आधार और आपेक्षिक सत्य ---- श्री श्री आनंदमूर्ति





धार्मिक-साधना का आरम्भ और अन्त एक ही बात में निहित है। वह है आधार शुद्धि, आधार की परिशुद्धि। मनुष्य आधार को ही लेकर दुःख और कष्ट भोग करता है। यदि आधार मजबूत हो, तब कष्ट, कष्ट नहीं; दुःख, दुःख नहीं

 आधार - प्रत्येक सीमित वस्तु के लिए आधार प्रयोजनीय है। क्योंकि आधार के ही कारण एक वस्तु दूसरे से भिन्न होकर रहती है। किसी दो प्राणी का एक ही आधार नहीं होता है। अपने-अपने संस्कार के अनुसार प्राणी विराट ब्रह्मदेह से अपने लिए एक आधार चयन कर लेता है। “चि’ धातु में ‘घज्’ प्रत्यय जोड़ कर काय शब्द निष्पन्न होता है। इसका अर्थ ही है चयन करना। जीव परम-ब्रह्म के मन से आधार लेता है। वह परम-ब्रह्म का मानसपुत्र है। परमपुरुष के ऊपर प्रकृति के प्रभाव के कारण उसका मानस-शरीर सृष्ट होता है। अतएव यह देह एक प्राकृत सत्ता है, इसको प्रकृति के नियमानुसार चलना ही होगा।


अनन्त सत्ता को स्थूल देह की आवश्यकता नहीं है, इसीलिए केवल मानसदेह ही है। जो अनन्त नहीं है, उसी के लिए सीमा-रेखा प्रयोजनीय है। प्रकृति त्रिगुणात्मिका है -- सत्त्व, रजः और तमः। यही तीन विशिष्ट गुण हैं। प्रकृति के गुण के प्रभाव के कारण ही पुरुष का ‘‘मैं हूँ” “मैं करता हूँ” “मै ही वस्तु हूँ” इत्यादि बोध जगता है। पुरुष के ऊपर यदि प्रकृति के एक ही गुण का प्रभाव रहता, तो परिवर्तन नहीं हो सकता था। परिवर्तन द्वारा ही यह प्रमाणित होता है कि सर्वत्र केवल एक ही गुण का प्रभाव नहीं है।


(१) भूर्लोक -- पांचभौतिक जगत में स्थूलत्व सर्वाधिक है।यहाँ पर तमोगुण का ही प्रभाव अधिक है। किन्तु स्थूलदेह हो अथवा सूक्ष्मदेह, प्रकृति के तीनों गुण निश्चय ही रहते हैं। ब्रह्म के पास केवल मानसदेह है। इसी मानसदेह (सूक्ष्म देह) के स्थूल विकाश के लिए ही इस पाञ्चभौतिक जगत की सृष्टि हुई है। किन्तु कहीं भी एक ही गुण अकेले नहीं है। सर्वत्र ही तीनों गुण हैं। कहीं कोई अधिक, कहीं कम। स्थूल-जगत में जड़त्व है। अतएव यहाँ तमोगुण प्रधान है, रजोगुण साधारण और सत्त्वगुण अल्प। संस्कृत में इसे भूर्लोक कहा गया है। यह ब्रह्म का स्थूलतम मानसिक विकाश है।

सप्तलोकों में सर्वाधिक स्थूलता है भूर्लोक में और तत्पश्चात भूवर्लोक में। यहाँ तमोगुण प्रधान है, रजोगुण अल्प एवं सत्त्वगुण साधारण। मनुष्य की चिन्ता, ध्यान वा धारणा तथा ऊँच-नीच प्रत्येक प्रकार के बोध में मन ही रहता है। “मनो करोति कर्माणि”



(2) भूवर्लोक -- मन का जो स्तर देहगत कार्य में लिप्त होता है उसी को भूवर्लोक कहते हैं। क्षुधा, तृष्णा, निद्रा, तन्द्रादि समस्त वृत्तियाँ देहगत हैं। इस वृत्ति-समूह के स्पन्दन वा स्फुरण भूवर्लौकिक होते हैं।

