नव-सामान्य के दौर में संपोषणीय ग्राम्य जीवन

 



        भारत की लगभग 70 प्रतिशत आबादी अभी भी गावों रहती है। ग्राम्य जीवन हमेशा से हरित अर्थव्यवस्था का प्रतीक रहा है।  संपोषणीय विकास  का  ग्राम्य जीवन का पहलू  आज कोविड काल में काफी अधिक प्रासंगिक हो चला है। ग्रामीण क्षेत्रों में आजीविका के अवसरों, आधुनिक सभ्य जीवन की सुविधाओं और सेवाओं की कमी के चलते शहरी क्षेत्रों में लोगों का पलायन होता है । ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच  भौतिक और सामाजिक बुनियादी ढांचा की उपलब्धता में व्यापक अंतर हैं। इन मुद्दों के समाधान के लिए, भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. पीजे अब्दुल कलाम ने ग्रामीण क्षेत्रों में शहरी सुविधाओं के प्रावधान (पुरा/PURA) के एक विजन पर प्रकाश डाला जो एक परियोजना के माध्यम से ग्रामीण भारत के परिवर्तन के लिए मेगा मिशन हो। गणतंत्र दिवस 2003 की पूर्व संध्या पर राष्ट्र के नाम अपने संबोधन के दौरान डॉ कलाम ने चार तरह की कनेक्टिविटी प्रदान करने की कल्पना की: भौतिक कनेक्टिविटी, इलेक्ट्रॉनिक  कनेक्टिविटी  व ज्ञान कनेक्टिविटी  जो अंततः ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक कनेक्टिविटी  सुनिश्चित  कर सके। 

      स्थानीय लोगों, सार्वजनिक प्राधिकरण और निजी क्षेत्र के संयुक्त कार्यान्वयन ढांचा के माध्यम से प्रबंधित एक आत्मनिर्भर और व्यवहार्य मॉडल के रूप में पुरा को परिकल्पित किया गया था। इसके बाद भारत के प्रधानमंत्री ने भी इस योजना को पुरा योजना को 15 अगस्त 2003 को स्वतंत्रता दिवस के भाषण में लागू करने की घोषणा की। पुरा को श्यामा प्रसाद मुखर्जी रूर्बन मिशन (एसपीएमआरएम) ने केंद्रीय बजट 2014-15 में घोषित रूप से सफल किया था। नागरिक सुविधाओं के आकर्षण में बड़े शहरों में पलायन के कारण उन पर अधिक बोझ पड़ रहा है। फिर ग्रामीण क्षेत्रों को शहरी सुविधाएं क्यों न दी जाए? यहाँ सेवाओं की समान गुणवत्ता सुनिश्चित करना एक बड़ी चुनौती है । आधुनिक तकनीक से गुणवत्ता के अंतर में कुछ हद तक कमी आई है। लेकिन ग्रामीण विकास केंद्रों को नए कस्बों या शहरों के रूप में विकसित करके इस गुणवत्ता के अंतर को बेहतर तरीके से संभाला जा सकता है । इस तरह से शहर के जीवन की मांग को बेहतर ढंग से पूरा किया जा सकता है और बड़े शहरों पर बोझ को भी काफी कम किया जा सकता है। विकास के साथ शहरीकरण एक प्राकृतिक घटना है। विकसित देशों में केवल 2 से 10% लगभग अब गांवों में शेष है और उनकी सरकारें गांवों में इस छोटी सी बची हुई आबादी को बनाए रखने के लिए ग्रामीण-शहरी गुणवत्ता के अंतर को भरने के लिए सभी प्रयास कर रही हैं ।  


 ग्राम्य जीवन और प्रवासी श्रमिकों का पलायन

            ग्राम्य जीवन हमेशा से स्वच्छ वातावरण और हरियाली के प्रतीक के तौर पर देखा गया है। राष्ट्रकवि मैथिली शरण गुप्त ने 'अहा ग्राम्य जीवन भी क्या है' तथा  सुमित्रानंदन पंत ने 'ग्राम्या' में  ग्राम्य जीवन का सुंदर चित्रण किया है। मैथिली शरण गुप्त ने उसी कविता में ग्रामीणों का आह्वान भी किया कि वे अपनी शिक्षा और चेतनता को बेहतर करें।

