प्राउट थिंक टैंक ने दिया प्रति-पलायन (रिवर्स माइग्रेशन) का समाधान



प्राउट थिंक टैंक (पीटीटी) श्री प्रभात रंजन सरकार द्वारा प्रतिपादित सामाजिक-आर्थिक दर्शन प्रउत पर आधारित एक नीति-निर्माण निकाय है , जिसने भारतवर्ष में  लॉकडाउन से पैदा हुए  प्रति-पलायन (रिवर्स माइग्रेशन)  की समस्या से निपटने के लिए  एक नीतिगत दस्तावेज  तैयार किया है। 

प्राउट थिंक टैंक में कई गंभीर  प्रउत विचारक, विद्वान और कार्यकर्ता शामिल हैं। यह सार्वजनिक हित के किसी भी स्थानीय या वैश्विक मुद्दे पर प्राउट-आधारित नीतियाँ प्रस्तावित करता है।

वर्तमान में, पीटीटी के सदस्यों में गणेश भट्ट, प्रोफेसर आर.पी. सिंह, सुरेंद्र रेड्डी, आदर्श चंद्राकर, सुब्रमण्यन के. राजा, धर्मेंद्र सिन्हा, कान्हू चरण बेहुरा, प्रणव कौल, रवींद्र सिंह, निधि सती, नईम खान, वाईवी सिंह, तेजस, आचार्य अच्युतानंद अवधूत और आचार्य संतोषानंद अवधूत शामिल हैं।  जल्द ही, कई और विश्वस्तरीय  प्रसिद्ध प्रउत विचारक और कार्यकर्ता पीटीटी में शामिल होंगे।

रिवर्स माइग्रेशन या प्रति-पलायन से उत्पन्न समस्याओं को सुलझाने के लिए प्राउट थिंक टैंक ने निम्नलिखित नीतियों को प्रस्तावित किया है :




प्रति-पलायन का प्रउतवादी समाधान 

कोविड -19 महामारी को फैलने से रोकने के लिए रोकथाम के उपाय के रूप में, चार घंटे पहले सूचना देकर भारत सरकार ने 24 मार्च 2020 को जल्दबाजी में एक अनियोजित राष्ट्रव्यापी तालाबंदी की घोषणा की थी, जिसके कारण देश की अर्थव्यवस्था एक दिन के भीतर ही पूरी तरह से जाम हो गई। इसने दिहाड़ी मजदूरों, विक्रेताओं, स्वरोजगार करने वालों, खुदरा विक्रेताओं, छोटे-बड़े उद्योगों व व्यावसायिक उद्यमों में भय पैदा कर दिया। प्रवासी श्रमिकों को काम, मजदूरी, आश्रय, भोजन, स्वास्थ्य आदि सुविधायों से हाथ धोना पड़ा। अनुमानतः 8 करोड़ से अधिक प्रवासी मजदूर तनाव और चिंता के सबसे बुरे शिकार बन गए, जिसे स्वतंत्र भारत में लोगों की दुर्दशा और लाचारी के सबसे गंभीर उदाहरण के रूप में दर्ज किया गया है। मालिकों की उदासीनता और लापरवाही तथा बीमारी के डर व आशंका ने उन्हें अपने पैतृक गाँवों / कस्बों की ओर पलायन करने के लिए मजबूर कर दिया। सार्वजनिक परिवहन पर रोक ने प्रवासी श्रमिकों में दहशत पैदा कर दी; उन्हें अपने  परिवार के बारे में चिंता थी और इसलिए कई श्रमिकों ने पैदल ही सैकड़ों किलोमीटर दूर अपने मूल स्थानों की यात्रा शुरू कर दी।  रास्ते में उन्हें कई तकलीफों का सामना करना पड़ा,  जिसके कारण बहुत से लोगों की मौत तक हो गई। 

