सर्वसमर्थ का सामर्थ्य


हम ईश्वर को, परमात्मा को, मानते हैं। लगभग सभी लोग मानते हैं। हमारा यह मानना अधिकांशतः ज़बानी और सैद्धांतिक ही होता है। उदाहरणस्वरूप प्रायः हम अपने को हमेशा, हर परिस्थिति में, निर्भय महसूस नहीं  करते हैं। हमें  किसी न किसी तरह का डर हमेशा बना रहता है। बाधा-विध्न, विरोध, प्रतिकूल परिस्थितियां आदि कभी न कभी हमें उदासी, निराशा, अवसाद, विषाद से भर देती हैं। हममें घबड़ाहट या असुरक्षा की भावना उमड़ने लगती है। क्या ईश्वर विश्वासी में, ईश्वरनिष्ठ में, ऐसा होना चाहिए?

जब ईश्वर हमेशा हमारे साथ हैं, वे प्रति मुहूर्त हमारी हर सांस में मौजूद हैं, तब हमें किंचित किसी भी प्रकार का भय नहीं महसूस होना चाहिए।

1976 में जब पटना में पूज्य बाबा अर्थात प्रउत प्रवर्तक श्री प्रभात रंजन सरकार तथा उनके चार शिष्यों के विरुद्ध आपराधिक मुकदमा चला था, तब जज ने सब को अपराध का दोषी ठहराया। इन चार शिष्यों में से एक ने अपनी निराशा और हताशा बाबा को बताते हुए कहा,  "बाबा! हम तो समझते थे कि हम धर्मप्राण व्यक्ति हैं, सत्पथ पर चलने वाले हैं, निर्दोष हैं, हमें दोषी नहीं ठहराया जाएगा, किंतु ऐसा नहीं हुआ। इससे मन दुःखी है।"  तब प्रिय बाबा  ने उनको जवाब दिया, "तुम लोग अग्रणी हो, ऐसा कहना तुम्हें शोभा नहीं देता। चाहे कांटों पर चलना हो या आग में जलना हो, किंतु पापियों से समझौता नहीं हो सकता।”

बाबा की इस ओजस्वी वाणी ने उन सभी के भीतर अदम्य प्रेरणा और साहस का संचार किया और वे तत्काल ही उत्साह से भर उठे - उनकी सारी मायूसी और हीनता-दीनता की भावना पल भर  में लुप्त हो गई । इससे स्पष्ट  होता है कि  जो ईश्वरनिष्ठ होते हैं, वे हमेशा निर्भय रहते हैं  और दूसरों को भी निर्भय बना देते हैं।  बाद में, 1978 में पटना हाई कोर्ट ने सबको सम्मानसहित रिहा कर दिया।

हमारे भीतर किसी भी तरह की हीनता-दीनता की भावना के मौजूद होने का अभिप्राय है कि हमारा ईश्वर से मानसिक संबंध विच्छेद हो रहा है। कहने की जरूरत नहीं, उनके सतत संपर्क की अनुभूति किसी भी नकारात्मक तरंग को हमारे भीतर प्रवेश ही नहीं करने देगी। जिस तरह अंधकार और प्रकाश साथ नहीं रह सकते, उसी तरह ईश्वर की सतत उपस्थिति का अनुभव और नकारात्मक मनोभाव कभी साथ नहीं रह सकते, अतः जब भी मन में किसी भी तरह का भय, या असुरक्षा की भावना या नकारात्मक तरंग की अनुभूति होती हो, तब हमें समझना चाहिए कि ईश्वर से हमारा मानस संबंध टूट रहा है। जिस हृदय में प्रभु की उपस्थिति महसूस न हो, वहाँ जड़ तरंग, भोगवादी तरंग की ही प्रबलता मौजूद रहती है। ईश्वर ”सर्वसमर्थ” हैं, अतः ईश्वरानुरागी को तो ”समर्थ” होना ही चाहिए। कहने का आशय है कि वह किसी भी परिस्थिति को झेलने, निपटने और समाधान निकालने में सक्षम और समर्थ होता है।  कोई भी हालात उसे डरा नहीं सकते। वह सदैव निर्भय और भ्रांतिरहित रहता है। 

ईश्वर के इस "सर्वसमर्थ” होने की एक जबरदस्त विशेषता है। यह संपूर्ण सृष्टि उन्हीं की रचना है, वे ही इसका पालन-पोषण कर रहे हैं - इसकी हम वास्तविक  अनुभूति कर सकें, इसके लिए वे कभी-कभी हमें पूरी तरह सामर्थ्यहीन कर देते हैं, तब वे हमें जो सहायता प्रदान करते हैं, उसे हम उनकी शक्ति, उनकी कृपा के रूप में देखते हैं, और अनुभव भी करते हैं। जब तक हम अपनी शक्ति, प्रतिभा, योग्यता आदि को ही असली सामर्थ्य समझते रहते हैं, तब तक उदासी, निराशा, कुंठा, ग्लानि व नकारात्मकता भी हमारा साथ नहीं छोड़ती।  

सामर्थ्यरहित अवस्था में ही सामर्थ्यवान के सामर्थ्य का हमें अनुभव होता है। उसके पहले तो अनुभव होता है कि सब कुछ हमारी योग्यता, प्रतिभा और सामर्थ्य से हो रहा है, जिसके कारण ”सर्वसमर्थ” की महिमा आंखों से ओझल रहती है। जब द्रौपदी ने दोनों हाथ ऊपर उठा दिए, पूरी तरह सामर्थ्यहीन  हो गयी, तभी उसे प्रभु कृपा का प्रसाद मिला; उनकी भक्तवत्सलता और सामर्थ्य का उसे अनुभव हुआ। तब वह भली-भांति समझी कि वे ही केवल अपने हैं और केवल उन्हीं पर भरोसा किया जा सकता है, वे ही सर्वसमर्थ हैं।


- आचार्य संतोषानंद अवधूत

prout.am@gmail.com  

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