पेशेवर-परिवारी नहीं, वैज्ञानिक राजनीति ही समाधान है ( भाग-1)

 




पेशेवर
परिवारी राजनीति का अभिशाप

कुछ लोग अक्सर यह सवाल करते हैं कि डा0 भीमराव अंबेडकर, अरबिन्द घोष या टैगोर का आज़ादी की लड़ाई में प्रत्यक्ष योगदान क्या है? सुभाष चंद्र बोस सरीखे कुछ नेताओं ने तो कांग्रेसी आंदोलन से अलग रास्ता अख्तियार कर लिया था। वास्तव में  कतिपय ये बुद्धिमान नेता किसी किसी रूप में स्वतंत्रता आंदोलन की एक कड़वी हकीकत से वाकिफ हो चुके  थे, खासकर सन 1938-39 के दौरान नौ राज्यों में कांग्रेस के बुढ़ाते मंत्रियों की लालची सुविधाभोगी प्रवृत्ति से (जिसको लेकर कांग्रेस अध्यक्ष की हैसियत से सुभाष चंद्र बोस ने गांधी को पत्र लिखकर चिंता जताई थी) यह कड़वी हकीकत थी कि राजे-रजवाड़ों, सामंती जमींदारों तथा धनबलियों ने वकीलों को जरिया बना आज़ादी के कांग्रेसी आंदोलन पर कब्जा कर लिया था। परिणाम तो बँटवारे, अराजकता तथा अकुशलता के रूप में ही मिलना था। अतः इस आज़ादी के बाद दुनिया का सबसे बड़ा संविधान ही नहीं बना बल्कि सबसे जटिल और सबसे ज्यादा कानून भी भारत में ही बने। जिन बातों को जापान से लेकर यूरोप तक में प्रबंधकीय-प्रशासकीय नीतियों से ठीक किया गया, उनको नियंत्रित करने के लिए हमने बड़े-बड़े कानून लाद लिये। हम भूल गए कि कानून बनाने से कुशलता, रचनाधर्मिता और प्रभावशीलता नहीं आती, बस केवल न्यूनतम अनुपालन हो पाता है।   

स्वतन्त्रता के बाद पेशेवर परिवारी राजनीति का उभार प्रकारांतर से राजशाही का पुनर्जन्म ही साबित हुआ है।

जापानी चमत्कार से सबक

दूसरे युद्ध के दौरान जापान के आत्मसमर्पण के बाद, सम्राट हिरोहितो (और उनके परिवार) को छोड़कर अधिकांश शीर्ष नेताओं और कमांडरों को फांसी पर लटका दिया गया। अमेरिकी सरकार हिरोहितो को एक अच्छा समुद्री जीवविज्ञानी मानती थी जिन्होंने हाइड्रा की कुछ प्रजातियों की खोज की थी इससे पहले जापानी सेना शक्तिहीन हिरोहितो को सम्राट के रूप में हाशिए पर रख सभी शक्तियों का उपभोग रही थी कमांडर इन चीफ टोजो खुद प्रधानमंत्री था और जापानी कैबिनेट के सभी सदस्यों की नियुक्ति सेना की सिफारिशों पर की जाती थी पर्ल हार्बर पर हमला भी सम्राट की सहमति के बिना जापानी सेना के एक गलत आकलन युक्त अति उत्साही कदम था आत्मसमर्पण के बाद, जापान को जनरल मैकआर्थर कार्यक्रम के अधीन रखा गया था जिसकी स्वाभाविक दिशा तो  जापान को एक तरह से अमेरिका के राज्य में बदलना हो सकता था खुद की सेना विहीन। यह कदम भारत में मैकाले के कार्यक्रम के समान था।

लेकिन हिरोहितो बुद्धिमान और स्मार्ट व्यक्ति था उन्होंने JUSE (जापानी यूनियन ऑफ साइंटिस्ट्स एंड इंजीनियर्स) बनायाएक संगठन जिसमें सदस्य तो संस्थान ही होते हैं व्यक्ति नहीं। जापान को बदलने की प्रमुख भूमिका इसे दी गयी। JUSE उद्योग, संस्कृति, युवा और खेल के सबसे महत्वपूर्ण जापानी मंत्रालय के तहत काम करता रहा हैएक ही मंत्रालय में राष्ट्र और समाज की मुख्य ऊर्जा को शामिल करने की एक दिलचस्प और अनूठी अवधारणा इसका काम राष्ट्रीय जीवन के लिए समाज से स्थापित क्षमता, स्वच्छ छवि और चरित्र युक्त विशेषज्ञों और नेताओं का चयन करना रहा है इस तरह उद्योग में वैज्ञानिकों और इंजीनियरों की छवि और क्षमता की स्वत: जांच नियंत्रण होती है इसके बाद सरकार में दागी नेताओं को वापस बुलाने (recall) का संवैधानिक प्रावधान एक पूरक अंकुश है वैज्ञानिकों और इंजीनियरों को यह वास्तविक शक्ति देकर जापान ने 30 वर्षों के भीतर विकास का वह मुकाम प्राप्त करने में सक्षम बना जो यूरोप और अमेरिका द्वारा लगभग 200 वर्षों में प्राप्त किया गया था

