुनः आरंभ करना एक बड़ी चुनौती है।   अभी से माना जा रहा है कि 40 करोड़ दिहाड़ी मजदूर  परिवार बेकारी के चलते अत्यधिक गरीबी में गिरने जा रहे हैं।

अब बिहार, यूपी, छत्तीसगढ़ आदि की सरकारें अपने ही राज्य में रोजगार के विकल्प ढूढ़ने को बाध्य हैं। परन्तु  यह दीर्घकालीन रणनीतिक प्रक्रिया है। प्रउत विचारधारा पहले से समझाती आ रही है कि प्रत्येक क्षेत्र में स्थानीय  संसाधनो के अनुरूप अधिक से अधिक उद्यम लगने चाहिए जिन्हें समन्वित सहकारी समितियों द्वारा चलाया जाय। समन्वित सहकारी समितियाँ प्रचलित सहकारी समितियों की तुलना में  कहीं अधिक व सही अर्थों में जनवादी हैं। अधीनस्थ श्रमिकों व आमजन को इन समितियों में अंशधारक हितधारी के रूप में स्वामित्व दिया जाय। इससे श्रमिकों का पलायन कम होगा, रोजगार के अवसर बढ़ेंगे और क्षेत्रीय विकाश  में समृद्धकारी संतुलन आयेगा। महानगरीय इलाकों का बोझ और सामाजिक विकृतियाँ भी घटेंगी।

आर्थिक उत्पादन के वैश्विक धुरी में बदलाव—भारत के लिए अवसर या चुनौती ?

  चीन पिछले तीन दशकों से हर तरह के उपभोक्ता तथा निम्न प्रौद्योगिकी वस्तुओं के उत्पादन की वैश्विक धुरी बन गया था। हाल ही में दक्षिण पूर्व एशिया के कुछ देश, इंडोनेशिया, मलेशिया, थाइलैंड आदि भी इसमें शामिल हो गए।  आज अमेरिका व यूरोप समेत पूरी दुनिया चीन से नाराज़ है। जापान आर्थिक दूरी की नीति के तौर पर वहाँ से अपना कारोबार समेट ही रहा है। भारत के लिए एक बड़ा अवसर है, आर्थिक धुरी के रूप में चीन का स्थान लेने का। पर यह अवसर तो भारत के पास पहले भी था, लेकिन हम इसका लाभ नहीं ले पाये। दुनिया का सकारात्मक मूड भारत को अवसर तो दे रहा है, पर हमें सही तैयारी शीघ्र करनी होगी, नहीं तो फिर चूकेंगे। मत भूलिए, ब्राजील, मेक्सिको, दक्षिण पूर्व एशिया और खुद यूरोप भी स्पर्धा में हैं।  भारत को अवसर तो मिला है, प्रसंशा भी खूब मिल रही है, पर थाली में मुकुट सज़ाकर मिलेगा, यह भ्रम पालने से नहीं चलेगा।

हमें समझना होगा कि एक कम्युनिस्ट देश होने के बावजूद चीन पूंजीवादी देशों की पसंद बना अपनी व्यस्थागत स्थिरता (राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक हर स्तर पर) और अनुशासन के चलते। भारत में व्यस्थागत स्थिरता और अनुशासन लाने के लिए बहुत आवश्यक है कि वोट की राजनीति के तहत धार्मिक, सांप्रदायिक व जातीय ध्रुवीकरण और ठकेदारी का खेल बंद हो; संप्रदायों की विविधता का उपयोग तो हो पर उनकी प्रत्यक्ष और परोक्ष (धर्म और अध्यात्म जैसे उत्कृष्ट शब्दों की आड़ में पुरापन्थवाद, पवित्र ग्रंथों की अंधभक्ति के द्वारा) गला काट प्रतियोगिता रोका जाय। पर कैसे? साम्प्रदायिक और जातीय वर्चस्व की संकीर्ण भाव-प्रवणताओं (सेंटिमेंट्स) को जाति, पंथ या धर्म-निरपेक्षता की तटस्थ नीति से नियंत्रित नहीं किया जा सकता। विज्ञानवाद, मानव धर्म, वैज्ञानिक अध्यात्म, वैश्विक भ्रातृत्व और एकेश्वरवाद को एकताकारी शक्ति (यूनिफाइङ्ग फोर्स) के तौर पर व्यापक धनात्मक नीति के रूप में देश के भीतर और बाहर ले के चलना होगा।

नेतृत्व का संकट

व्यवस्था परिवर्तन की सबसे बड़ी चुनौती वैश्विक नेतृत्व को लेकर सामने आने जा रही है। अब तक तथाकथित लोकतान्त्रिक व्यवस्थाओं में राजनीतिक दल संप्रदाय, जाति, नस्ल, पुरापंथ, भाषा, क्षेत्रादि संकीर्ण भावनाओं का उपयोग कर सत्ता हासिल तो कर लेते हैं पर अपनी घटिया नीतियों से समाज व मानवता की भारी क्षति करते रहे हैं और  साधनों की बरबादी भी। इस महामारी ने अमेरिका व चीन जैसी महाशक्तियों की असलियत खोल कर रख दी है। अनेक देश पूंजीवादी छल-प्रपंचों में फंसे हुए हैं तो कुछ देशों में साम्यवाद की आड़ में तानाशाही बादशाहत चलती रही है। दुनिया पूंजीवाद और  साम्यवाद के बीच झूलती रही है। इससे बाहर निकलना होगा।
कोरोना वाइरस को लेकर चीन गहरे संदेह के घेरे में है—इस वाइरस की उत्पत्ति को लेकर, इसके प्रसार की सूचनाओं को छिपाने को लेकर तथा महामारी से गंभीर रूप से ग्रस्त देशों की मदद में भी घटिया आपूर्ति और मुनाफाखोरी को लेकर। संकटग्रस्त देशों की जनता चीन की सरकार के खिलाफ गुस्से में है । इस महामारी से इन देशों पीड़ा जितनी बढ़ेगी, मौतें जितनी अधिक होंगी, इन देशों की जनता का बढ़ता गुस्सा इन सरकारों पर चीन से बदला लेने, क्षतिपूर्ति लेने तथा उसे ठीक करने का दबाव उतना ही अधिक बढ़ेगा। अमेरिका की प्रतिष्ठा को, उसकी प्रभुता को जबर्दस्त धक्का लगा। है। अमेरिका और इसके सहयोगी इसे आसानी से पचा नहीं पाएंगे। अब प्रमुख देशों के नेताओं के बीच कड़ा मुकाबला होने जा रहा है कि कॉविड-19 के बाद के दौर में नई विश्व व्यवस्था का नेतृत्व कौन करेगा?
प्रोफेसर रवि प्रताप सिंह











(लेखक गोरखपुर विश्वविद्यालय के वाणिज्य विभाग में अध्यापन करते हैं।)

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