        नॉवेल कोरोना विषाणु की महामारी ने सबकुछ ठप कराकर देश-दुनिया के सामने अभूतपूर्व और विचित्र जटिलताएँ उत्पन्न कर दी हैं। लाकडाऊन के साथ ही दिल्ली, मुंबई जैसे महानगरों से जिस तरह जीविका और मौलिक सुविधाओं से वंचित होने के तात्कालिक संकट तथा संभावित आशंका के चलते दिहाड़ी मजदूरों को जैसे, जिस हाल में भागना पड़ा, इससे सभी परिचित हैं। इस ऐतिहासिक पलायन ने 'गावों की ओर लौटो' को संकटकालीन विकल्प के रूप रेखांकित किया। इस पलायन में केंद्र सरकार की कार्ययोजना, दिल्ली सरकार की कार्यविधि तथा फैक्ट्रियों व संस्थाओं के मालिकों की असमर्थता व असहयोग—सभी की भूमिका पर प्रश्नचिह्न तो लगे ही, इससे इन दिहाड़ी मजदूरों में विश्वास का बड़ा संकट उत्पन्न हुआ। श्रमिकों के अभाव में  इन फैक्ट्रियों व संस्थाओं को पुनः आरंभ करना एक बड़ी चुनौती है।  माना जा रहा है कि 40 करोड़ दिहाड़ी मजदूर परिवार बेकारी के चलते अत्यधिक गरीबी में गिरे हैं। 8 करोड़ प्रवासी मजदूर तनाव और चिंता के सबसे ज्यादा शिकार हुए—स्वतंत्र भारत में लोगों की दुर्दशा और लाचारी का सबसे गंभीर उदाहरण।

 

संपोषणीय विकास की दिशा में समाधान

()   समन्वित सहकारी समितियां

          अब बिहार, यूपी, छत्तीसगढ़ आदि की सरकारें अपने ही राज्य में रोजगार के विकल्प ढूढ़ने को बाध्य हैं। पर यह दीर्घकालीन रणनीतिक प्रक्रिया है। प्रत्येक क्षेत्र में स्थानीय संसाधनो के अनुरूप अधिक से अधिक उद्यम लगने चाहिए जिन्हें समन्वित सहकारी समितियों द्वारा चलाया जाय। समन्वित सहकारी समितियां प्रचलित अधीनस्थ सहकारी समितियों की तुलना में  कहीं अधिक व सही अर्थों में जनवादी हैं। श्रमिकों व आमजन को इन समितियों में अंशधारक हितधारी के रूप में स्वामित्व दिया जाय। इससे श्रमिकों का पलायन कम होगा, रोजगार के अवसर बढ़ेंगे और क्षेत्रीय विकास में समृद्धकारी संतुलन आयेगा। महानगरीय इलाकों का बोझ और सामाजिक विकृतियाँ भी घटेंगी।

                भारत की  84 प्रतिशत कृषि भूमि लघु एवं सीमांत जोतों में बंटी हुई है जिनपर कुशल कृषि चुनौती रही है। इस चुनौती का सामना करने हेतु पचास के दशक में सहकारिता को अपनाया तो गया था पर इस प्रतिरूप की सफलता के लिए अनुकूल  वातावरण का सृजन भी करना जरूरी था। गुजरात में अमूल के मामले में तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के निर्देश पर ऐसा प्रयोग के तौर पर किया गया और इसका लाभ समूचे राज्य को मिला और आज यह देश के लिए अच्छा माडल साबित हुआ है। दुनिया भर में सहकारिताआर्थिक लोकतन्त्र की मूक क्रांति’ (Silent Revolution for Economic Democracy) मानी गयी है। ऋग्वेद का ‘संगछद्व्म संगवदध्वम, संवो मनांसि जानताम’ सहकारिता का मूल मंत्र है।                