मजदूरों का प्रवास दशकों से चला आ रहा है, लेकिन यह अभूतपूर्व रिवर्स माइग्रेशन या प्रति-पलायन अर्थात मूल निवास की ओर लौटना  कुछ ही हफ्तों के बहुत कम समय में हुआ है। शारीरिक व बौद्धिक श्रम करने वाले अपने मूल स्थानों को लौट आए हैं, और यह रिवर्स माइग्रेशन राज्य, देश और दुनिया के स्तर पर कुछ और समय तक जारी रहेगा। यह प्रवासी श्रमिक वर्ग शहरों में काम करने वाली युवा जनशक्ति का एक प्रमुख हिस्सा है।
 रिवर्स माइग्रेशन के कारण भारत में एक अजीबोगरीब स्थिति पैदा हो गई है। जहाँ एक ओर शहरों में स्थित उद्योगों व व्यावसायिक सेवाओं को मजदूरों की कमी का सामना करना पड़ रहा है, वहीं दूसरी ओर, गाँव और छोटे शहर बेरोजगारों से भर गए हैं। लौट आए इन प्रवासियों में से अधिकांश अपने कड़वे अनुभवों, मालिकों के अमानवीय व्यवहार और सरकार तथा पुलिस से अपमानित होने के कारण शहरों में वापस नहीं लौटना चाहते हैं। गैर-सरकारी संगठनों द्वारा किए गए राहत कार्यों ने प्रभावित लोगों को एक अस्थायी समाधान तो दिया है, लेकिन देश की सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था से लोगों का जो भरोसा उठ चुका है उसे वे बहाल नहीं कर सकते।

प्रवासी श्रमिकों की समस्याओं का मूल कारण:

 वर्तमान परिस्थितियों का प्रमुख कारण यह है कि लोगों को आजीविका की तलाश में अन्य शहरों, राज्यों या देशों में जाने के लिए मजबूर होना पड़ता है; लोगों को अपने मूल निवास के आसपास काम नहीं मिलता। आकार में निरंतर छोटे होते खेत, सिंचाई सुविधाओं की कमी आदि खेती को घाटे का सौदा बना देते हैं, साथ ही  शहरी जीवन की चमक-दमक का आकर्षण भी पलायन का एक कारण है ।

    उपरोक्त स्थिति उस सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था का परिणाम है जिसका हम अनुसरण कर रहे हैं; मिश्रित अर्थव्यवस्था, समाजवाद या उदारीकरण-- नाम चाहे जो हो -- ये क्रोनी कैपिटलिज्म अर्थात पक्षपात पर आधारित पूँजीवाद के विभिन्न रूप हैं। बेरोजगारी पूँजीवादी अर्थव्यवस्था की देन है, जिसमे वस्तु और सेवाओं का उत्पादन लाभ के लिए किया जाता है। वहीं दूसरी ओर, अगर सामूहिक आर्थिक संरचना के अंतर्गत उत्पादन सामूहिक उपभोग के लिए किया जाए नाकि लाभ के लिए, तो  बेरोजगारी का नामोनिशान भी नहीं होगा।

पूँजीपति कम से कम पैसा लगाकर उत्पादन करने की कोशिश करते हैं, और अधिक से अधिक मूल्य पर उत्पादित माल बेचकर ज्यादा से ज्यादा लाभ कमाना चाहते हैं। इससे उत्पादन व्यवस्था का अधिक से अधिक केन्द्रीकरण हो जाता है  और साथ ही प्राकृतिक और मानव संसाधनों का दुरुपयोग या अनुपयोग होता है।

पूँजीपतियों का मानना ​​है कि पृथ्वी की सतह पर संसाधन समान रूप से वितरित नहीं हैं; कुछ स्थान संपन्न हैं जबकि कुछ अन्य स्थान संपन्न नहीं हैं। इस सोच के कारण कई संसाधनों की उपेक्षा कर दी जाती है और कुछ संसाधनों का अत्याधिक शोषण किया जाता है । इसका कुल परिणाम यह होता है कि ग्रामीण क्षेत्र औद्योगिक विकाश और रोजगार के अवसरों से वंचित हो जाते हैं।



समाधान:

प्रउत के विकेंद्रीकृत आर्थिक सिद्धांतों का कार्यान्वयन लघु और दीर्घावधि दोनों में बेरोजगारी की समस्या को हल करने का एकमात्र तरीका है।
प्रउत बताता है कि “आर्थिक शोषण को रोकने और आम लोगों की दुर्दशा को दूर करने का केवल एक ही तरीका है, और वह है अर्थव्यवस्था के सभी क्षेत्रों में विकेंद्रीकृत अर्थव्यवस्था की नीति को लागू करना। केंद्रीकृत अर्थव्यवस्था कभी भी दूरदराज के गाँवों की आर्थिक समस्याओं को हल नहीं कर सकती है। आर्थिक नियोजन निम्नतम  स्तर से शुरू होना चाहिए, जहाँ सामाजिक-आर्थिक इकाई के सभी सदस्यों के लाभ के लिए स्थानीय लोगों के अनुभव, विशेषज्ञता और ज्ञान का दोहन किया जा सकता है। सभी प्रकार की आर्थिक समस्याओं का समाधान तभी किया जा सकता है जब आर्थिक संरचना विकेंद्रीकृत अर्थव्यवस्था के आधार पर बनाई जाए। ”

