सभ्यता का भविष्य




 इसे समझाने के लिए बहुत विद्वता, विवेक और युक्ति की आवश्यकता नहीं है कि सभ्यता आज संकट के चैराहे पर खड़ी है। महान दार्शनिक व अध्यात्मिक सद्गुरु श्री श्री आनंदमूर्तिजी (श्री प्रभात रंजन सरकार) के शब्दों में ”मानव सभ्यता आज एक युग संधि के चरम मुहूर्त में उपनीत हुई है। इसकी एक ओर है पुरातन का जीर्ण कंकाल, दूसरी ओर नूतन जीवन की रक्तिम उषा-मानव को इन दोनों में  से एक को चुन लेना होगा।....मैं तुम्हें यही कहूँगा  कि तुम लोग इस आलोकस्नात नूतन उषा का वरण कर लो। जय तुम्हीं लोगों की होगी।”

इस वक्तव्य से स्पष्ट है कि पुराने ढ़ांचे, पुरानी व्यवस्था, को बिलकुल ध्वस्त कर, गिरा कर, नयी व्यवस्था, नया निर्माण करना होगा। अब वर्तमान ढांचा अधिक दिन टिक नहीं सकता। यह पूर्ण जर्जरता की सीमा पर पहुंच चुका है, अतः इस ढांचे को गिराना ही होगा। कमजोर ढांचे और कमजोर बुनियाद वाले भवन में रहना जैसे जोखिम भरा है, वैसा ही जोखिम वर्तमान समाज व्यवस्था में जीवित रहना है। मनुष्यता घुट-घुट कर दम तोड़ रही है। 

श्री श्री आनंदमूर्तिजी ने जो चुनौती हम लोगों के सामने रखी है और जिसका सामना और मुकाबला करने के लिए हम सब को ललकार रहे हैं, निःसंदेह वह संघर्ष और कांटों से भरा है। किंतु संघर्ष की इस राह पर चल कर हमारी विजय होगी ही - यह आश्वासन और आशीर्वाद भी मानवता के जुझारू सेनानियों को वे दे रहे हैं। यह उनकी  ओजस्वी वाणी से सुस्पष्ट है। 

अतः आज जुझारू और विद्रोही युवकों और युवतियों को इस महाअभियान में, इस महायज्ञ में, पहल करने की जरूरत है। समझौतावादी या सुविधावादी मनस्तत्त्व को अविलंब तिलांजलि देनी है। हमें अपनी समस्त क्षमताओं और संभावनाओं सहित शुभबुद्धि अविकृत रखते हुए, पूरी श्रद्धा और समर्पण से जुट जाना होगा। 

हमारे पास समय कम है - इसलिए कि सर्वग्रासी दानवी शक्तियों से हमें लोहा लेना है। औपचारिकता निभाने का वक्त अब नहीं रहा। अब तो ”मुसाफिर आगे बढ़ते जाना” के तराना में हमें बहना है।

श्री श्री आनंदमूर्तिजी ने यह भी कहा है कि ”मनुष्य के दुःखों की रात्रि जैसी भी हो, तपस्या का सूर्यालोक उसके समस्त अंधकार को दूर हटा देगा ही। मनुष्य के जीवन में अरुणोदय होगा ही होगा।” हमें चिंता की क्या जरूरत है! पापियों के मान मर्दन का शंखनाद करते हुए हमारा कारवां आगे बढ़ता रहे! दिल्ली दूर नहीं है, मंजिल स्पष्ट दिखाई दे रही है। परम पुरुष की कृपा अहरह बरस रही है, और नव्यमानवता के सिपाही उससे सराबोर हो रहे हैं। 

जय दुःखी मानवता! जय एक मानव समाज!!


 - आचार्य संतोषानंद अवधूत 



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