                सभी मध्यम आकार के उत्पादक, खेतिहर, मजदूर, उपभोक्ता आपूर्ति व व्यसायिक इकाइयां और कृषि सहायक (एग्रीको) और कृषि आधारित (एग्रो) उद्योग समन्वित सहकारी समितियों (coordinated cooperatives) द्वारा चलाए जाएं तो बेहतर। सामूहिक खेती के भी प्रयोग किए गए हैं विशेषकर साम्यवादी व्यवस्थाओं में। पर परिणाम निराशाजनक ही रहे हैं। अतः समर्थन योग्य नहीं हैं।

                भारत में अनौपचारिक सहकारिता के तौर पर ‘स्वयं सहायता समूह’ अच्छा कार्य किए हैं। अब इनसे आगे बढ़कर  समन्वित सहकारिता विकसित करने की जरूरत है। पूर्व में सहकारिता सरकारी विभागों के नियंत्रण में रही है, जिसमें सत्ताधारी राजनेता और नौकरशाह अपना प्रत्यक्ष-परोक्ष कब्जा बनाए रखते हैं, जबकि आम सदस्यों की सुनी ही नहीं जाती। परिणाम अक्षमता, घोटाले और नुकसान हैं। ऐसी अधीनस्थ सहकारी समितियां (subordinated cooperatives) असफल रही हैं। सहकारी समितियों में सरकारों को केवल ‘दोस्त, दार्शनिक और दिग्दर्शक’ की अप्रत्यक्ष सकारात्मक और प्रचारात्मक भूमिका तक ही सीमित रहना चाहिए । नयी कृषि व्यवस्था में अनुबंध या कारपोरेट खेती व विपणन पर ज़ोर देने के  बजाय समन्वित सहकारी खेती व विपणन का विकल्प कम से कम छोटी जोतों के लिए अधिक उपयुक्त है। इससे कामगारों का पलायन कम होगा, रोजगार के अवसर बढ़ेंगे और क्षेत्रीय विकास में संतुलन और समृद्धि पैदा होगी। महानगरीय क्षेत्रों का बोझ और सामाजिक विकृतियां भी कम होंगी।

                छोटी या अनुत्पादक कृषि जोतों  को समन्वित सहकारी खेती में शामिल किया जाना चाहिए । इस तरह के सहकारी समूह में अपनी भूमि एकत्र करने वाले प्रत्येक किसान को उस भूमि की वापसी के लिए व्यक्तिगत स्वामित्व अधिकार की गारंटी दी जानी चाहिए, जब उद्यम बंद हो जाय या पुनर्गठित किया जाय। यदि वह समिति से बाहर जाता है तो समिति दोनों पक्षों की सहमति के आधार पर चार विकल्पों का का उपयोग कर सकता है:

) समिति उसे अपनी भूमि के उपयोग के लिए नकद या वस्तु में किराया देना जारी रख सकता है ।

) यदि संभव हो तो समिति उसकी भूमि वापस कर सकता है ।

) समिति नकद या सार्वजनिक बांड या दोनों के रूप में, संसाधनों की सीमा में पर्याप्त मुआवजा देकर उससे जमीन खरीद सकती है।

) राज्य सरकार उसकी संतुष्टि तक समकक्ष भूमि आवंटित कर सकती है ।

                कुल मिलाकर, गुजरात, महाराष्ट्र, आंध्रा, तमिलनाडु, कर्नाटक, पंजाब, मध्यप्रदेश आदि राज्यों की समृद्धि में सहकारिता ने महती भूमिका निभाई है। सतत पोषणीय विकास हेतु इन राज्यों की भांति अन्य राज्यों में भी  समन्वित सहकारिता के लिए अनुकूल नीतिगत, विधायी, तकनीकी व प्रोत्साहनकारी वातावरण की सृजन सरकार के लिए अधिक कठिन नहीं है, दृढ़ इच्छाशक्ति की आवश्यकता है। कंपनियों के हाथों खिलौना बनने से बचना होगा। इस क्षेत्र में हाल के वर्षों में अनौपचारिक सहकारिता के रूप में  स्वयं सहायता समूह अच्छा कार्य करते रहे हैं तथा कमजोर वर्गों और महिलाओं में उद्यमिता, स्वावलंबन व जागरूकता बढ़ाने में बड़ा योगदान किए हैं। 