इस लोक से ही मन का स्थूलतम अंश उत्पन्न होता है, जिसको जीव का काममय-देह वा काममय-कोष कहा जाता है। ब्रह्म का निज स्थूल शरीर नहीं रहने के कारण तत्सम्बन्धी कार्य सम्पादन करने के लिए काममय देह नहीं है, किन्तु उनके मन के स्थूलतम मानसिक-विकाश से भूर्लोक की अभिव्यक्ति का पूर्व स्तर बन कर भूवर्लोक की सृष्टि होती है। वे अपने मानस सृष्ट पांचभौतिक जगतको अपनी भुवर्लौकिक-सत्ता द्वारा आभ्यन्तरिक भाव से ही भोग करते जाते हैं।

3. स्वर्लोक -- स्वर्लोक को ही मनोमय जगत कहा जाता है। इसी लोक में मनुष्य सुख-दुःख का भोग करता है। जो मन सुख-दुःख भोग करता है उसे मनोमय जगत कहते हैं। संस्कृत में स्वर्ग और स्वर्लोक का एक ही अर्थ है। देहत्याग के पश्चात स्वर्ग की प्राप्ति करेंगे, यही मनोभाव लेकर भोगी व्यक्ति पुण्य कर्म करते हैं। संस्कार की अवस्थिति इसी मनोमय जगत वा मनोमय कोष में हैं। इसमें रजोगुण प्रधान, तमोगुण साधारण और सत्त्वगुण अल्प मात्रा में रहते हैं। संसार का उद्भव स्वर्लोक में होता है। स्वर्लोक वा स्वर्ग में पुण्य फल का भोग होता है। यह विश्वास ईसाई, मुसलमान एवं जेमिनी पन्थी हिन्दू-कर्मकाण्डियों में है।
4. महर्लोक --  संस्कृत में महर्लोक का दूसरा नाम अतिमानस-लोक है। यहाँ रजोगुण प्रधान, सत्त्वगुण साधारण और तमोगुण अप्रधान है। इसी लोक में संस्कार का प्रथम स्फुरण होता है। मानवमन कर्मफल भोगने के लिये संस्कार द्वारा परिचालित होता है। इस पूंजीभूत-संस्कार का प्रथम स्पन्दन इसी लोक में सृष्ट होता है। मानो किसी व्यक्ति को एक ऐसे स्थान में जाना है जहाँ हैजा फैला हुआ है। वहाँ जाने के पूर्व ही जैसे कोई कहता है कि मुझे भी हैजा होगा। यह अति मानस-स्तर का काम है। बाद में वहाँ जाने से देखा गया कि सचमुच में उसको हैजा हो गया। साधना की भी प्रथम इच्छा वा एषणा का प्रथम उद्भव इसी स्तर में होता है। इसी स्तर से आत्मिक प्रेरणा प्रथम कार्यान्वित होती है। अतएव देखा जाता है कि साधना का बीज वा विभिन्न मनुष्यों के साधनागत भेद इसी स्तर में सृष्ट होते हैं।
(५) जनर्लोक -- इसको विज्ञानमय-लोक कहते हैं। यह लोक विज्ञान, विवेक एवं वैराग्य प्रधान है। भोगी पुरुष में भी कभी-कभी यह सब गुण प्रधान होकर रहते हैं। किन्तु भूः, भूवः इत्यादि के प्राधान्य के कारण बाधाएँ आती हैं। इस जनर्लोक में सत्त्वगुण प्रधान, तमोगुण साधारण एवं रजोगुण अल्पमात्रा में रहते हैं।
(६) तपर्लोक - इसको हिरण्मय-लोक कहते हैं। हिरण्मय-लोक में सत्त्वगुण प्रधान, रजोगुण साधारण और तमोगुण
अल्पमात्रा में रहते हैं। यहाँ पर विज्ञान की अप्रकट अवस्था है। यहाँ “मै हूँ” का “मैं” भी ठीक प्रकट नहीं होता, किन्तु थोड़ी सुषुप्ति अवस्था में रहता है। महर्लोक से ऊपर के लोकों का अंग्रेजी नाम नहीं है।
(७) सत्यलोक - यहाँ पर भी तीन गुण हैं, किन्तु प्रकट नहीं है। यह पुरुष प्रधान है। पुरुष ही इस लोक में प्रकट है। सत्यलोक में निर्गुण की स्थिति है। परिदृश्यमान-जगत में सात स्तर है। इसको छोड़ कर शेष छः लोकों में तीन गुणों के भेद के कारण प्रकाश है।

