विशुद्ध बुद्धि -- श्री श्री आनंदमूर्ति



 

परम पुरुष यदि तुमसे पूछें कि तुम क्या चाहते हो, तो तुम क्या कहोगे? इस विषय में तुम्हें एक ही बात कहना उचित होगा - ”हे परम पुरुष, मैं सिर्फ तुम्हारा आशीर्वाद चाहता हूँ, जिससे मेरी बुद्धि-मेधा ठीक पथ पर चले। जो पाना था वह तो मैं पा ही गया हूँ।” 


मनुष्य का जो अधःपतन होता है, वह इस बुद्धि के दोष से ही, त्रुटिपूर्ण बुद्धि के कारण ही।
”स नो बुद्ध्या शुभया संयुक्तु”। वेद में कहा गया है: इस विश्वब्रहमांड के सृष्टिकर्ता सुमहान हैं। उनके पास मेरी एक ही प्रार्थना है, और वह यह है कि  वे हमारी बुद्धि को शुभ के साथ संयुक्त रखें। मैं इतना ही चाहता हूँ और कुछ नहीं। संस्कृत में गायत्री छंद में रचित श्लोक में कहा गया है:
”ओम भूर्भुवः स्वः तत सवितुर्वरेणयं।
भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात।”
”धीमहि” अर्थात हम लोग ध्यान करतें हैं; हमलोग क्यों उनका ध्यान करते हैं? हाँ, ध्यान इसलिए करते हैं जिससे वे हमलोगों की मेधा को शुभत्व के पथ पर परिचालित करें।
यह विश्व ब्रह्माण्ड सप्त्लोकात्मक है-भू, भवः, स्वः, महः, जनः, तपः और सत्य। इस सप्तलोक के सविता अर्थात सृष्टिकर्ता हैं परम पुरुष। सविता माने ^पिता*। कोई-कोई भूल से कन्या का नाम रखते हैं सविता।
नहीं, लड़कियों का नाम सविता रखना ठीक नहीं है; क्योंकि सविता माने पिता-यह पुलिंग वाचक शब्द है।
हमलोग सप्त्लोक के सृष्टिकर्ता सगुण ब्रह्म के वरेण्य ज्योति का ध्यान करते हैं। क्यों करतें हैं? हाँ, यह ही मैंने कहा है, ध्यान इसलिए करते हैं कि जिससे वे कृपा करके हमलोगों की बुद्धि को ठीक पथ पर परिचालित करें।  ‘धी’ माने बुद्धि या मेधा। ‘नः’ माने हमलोगों को ‘प्रचोदयात’ माने ‘शुभ पथ पर परिचालित करें’।
मनुष्य की ओर से यह प्रार्थना की जा सकती है - परम पुरुष जिससे मनुष्य की बुद्धि को विशुद्ध पथ पर परिचालित करें। बुद्धि यदि ठीक पथ पर चले तब  प्राप्त करने योग्य सब कुछ प्राप्त होगा और बुद्धि यदि विपथगामी हो, तो मनुष्य कुछ भी नहीं कर पायेगा। इतना ही नहीं, सब कुछ पाकर भी कुछ नहीं रख  सकेगा।

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