                यह नहीं भूलना चाहिए कि डेन्मार्क, हालैण्ड, इसराइल, जर्मनी आदि यूरोप के किसानों की मानसिकता भी भारत के किसानों से ज्यादा भिन्न नहीं है। पर उन्हें जब  लगा कि कंपनियों का वर्चस्व उन्हें बर्बाद कर देगा तो उन्होंने सहकारी खेती और विपणन को उत्साह के साथ अपनाया।

()    एफपीओ  

        एफपीओ (फार्म प्रोड्यूसर ऑर्गनाइज़ेशन) स्कीम में कार्पोरट, सहकारी व समूहिक खेती व विपणन प्रयासों को शामिल किया गया है पर इसमें भी परोक्ष  बल कार्पोरट वर्चस्व पर ही है, अतः सहकारिता दब जाती है। एक निर्माता संगठन (पीओ) प्राथमिक उत्पादकों  द्वारा गठित एक कानूनी इकाई है। एफपीओ में कृषि उत्पादकों विशेष रूप से छोटे और सीमांत किसानों का सामूहिकीकरण होता है ताकि सामूहिक रूप से कई चुनौतियों का समाधान करने के लिए एक प्रभावी गठबंधन बन सके। यह कृषि से जुड़ी अनेक चुनौतियों का सामना करने तथा निवेश, प्रौद्योगिकी एवं आदान तथा बाजार तक पहुंच में सुधार के लिए भी एक अत्यंत प्रभावी तरीका बन कर उभरा है।

                वर्तमान में पूरे देश में लगभग 5000 एफपीओ (एफपीसी सहित) की संख्या है । इनमें से लगभग 3200 एफपीओ उत्पादक कंपनियों के रूप में पंजीकृत हैं और शेष सहकारी समितियों आदि के रूप में हैं।  आज किसानों के आक्रोश का एक बड़ा कारण कार्पोरट वर्चस्व में निहित कमजोरों के शोषण व घोर उपेक्षा का भय है। यहाँ समझना आवश्यक है कि कंपनी ‘एक शेयर एक वोट’ के सिद्धान्त पर चलती है जबकि सहकारिता ‘एक व्यक्ति एक मत’ व ‘सबके लिए एक और एक के लिए सब’ के सिद्धान्तों पर ‘न लाभ न हानि’ का अनुसरण करती है।

()  सब्सिडी नीति     

                सरकार छोटे कारोबारियों और किसानों के लिए ढेरों योजनाओं की घोषणायेँ करती रही है। समन्वित सहकारी समितियों के माध्यम से इनका समुचित लाभ उठाया जा सकता है। सरकारों को भी सहायता और ऋण-प्रदायन में समन्वित सहकारी समितियों और स्वयं सहायता समूहों को प्राथमिकता देने के लिए तथा संवर्धन के लिए योजनायें चलानी चाहिए । टीम वर्किंग की कार्यकुशलता और प्रोत्साहन के लिए व्यक्तिगत किसानों और व्यवसायों के सभी प्रोत्साहनों और सब्सिडी को समन्वित सहकारी समितियों और स्वयं सहायता समूहों में डायवर्ट करना आवश्यक है ।

()    रोजगार नीति      

          उचित विकेंद्रित नियोजन के द्वारा साधनों के उपयोग और आर्थिक क्रियाओं का स्तर हर क्षेत्र में ऊंचा करके शत-प्रतिशत रोजगार सुनिश्चित करना होगा। किसी भी क्षेत्र में किसी एक व्यवसाय पर अधिक निर्भर न करके प्रायः 30-40 प्रतिशत रोजगार कृषि में, 20% कृषि आधारित उद्यमों में, 20%  कृषि सहायक उद्यमों में, 10-20%  गैर-कृषि उद्योगों में, 10% व्यापार-वाणिज्य में तथा 10% सफ़ेद-पोष क्रियाओं में रखना संतुलित अर्थव्यवस्था हेतु अपेक्षित है।

()   मूल्य निर्धारण नीति

            कृषि उपज के मूल्य निर्धारण के मामले में इसे उद्योग की तरह ही देखना उचित है। लागत पर उचित लाभ तथा रिस्क प्रीमियम के साथ न्यूनतम मूल्य की गारंटी होनी चाहिए। कृषि और गैर-कृषि क्षेत्रों के बीच आय के अंतर को कम किया जाना आवश्यक है। स्थानीय स्तर पर कृषि आधारित उद्योगों की व्यवस्था कर पैदावार में विविधता लाने की जरूरत है।
()   लोकल को वोकल नीति