जीव के लिए आधार की आवश्यकता है। आधार नहीं रहने से वे ब्रह्म समुद्र में लीन हो जाते हैं। मानो, किसी तालाब में एक कटोरे में जल है। जब तक कटोरा है, तब तक कटोरे का जल भी है। किन्तु कटोरा हटा लेने पर कटोरे का जल तालाब के जल में मिल जाता है। उस जल का आधार कटोरा था। उस आधार को हटा लेने पर  उसका जल तालाब के जल के साथ मिल कर एक हो जाता है। इसी तरह आधार के नहीं रहने पर जीव भी ब्रह्म में मिल जाता है।


(१) अन्नमय-कोष -- शरीर के नहीं रहने पर संस्कार आत्मा के साथ रह जाता है। यह किस तरह होता है? हिरण्मयलोक सर्वापेक्षा मनुष्य का सूक्ष्म-शरीर है। जीव स्थूल-शरीर को भूर्लोक में ही चयन करता है, जहाँ पर तमोगुण प्रधान, रजोगुण साधारण और सत्त्वगुण अल्पमात्रा में रहते हैं। संस्कृत में इसका दूसरा नाम अन्नमय-कोष है। यह कोष खाद्य द्वारा निर्मित होता है।

(२) काममय-कोष - देह के पीछे मन काम करता है। यह मन काममय-कोष के द्वारा निर्मित होता है। यहाँ तमोगुण प्रधान, सत्त्वगुण मध्यम और रजोगुण अल्प है।


(3) मनोमय कोष - काममय देह के पीछे परम-ब्रह्म का मानसिक-जगत-स्वर्लोक है। इस (काममय देह) के ऊपर साधारण मन है जो मनोमय कोष द्वारा सृष्ट होता है। यहाँ रजोगुण प्रधान, तमोगुण साधारण और सत्त्वगुण अल्प है। मन के पीछे मनुष्य की अतिमानस सत्ता या देह या कोष है, जो महर्लोक से निर्मित हुआ है। यहाँ रजोगुण प्रधान, सत्त्वगुण साधारण और तमोगुण अल्प है। कोष का अर्थ देह होता है। इस चतुर्लोक में तीन कोष हैं।
4) विज्ञानमय कोष - यहीं संस्कार की अवस्थिति है। यहाँ सत्त्वगुण प्रधान, तमोगुण साधारण और रजोगुण अल्प है। इस मानसिक देह को विज्ञानमय जगत कहते हैं। इसका ही नाम ब्रह्म का जनर्लोक है।


(5) हिरण्मय कोष - इसको ही तपर्लोक कहा जाता है। यहाँ सत्त्वगुण प्रधान, रजोगुण साधारण और तमोगुण अल्प है। हिरण्मय शब्द का अर्थ स्वर्ण-निर्मित या सुनहला है।

सत्यलोक वह अवस्था है जिस स्तर पर स्वरूप को छोड़ कर अन्‍य कुछ उपलब्ध नहीं होता है। वहाँ जड़ता के परिणाम व विकार की कोई द्वैत-भावना नहीं है। स्वरूपतः जीवात्मा भी इसी अमृतमय सत्यलोक ही में स्थित रहती है, उसका स्थान हिरण्मय-कोष से ऊपर है।

हिरण्मये परे कोषे विरजरं ब्रह्म निष्कलम्
तच्छुभ्रं ज्योतिषाँ ज्योतिस्तद्‌ यद्ात्सविदोविदुः।
प्रकृति के प्रभाव से एक ही परमात्मा सप्तलोकात्मक प्रतीत होते हैं अर्थात इसी सप्तलोकात्मक विकाश के लिए ही की सृष्टि हुई। उनकी मानसदेह के जड़तम विकाश पाञचभौतिक तत्त्व से ही जीवात्मा अपने-अपने संस्कार के अनुरूप अपनी स्थूल पांचभौतिक-देह वा अन्नमय-कोष तैयार कर लेती है। उसी अन्नमय कोष या इन्द्रिय-समूह की सहायता से वह अपने बाह्य-जगत‌ के विषय-समूह को भोग कर सुख पाने की चेष्टा करती है। वस्तुतः सर्वत्र एक अखण्ड-सत्ता ही है। जीवात्मा और परमात्मा का भेद सम्पूर्णतः उपाधिगत है। जहाँ विराट्‌ महत‌ या विराट अहंरूप उपाधि के दिए जाने पर वे “परम-ब्रह्म” कहलाते हैं, वही जब उनको संस्कार-संजात पांचभौतिक-देह की उपाधि दी जाती है तो वे ‘जीव’ कहलाते हैं।
”तयोर्विरोधोऽयं उपाधिकल्पितो नवास्तवः कश्चिदुपाधिरेषः
ईशाद्यमाया महदादि कारणं कार्यं श्रृणु पंचकोषम।।”