 स्थानीय लोगों के बीच 100% रोजगार सृजित करने के लिए, प्रउत अल्पावधि और दीर्घकालिक आर्थिक योजना दोनों का समर्थन करता है।

अल्पावधि योजना के अंतर्गत, जीवन की सामूहिक न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए श्रम-गहन उद्योगों को तुरंत शुरू किया जाना चाहिए, या जहाँ वे पहले से मौजूद हैं, उन्हें अधिक उत्पादक बनाया जाना चाहिए। ये उद्योग मात्र खपत के लिए उत्पादन करें। उनमें कार्यरत लोगों को पर्याप्त क्रय शक्ति की गारंटी देने और उनके निरंतर अस्तित्व और विकाश को सुनिश्चित करने के लिए उन्हें उचित लाभ भी प्रदान करना चाहिए। जहाँ वास्तव में कोई उद्योग नहीं है, वहाँ बेरोजगारी की समस्या को कम करने के लिए सभी प्रकार के कृषि-आधारित और कृषि-हेतु उद्योगों को विकशित किया जा सकता है।

दीर्घकालिक योजना में, सामाजिक-आर्थिक इकाई की उत्पादक क्षमता को बढ़ाने के लिए पूँजी-गहन उद्योगों को भी विकशित किया जाना चाहिए। प्रउत त्रिस्तरीय आर्थिक संरचना की वकालत करता है, जिसमें छोटे स्तर के निजी स्वामित्व वाले व्यवसाय, मध्यम स्तर की सहकारी समितियाँ और बड़े आकार वाले सरकार द्वारा प्रबंधित मूल उद्योग हैं। इस तरह की आर्थिक संरचना आत्मनिर्भरता, अधिकतम उपयोग, तर्कसंगत वितरण, विकेंद्रीकरण, युक्तिकरण और सभी लोगों के जीवन स्तर में प्रगतिशील वृद्धि के सिद्धांतों पर आधारित होनी चाहिए। नए उद्योगों, नए उत्पादों और नवीनतम वैज्ञानिक खोजों का उपयोग करने वाली नई उत्पादन तकनीकों के कभी न खत्म होने वाले निर्माण के माध्यम से, अर्थव्यवस्था की जीवनी शक्ति को बढ़ाया जा सकता है। दीर्घकालिक आर्थिक योजना के अंतर्गत, सौ प्रतिशत रोजगार को बनाए रखने के लिए काम के घंटे भी उत्तरोत्तर कम किए जा सकते हैं।


प्रउत  के अनुसार अल्पावधि की रणनीति के रूप में निम्नलिखित कदम उठाए जाने चाहियें :
   राज्य और केंद्र सरकार की विभिन्न योजनाओं जैसे रोजगार सृजन (नरेगा आदि), एमएसएमई (सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योगों)  को सहायता, कृषि अनुदान, सब्सिडी, पीडीएस आदि का तालमेल बैठा कर उनका एक एजेंसी के माध्यम से कार्यान्वयन।
श्रम गहन परियोजनाओं को सर्वोच्च प्राथमिकता पर लिया जाए , जैसे
  -  उपयोग न होने वाली उपजाऊ भूमि तक फीडर सड़कों का निर्माण।
  -  जीवन की बुनियादी आवश्यक वस्तुओं का उत्पादन करने के लिए कुटीर उद्योग।
  -  खेती और खेती सम्बंधित गतिविधियों में सहयोग को बढ़ावा देना।
  - स्थानीय रूप से उपलब्ध कच्चे माल के आधार पर श्रम-गहन कृषि-आधारित व कृषि-हेतु उद्योगों का गठन।
  - शिक्षित वृद्ध महिलाओं द्वारा बच्चों की देखभाल करने के लिए नर्सरी।
  - रोजगार पैदा करने के लिए वनीकरण; पेड़-पौद्यों पर आधारित उद्योग शुरू करने और पर्यावरण को बचाने        के लिए अवसर पैदा करना।
  - नदी, झील और जल के अन्य स्त्रोतों के किनारे उपयुक्त प्रजाति के पौधे लगाए जाने चाहियें।
  - जल संरक्षण कार्यक्रम और तालाबों तथा झीलों का कायाकल्प।

 स्थानीय युवाओं को कौशल विकाश प्रशिक्षण:

   - युवाओं को प्रशिक्षित करने के लिए कौशल विकाश  कार्यक्रम की व्यवस्था करना।
  - कौशल विकाश कार्यक्रम की अवधि के दौरान वजीफे की व्यवस्था।
  - कौशल आधारित श्रम सहकारी समूहों का गठन करना।
  - प्रशिक्षण प्राप्त युवाओं के लिए लाभकारी रोजगार की व्यवस्था करना।
  - प्रारंभिक वित्तीय प्रबंधन सहायता प्रदान करें और सदस्यों को प्रशिक्षित करें।


प्रउत कर्मचारी सहकारी संगठन 

महामारी के बाद, अर्थव्यवस्था को हुए नुकसान के कारण बहुत से उद्यमों के मालिकों द्वारा दिवाले के दावे प्रस्तुत किए जाएँगे। यदि इसकी अनुमति दी जाती है, तो लाखों श्रमिक अपनी आजीविका खो देंगे; और उनके परिवार गरीबी, भुखमरी औरअभा व झेलने को मजबूर हो जाएँगे; अभूतपूर्व स्तर पर सामाजिक विघटन होगा।

बेरोजगारी की महामारी को रोकने और जनता की आजीविका की रक्षा के लिए सरकार को कानून द्वारा उद्यम के मालिकों / निवेशकों द्वारा दिवालियापन के दावों पर प्रतिबंध लगाना होगा, और ऐसे उद्यमों को सफलतापूर्वक संचालित करने के लिए इनका स्वामित्व कार्यकर्ता-प्रबंधित सहकारी समितियों को हस्तांतरित करना होगा।  इस तरह बिना किसी भारी बदलाव के सहकारिता की प्रणाली को उभरने में मदद मिलेगी ।

श्रमिकों की सहायता करने के लिए, सरकार को बैंकों के ऋण की इस शर्त पर गारंटी देनी चाहिए कि वे कम से कम 51 प्रतिशत शेयर उद्यमों के कर्मचारियों को दें, ताकि उनकी आजीविका सुरक्षित रहे और अर्थव्यवस्था की निरंतरता सुनिश्चित हो सके।

उद्यमों को दिवालिया घोषित कर उनकी सम्पत्ति को व्यर्थ कर देने की बजाय, श्रमिक-स्वामित्व वाले सहकारी उद्यमों को उधार देकर बैंक, और श्रमिकों के अनुकूल कानून बनाकर सरकार, श्रमिकों, अर्थव्यवस्था और समुदाय के हितों को बचा सकते हैं।

प्राउटिष्टों  या समाज  के शुभचिंतकों और गैर सरकारी संगठनों  के लिए भूमिका

प्रउत अर्थव्यवस्था की जानकारी रखने वाले लोग व संगठन आज एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। दिवालियापन का दावा करने की कगार पर पहुँच चुके स्थानीय उद्यमों की पहचान कर वे निवेशक / मालिक और श्रमिकों के संगठनों और स्थानीय प्रशासन को प्रउत के श्रमिक-प्रबंधित उद्यमों के मॉडल  की जानकारी देकर उन्हें इसे अपनाने के लिए प्रेरित कर सकते हैं। इस तरह सभी हितधारकों या दावेदारों -- मालिक/निवेशक, अधिकारी, श्रमिक और समुदाय -- के हितों की रक्षा की जा सकती है।

सरकार से माँग की जाए की कानून बनाकर दिवालियापन के दावों पर प्रतिबंध लगाया जाए, और निवेशक / मालिक के लिए अनिवार्य किया जाए कि वे दिवालियापन के कगार पर पहुँच चुके इन उद्यमों को सहकारी उद्यम के रूप में चलाने के लिए इनका स्वामित्व कर्मचारियों को सौंपने का प्रस्ताव दें ।


दीर्घकालिक रणनीति :

ब्लॉक स्तर की योजना: विकाश योजना प्राकृतिक और मानव संसाधनों की उपलब्धता, बाजार की मांग आदि के आधार पर  बनाई जानी चाहिए। इसका उद्देश्य काम करने में सक्षम 100% लोगों को रोजगार के अवसर उपलब्ध कराना है।
भोजन, आश्रय, वस्त्र, शिक्षा, स्वास्थ्य, सेवा, संचार और सिंचाई सुविधा को न्यूनतम आवश्यकताओं की श्रेणी में रख इनमे आत्मनिर्भरता को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

जिला, जोनल और राज्य स्तर पर अंतर-ब्लॉक और अंतः-ब्लॉक स्तर की योजना बनाई जानी चाहिए।