1945 में आत्मसमर्पण के बाद जापान ने अपने आक्रामक जापानी राष्ट्रवाद को राष्ट्रीय जीवन की रचनात्मक अवधारणा में बदल दिया। जर्मनी ने भी कुछ ऐसा ही किया। राष्ट्रीय जीवन की इस अवधारणा ने एक युद्धनष्ट देश को बहुत ही कम अवधि में सर्वश्रेष्ठ गुणवत्ता और समृद्धि के प्रतीक में बदल दिया इसी रास्ते को शुरू में उत्तर कोरिया, ताइवान, सिंगापुर और हॉन्गकॉन्ग द्वारा अपनाया किया गया; और बाद में इंडोनेशिया, थाईलैंड, मलेशिया, आदि द्वारा।  चीन ने तकनीकी क्रांति के साथ साम्यवादी रूढ़िवाद को मिलाया है जिससे तेजी से उन्नति हुई है मुख्यत: भौतिक दायरे में सीमित। यहां तक कि अमेरिका ने भी इस अनुभव से बहुत कुछ सीखा।

जापान ने जीवन के हर क्षेत्र में अपनी प्रतिभा और विशेषज्ञता को महत्व दिया जिससे तेजी से उन्नति हुई जबकि हम भारतीयों ने व्यवस्था के घटिया दर्जे के बिचौलियों (ईश्वर या शक्ति या व्यापार किसी के भी) को अधिक महत्व देने की आदत को पाला हुआ है जिससे राष्ट्रीय प्रणाली कमजोर और खोखली हो गई है । पेशेवर व परिवारी राजनेता भी ऐसे ही घटिया दर्जे के बिचौलिये साबित हुए हैं जिनकी थोथा चना बजे घना वाली  समझ के चलते अच्छी योजनाएँ भी अकुशलता का शिकार हो व्यवस्था पर भार ही साबित होती हैं। ऐसे राजनेता समाज में वैज्ञानिकों की सनकी व पागल की ही छवि ही प्रचारित करते रहे हैं। पर आज प्रौद्योगिकी क्रांति के युग में ये  राजनेता पूरी तरह से अप्रासंगिक हो व्यवस्था के भार ही हैं। वैज्ञानिक राजनीति की क्रांति ही अब सही रास्ता है।

हमें भी आक्रामक और हिंसक राष्ट्रवाद को रचनात्मक राष्ट्रीय जीवन की दृष्टि में बदलने की जरूरत है ताकि सार्थक परिणाम सुनिश्चित किया जा सके राष्ट्रीय और राज्य जीवन, शासन और अर्थव्यवस्था के लिए नेताओं के चयन के एक प्रमुख कार्य के साथ डीएसटी (Department of Science & Technology) को भारतीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी संघ (BUST-Bharatiya Union of Science & Technology) नामक एक संवैधानिक प्राधिकरण के रूप में व्यापक बनाने की जरूरत है इन चयनित प्रतिभाओं का दो तरह से उपयोग किया जाएगा। जो लोग राजनीतिक चुनाव जीतते हैं, वे विधायिका और सरकारी शासन में जाएंगे जबकि शेष का उपयोग सार्वजनिक क्षेत्र की अर्थव्यवस्था और प्रशासन में किया जाएगा, इस प्रकार वास्तविक प्रतिभाओं को सम्मान, अवसर, गतिशीलता और महत्व दिया जाएगा। इस पूरी चुनाव प्रक्रिया को राज्य द्वारा वित्त पोषित करना होगा

BUST में सदस्य के रूप में 20 वैज्ञानिकों/शोधकर्ताओं का एक बोर्ड गठित हो सकता हैचार उच्चतम न्यायालय द्वारा नामित, चार केंद्र सरकार द्वारा, चार तकनीकी और अनुसंधान संस्थानों से, दो चिकित्सा अनुसंधान संस्थानों से, दो विश्वविद्यालयों से, दो गैर सरकारी संगठनों से और दो उद्योग से अध्यक्ष को भारत के राष्ट्रपति मनोनीत कर सकते हैं।    