            अल्पावधि में स्थानीय संसाधनों का त्वरित उपयोग सुनिश्चित करने के लिए निर्माण; औद्योगिक उत्पादन; कृषि उत्पादों, डेयरी, सेवाओं आदि का उत्पादन, प्रसंस्करण और विपणन में समन्वित सहकारी समितियों के माध्यम से इकाइयों के संचालन में स्थानीय लोगों को शामिल करना आवश्यक  है ।

                    लोकल सही अर्थों में वोकल हो—यह सुनिश्चित करना होगा। केंद्र सरकार ने ‘लोकल को वोकल’ बनाने का आह्वान किया है। स्थानीय स्तर पर आत्मविश्वास, स्वाभिमान और सामर्थ्य उत्पन्न करना होगा।  इसी आत्मविश्वास, स्वाभिमान और सामर्थ्य को उत्पन्न करने व बढ़ाने के लिए उपेक्षित और कमजोर क्षेत्रों को पहिचान प्रदान करने हेतु भाषा के आधार पर 1956 के राज्यों के पुनर्गठन को निरस्त कर सामाजिक-सांस्कृतिक-आर्थिक आधार पर भारत में राज्यों का नवगठन आवश्यक है। अबतक देश का दुर्भाग्य रहा है कि क्षेत्रीय अपेक्षाओं को राजनीति और वोट के नज़रिये से ही देखा गया है। जहां ढेर सारी हिंसा हुई, नए राज्य उत्तराखंड, झारखंड, छत्तीसगढ़, तेलंगाना गठित कर दिये गए। वोट व दबाव की राजनीति वाली यह मानसिकता व्यवस्था व अनुशासन के लिए ठीक नहीं है। लोकतन्त्र में हिंसा का कोई स्थान नहीं होना चाहिए। क्या केंद्र पहले की उपरोक्त मनोवृत्ति में परिवर्तन करेगा और लोकल को वोकल बनाने की स्वघोषित  नीति के प्रति गंभीर होगा?

()   'मेक इन इंडिया' नीति बनाम 'मेड इन इंडिया' नीति' 

आर्थिक नीतियों में ‘मेक इन इंडिया’ तकनीकी हस्तान्तरण हेतु अल्पसमय के लिए ही उपयोग के लायक है। दीर्घकाल में तो यह पूंजीवाद को व्यवस्था पर थोपने व ‘सुख के साथी’ बाहरी कंपनियों के  अवसरवाद का ही उपाय है। अतः टिकाऊ रास्ता तो  ‘मेड इन इंडिया’ ही है। स्थानीय अर्थव्यवस्था को उबारना अब तात्कालिक बाध्यता बन चुकी है। मेरा सुझाव है कि तात्कालिक तौर पर श्रम-गहन तकनीकों, परियोजनाओं व गतिविधियों को प्राथमिकता दें। दीर्घकाल में पूंजी गहन  तकनीकों का मध्यम आकार के उद्यमों में समन्वित सहकारिता के माध्यम से तथा बड़े उद्यमों व परियोजनाओं को सार्वजनिक व सरकारी नियंत्रण में चलाया जाना चाहिए। स्थानीय साधनों का अल्पकाल में ही तेजी से उपयोग सुनिश्चित हो सके, इसके लिए राजनीतिक-आर्थिक-सांस्कृतिक स्थानीय आवाज़ व पहिचान को तत्काल कार्यरूप में लाते हुए प्रदेशों व योजनाओं का पुनर्गठन किया जाना चाहिए। ‘मेक इन इंडिया’ को कम से कम 51 प्रतिशत के सरकारी/सार्वजनिक नियंत्रण में चलाया जाना ही उचित है।

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प्रोफेसर आर पी सिंह

वाणिज्य विभाग, दी द उ गोरखपुर विश्वविद्यालय

ईमेल: rp_singh20@rediffmail.com

फ़ोन : 99355 41965 



                                                                                 

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