साधना इसी उपाधिगत भेद को दूर करना सिखलाती है।


एतावुपाधि पर जीवयोस्तयो सम्यगृनिरासेन पर न जीवो
राज्य नरेन्द्रस्य भटस्य खेटक्स्तयोरपोहेन भटो न राजा

राज्य-चिह्न युक्त रहने पर जिसको राजा कहा जाता है, मुद्गर-उपाधि से युक्त रहने पर उसे ही पहलवान कहा जाता है। जैसे, विश्वनाथ का राज्य चिह्न युक्त रहने पर राजा कहेंगे और मुद्गर उपाधि ले लेने पर विश्वनाथ, विश्वनाथ ही रह जाता है। उसी प्रकार जीव और परमात्मा का भी उपाधिगत भेद रहता है। जीव से उपाधिगत-भेद हटा लेने पर, वह ब्रह्म में मिल जाता है, अपने स्वरूप में स्थित हो जाता है।

जहाँ उपाधिगत दोष नहीं है, वही सत्य है और वही वास्तविक परिचय है। इसी के लिए साधना है अर्थात असत्य को पराजित कर सत्य को प्रतिष्ठित करना ही साधना है। लोक और कोष सब विकृतियाँ हैं - सत्य नहीं।

सत्य और असत्य भेद 

सत्य का परिवर्तन नहीं होता। परिवर्तन होने पर परिवर्तित अवस्था मंे वह सत्य नहीं है। जिसका परिवर्तन नहीं होता, वही सत्य है। वह तीनों काल में एक रूप रहता है। भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों काल में एक ही रूप में रहने के कारण वह कालातीत है, केवल कालातीत ही नहीं देशातीत एवं पात्रातीत भी हैं। उनके अपने शरीर में भेद नहीं है। एक अंश के साथ दूसरे अंश का भेद नहीं है। ब्रह्म व सत्य एक अखण्ड, अविच्छिन्न एवं अपरिणामी सत्ता है। सत्य में भेद नहीं है। उनके बाहर कुछ नहीं रह सकता है। रहने पर ही भेद आ जाएगा। उनके बाहर कोई वस्तु रह नहीं सकती। जो अखण्ड है एवं जिसका टुकड़ा नहीं है, उसकी सीमा भी नहीं है। अतएव उनके तुल्य वस्तु भी उनके ही भीतर रहेगी।

सत्य में स्वजातीय, विजातीय एवं स्वगत-भेद नहीं है। आम्र-वृक्ष यदि सत्य है तो क्या जगत में और अन्य जातीय वृक्ष नहीं है? अन्य वृक्ष भी है। अतएव आम्रवृक्ष परम सत्य नहीं है। क्योंकि इसमें विजातीय भेद है। आम का स्वजातीय भेद भी है, जैसे बम्बई, किशनभोग इत्यादि। इसका स्वगत भेद भी है, जैसे पत्ते, कली, फल इत्यादि। इसलिए, यह सत्य नहीं है। यह आपेक्षिक सत्य अथवा असत्य है।

