पाप शक्ति की चुनौती से निपटना


श्री श्री आनंदमूर्तिजी ने कहा है: ”चलने की राह में बाधा आएगी ही...शुभ अशुभ सभी काम में बाधा आती है। परंतु वृहत् के परिप्रेक्ष्य में जो सोचा जाय...जो किया जाय, उसके भीतर अंतर्निहित शक्ति उसके आगे चलने के सब प्रकार के साधन जुटाती जाती है। हमें इस बात को भूलना नहीं है।” 

उपर्युक्त वक्तव्य से यह स्पष्ट है कि जो काम सब के हित और सब की भलाई के लिए किया जाता है, उसके लिए साधन की व्यवस्था प्राकृतिक रूप से, नैसर्गिक विधि से, अवश्य होती है। इसलिए दुःखी मानवता के दुःख निवारण के लिए जो भी काम होगा, उसमें दो चीजें स्पष्ट रूप से आवश्यक है: प्रथम तो मन में दुःखियों-पीड़ितों के प्रति निश्छल प्रेम हो। मन में कोई छल-कपट, कोई आडंबर, कोई अभिनय, नहीं हो। निष्कपट, प्रेमप्लावित हमारा मन होना चाहिए। इससे मन परम पुरुष (ईश्वर) से स्वाभाविक रूप से जुड़ जाता है। उस स्थिति में हमें ईश्वरीय अनुकंपा बार-बार अनुभव होती है। उन पर संदेहरहित भरोसा रहना आवश्यक है। जब हम समस्त मानवता के दुःख-पीड़ा दूर करने के मूल उद्देश्य से क्रियाशील हैं, तो हमें कभी घबड़ाना नहीं है कि साधन कहाँ से आएगा। हमें प्रभु कृपा पर भरोसा बनाए रख कर सतत् सक्रिय रहना है। हिम्मत नहीं हारना है और निष्ठावान प्रयास में कोई शिथिलता नहीं आने देनी है। इसीलिए श्री श्री आनंदमूर्तिजी ने कहा है कि ”इस बात” को भूलना नहीं है।

मनुष्य परम पुरुष की अहरह बरसती अहैतुकी कृपा को भूल जाता है। वह समझने लगता है कि ”मेरी प्रतिभा और पुरुषार्थ से ही सब काम हो रहा है, सब संकटों और समस्याओं का निपटारा हो रहा है। मेरी बदौलत ही सब कुछ ठीक ठाक है।” इसी त्रुटिपूर्ण मानसिकता के कारण वह अंततः कहीं-न-कहीं जाकर अटक जाता है और उसके सपने चूर-चूर हो जाते हैं। किंतु जब मनुष्य परम पुरुष को परमाश्रय मान कर, उन पर प्रतिपल अवलंबित होकर, अनथक चेष्टारत रहता है तो सफलता उसके चरण चूमती है; वह सभी बाधाओं-विघ्नों को पार कर अपने निर्धारित लक्ष्य को प्राप्त कर ही लेता है।

 इसलिए इस सीख को हमें गांठ बांध लेनी चाहिए कि बाधाएँ और असुविधाएँ चाहे जितनी विशाल और विकराल क्यों न हों, परम पुरुष का सामर्थ्य  उनसे कहीं अधिक बड़ा और शक्तिशाली है। अतः हमारे जीवन में निराशा, हताशा, विषाद अथवा अवसाद का कोई स्थान नहीं है। हमारी सफलता सुनिश्चित है...हमें बस प्रभु कृपा का आश्रय लेकर निरंतर आगे बढ़ते रहना है। 


- आचार्य संतोषानंद अवधूत


 

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