पेशेवर राजनीति की भारतीय महाभूलेंकौटिल्य  की सूझ पर पुनर्दृष्टि

भारत एशियाई टाइगर के चमत्कारों से अनजान नहीं रहा है जैसा कि भाग 2 में बताया गया है भारत में भी इस दिशा में कुछ प्रयास किए गए। राजीव गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल में मुख्यत: विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) के नेतृत्व में युवा वैज्ञानिकों और टेक्नोक्रेट्स की एक टीम का गठन किया गया और राष्ट्र को नए युग की तकनीक से चलाने के लिए संबंधित कैबिनेट समिति का गठन किया गया लेकिन यह कार्यक्रम पूरी तरह से विफल हुआ क्योंकि कार्यक्रम में प्रतिभागियों की निष्पक्षता सत्यनिष्ठा सुनिश्चित करने के लिए तथा धूर्त दलाल नेताओं के हस्तक्षेप को अच्छी तरह से खत्म करने के लिए कोई उचित प्रणाली नहीं प्रदान की गयी थी।

इसका परिणाम यह हुआ कि चालाक राजनेताओं और उनके पिट्ठूओं द्वारा वैज्ञानिक युवा क्रांति के नाम पर इतनी लूट हुई कि देश 5-6 साल के भीतर दिवालिया हो गया, 1991 में रिजर्व बैंक का सोना गिरवी रखकर IMF से भारी उधार लेना पड़ा । लेकिन प्रधानमंत्री पी वी नरसिम्हा राव की यह बुद्धिमत्ता थी कि उन्होंने वित्त मंत्री के रूप में अर्थविज्ञानी डॉ0 मनमोहन सिंह के माध्यम से आर्थिक उदारीकरण का सूत्रपात किया बाद में राष्ट्र ने डॉ0 एपीजे अब्दुल कलाम को राष्ट्रपति के रूप में सम्मानित करते हुए  अच्छा प्रयोग किया, यद्यपि उन्हें केवल एक अवसर ही दिया गया।

लेकिन यह सब सागर में सिर्फ एक बूंद ही साबित हुआ है पेशेवर/दलाल/परिवारवादी राजनेताओं का देश प्रदेश की राजनीति में प्रवेश रोकने का कारगर उपाय किए और इसके बजाय वैज्ञानिक राजनीति क्रांतिको एक संपूर्ण उपाय के रूप में अपनाये बिना, राष्ट्रीय उत्थान के लिए इस ऐतिहासिक अवसर को फलीभूत नहीं किया जा सकता कौटिल्य ने अपने पुस्तक का नाम 'राजनीतिशास्त्र'  नहीं बल्कि  'अर्थशास्त्र' रखा क्योंकि वह जानते थे कि प्रौद्योगिकी और राजनीति के मध्य अर्थशास्त्र एक अच्छा संतुलन कारक है। अब समय गया है कि इस वास्तविकता से हमारी आंखें मुड़ें

पूंजीवाद और साम्यवाद के बारे में पहले के समय में दुनिया भर में बहस एशियाई टाइगर्स के उदय के बाद अपनी प्रासंगिकता चमक खो चुकी है वास्तव में दोनों ही प्रणालियां कमोबेश समान रूप से शोषक हैं, हालांकि उनके तरीके अलग हैं पूंजीवाद में कई पूंजीपति होते हैं जो राज्य को अपने धन के प्रभाव में लाने की जुगत करते हैं, इसलिए राज्य उन्हें नियंत्रित करने की इच्छा खो देता है, हालांकि इसमें ऐसा करने की क्षमता है। लेकिन साम्यवाद में राज्य स्वयं पूंजीवादी बन जाता हैराज्य पूंजीवाद, इसे कौन नियंत्रित करेगा! अब असली चर्चा दलालों की व्यावसायिक राजनीति बनाम वैज्ञानिक राजनीति को लेकर होनी उचित है। 

वैज्ञानिक राजनीति एक ऐसी प्रणाली को संदर्भित करती है जिसमें अर्थव्यवस्था और उद्योग सहित पूरे राष्ट्रीय जीवन का नेतृत्व और संचालन वैज्ञानिकों द्वारा किया जाएगा, कि पेशेवर और दलाल राजनेताओं द्वारा प्राकृतिक विज्ञान, सामाजिक विज्ञान, अर्थव्यवस्था, प्रौद्योगिकी, संगीत, कला, साहित्य, खेल या ऐसे किसी भी क्षेत्र में योगदान करने वाले शोधकर्ता या समकक्ष कार्यकर्ता वैज्ञानिक हैं।

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लेखक परिचय एवं संपर्क सूत्र :

प्रोफेसर आर. पी. सिंह

 वाणिज्य विभाग, दी. द. उ. गोरखपुर विश्वविद्यालय

e-mail: rp_singh20@rediffmail.com

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