आपेक्षिक सत्य वा मिथ्या, देश, काल और पात्र के ऊपर निर्भरशील है।चाँद दूर से एक थाली के समान दिखलाई देता है, परन्तु ज्यों-ज्यों कोई उसके समीप जाता है, वह बड़ा होता हुआ दिखाई पड़ता है। तब वास्तव में वह कितना बड़ा है? छोटा और बड़ा दूरत्व पर निर्भर करता है, देश के ऊपर निर्भर करता है। तब यह परम सत्य नहीं है, आपेक्षिक सत्य है। भागलपुर से मुंगेर जाने के लिए निकटतम रास्ता पश्चिम की ओर होगा, किन्तु भागलपुर से पूरब की ओर से भी पृथ्वी घूम कर हम मुंगेर पहुँच सकते हैं। यह तो एकमात्र देश पर ही निर्भर करता है। तब इसे परम सत्य किस तरह कहा जा सकता है। जिनकी आंखों में पाण्डु रोग है, वे सभी वस्तुओं को पीली ही देखेंगे। किन्तु अन्य व्यक्ति उन वस्तुओं को दूसरे रूप में देखेंगे। यह पात्र के ऊपर निर्भर करता है। अतएव वे परम सत्य नहीं हैं। इसलिए एकमात्र परमात्मा ही परम सत्य है। देश और पात्र पर विचार करके देखा गया कि वे परम-सत्य नहीं हैं। अब काल ऊपर विचार करना है। एक ऐतिहासिक घटना कहाँ तक सत्य कही जा सकती है। 
 महाभारत का युद्ध 3,500 साल पहले हुआ था। हम लोगों को आलोक (प्रकाश) के द्वारा दर्शन ज्ञान होता है। तुम आकाश के तारों को तभी देखते हो जब उनकी रश्मि तुम्हारे नेत्र के गोलक पर पड़ती है। महाभारत के युग की रश्मि को किसी ग्रह पर पहुँचने में मान लो अभी आठ सौ वर्ष और लगेंगे। इसी समय वहाँ से यदि कोई दूरबीन की सहायता से पृथ्वी की ओर देखें, तब वह पृथ्वी पर क्या देखेगा? वह देखेगा, अभी भी यहाँ महाभारत का युद्ध नहीं हुआ है। आठ सौ वर्षों के बाद होगा और आठ सौ वर्षों के बाद सचमुच में वह महाभारत का युद्ध होता हुआ देखेगा। किसी के लिए जो अतीत है वही किसी के लिए वर्तमान और किसी के लिए भविष्य है। यह सभी आपेक्षिक सत्य है। अब शब्द का भी व्यवहार देखना चाहिए। अधिक जोर से बोलने पर कोई कहेगा चिल्लाता है, परन्तु बहरा व्यक्ति कहेगा कि वह बहुत धीरे-धीरे बोल रहा है।

अन्नमय, मनोमय, अतिमानस, विज्ञानमय, हिरण्मयकोष तब उसके बाद सत्य है। सत्य में प्रतिष्ठित होने से मनुष्य त्रिकालज्ञ हो जाते हैं और वे ही सत्यद्रष्टा है। ब्रह्म में प्रतिष्ठित होने पर कोई भेद नहीं रहता। मनुष्य साधना करने पर, मन को लुप्त करने पर त्रिकालज्ञ हो सकता है। मन को लुप्त करना ही होगा, क्योंकि यह आपेक्षिक सत्य है और इसी के कारण मनुष्य परम सत्य को जानने का अधिकारी नहीं होता है।

जहाँ क्रिया है वहीं गतिशीलता है। क्रिया की गतिशीलता के मानसिक परिमाप का नाम काल है। जहाँ क्रिया नहीं है, वहाँ मन भी नहीं है। इसीलिए काल भी नहीं है। यदि कोई तीन घण्टे अचेत अवस्था में रहे, तो तीन घण्टे बीतने का उसको बोध नहीं होगा। क्रिया और मन आपेक्षिक सत्य है, इसलिए काल भी आपेक्षिक सत्य है। काल, देश और पात्र पर निर्भरशील है, और देश और पात्र काल के ऊपर। लोग जो कहते हैं कि काल एक अनादि, अविच्छिन्न और अनन्तसत्ता है, यह बात सत्य नहीं है। देश और पात्र के नहीं रहने पर काल रह नहीं सकता है।

मनुष्य छोटी या बड़ी सभी वस्तुओं से सुख पाता है या पाना चाहता है, किन्तु आपेक्षिक सत्य से कालातीत आनन्द प्राप्त नहीं कर सकता है। इसलिए बुद्धिमान जन कालातीत सत्ता की ही साधना करते हैं। देह और  मन  कालातीत नहीं हैं। इनके पीछे दौड़ना मूर्खता है। इनकी देखभाल उचित है, किन्तु इन सबकी साधना नहीं करनी है। कालातीत सत्ता में प्रतिष्ठित होने के लिए ही साधना करनी है।

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