विभिन्न विभागों में काम करने वाले विशेषज्ञों और तकनीकी कर्मचारियों की सेवाएं, जो सब्सिडी और अनुदान के वितरण के लिए उपयोग की जा रही हैं, उन्हें वर्तमान लिपिक नौकरी से छुटकारा दिया जाना चाहिए और योजना निकाय में शामिल किया जाना चाहिए। योजना प्रक्रिया में जनता के विशेषज्ञता और अनुभव का प्रभावी ढंग से उपयोग किया जाना चाहिए।

प्रत्येक ब्लॉक को आर्थिक रूप से मजबूत बनाया जाना चाहिए ताकि पूरी सामाजिक-आर्थिक इकाई  आत्मनिर्भर हो। ऐसा करके ही कोई देश या महासंघ आर्थिक रूप से मजबूत होगा और वास्तविक अर्थों में विकशित होगा।

जहाँ तक संभव हो संतुलित अर्थव्यवस्था के सिद्धांतों को लागू किया जाना चाहिए, जो यह बताता है कि आबादी को किस अनुपात में  विभिन्न व्यवसायों में लगाया जाना चाहिए। मोटे तौर पर यह बेहतर होगा कि कृषि में 30 से 40%, कृषि-हेतु और कृषि-आधारित उद्योगों में 20 से 30%, अन्य उद्योगों में 10%, व्यापार और वाणिज्य में
10%  व सेवा क्षेत्र, व्हाइट कॉलर नौकरियों आदि में 10 % आबादी को नियोजित किया जाना चाहिए। 

कृषि को  उद्योग का दर्जा 

  औद्योगिक उत्पाद की कीमत तय करते समय अपनाए जाने वाले सिद्धांतों को अपनाकर कृषि उपज की कीमत तय की जाए। यह तभी संभव है जब भूमि का उपयोग बुद्धिमतापूर्ण और वैज्ञानिक ढंग से किया जाए और फसल की बुवाई, कटाई, रखरखाव आदि को सहकारिता के आधार पर किया जाए।

सहकारिता:

- वर्तमान कृषि, उत्पादक और उपभोक्ता सहकारी समितियों को मजबूत करना तथा नई सहकारी समितियों को प्रोत्साहित करना ताकि आपस में स्वस्थ प्रतिस्पर्धा हो।

- आवश्यक वस्तुओं का  संग्रह, वितरण और विपणन मात्र सहकारी क्षेत्र में ही किया जाना चाहिए।

- स्थानीय संसाधनों का उपयोग करने वाले कार्यकर्ता-प्रबंधित सहकारी  सूक्ष्म, लघु व मध्यम आकार के उद्यमों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।

- सहकारी बैंकों को पुनर्जीवित किया जाना चाहिए, व स्वस्थ प्रतिस्पर्धा को प्रोत्साहित करने के लिए कड़ी निगरानी तथा समर्थन के साथ नए सहकारी बैंक शुरू किये जाने चाहियें।  राज्य सरकारें अपने विकाश परियोजनाओं के लिए इन बैंकों से ऋण ले सकती हैं।

ब्लॉक स्तर पर आवश्यक वस्तुओं के उत्पादन के लिए अधिकतम औद्योगीकरण  किया जाना चाहिए।


नीतिगत  निर्णय:

- वर्तमान केंद्रीकृत अर्थव्यवस्था की जगह विकेंद्रीकृत अर्थव्यवस्था को स्थापित किया जाना चाहिए।

- स्वस्थ बैंकों और कंपनियों के विलय को रोका जाए।

-  सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों का निजीकरण न हो।

- प्रउत की त्रिस्तरीय औद्योगिक नीति का पालन किया जाना है।

- सहकारी क्षेत्र के तहत ही नए बैंक शुरू करने की अनुमति दी जानी चाहिए।

- स्टॉक मार्केट ट्रेडिंग सहित सभी सट्टा गतिविधियों पर तुरंत प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए।

- किसी भी राज्य की अस्थायी आबादी को या तो वहीं बसाया जाना चाहिए जहाँ वह रह रही है, या उस क्षेत्र को छोड़ अपने मूल क्षेत्र में लौटना होगा -- कोई एक विकल्प उसे चुनना होगा। 




योगदानकर्ता:


  1. गणेश भट, राष्ट्रीय प्रशिक्षण सचिव, प्राउटिष्ट ब्लाक, इंडिया  
  2. प्रोफेसर आर.पी. सिंह, गोरखपुर
  3. सुरेन्द्र रेड्डी 
  4. कान्हू चरण बेहुरा, राष्ट्रीय महासचिव, प्राउटिष्ट ब्लाक, इंडिया 
  5. धर्मेंद्र कुमार सिन्हा 
  6. सुब्रमण्यन के.राजा
  7. आदर्श चंद्राकर 


Image coutesy: internet                  

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