अफगानिस्तान में तालिबानी वर्चस्व के निहितार्थ

 


निकम्मे, मौकापरस्त और भ्रष्ट नेता किस प्रकार से एक अच्छी खासी व्यवस्था को, एक अच्छे खासे देश को बर्बाद कर सकते हैं आज अफगानिस्तान इस बात की गवाही दे रहा है। थोड़ा सा अच्छा ग्राउंडवर्क करके तालिबान ने बड़ी आसानी से इन नेताओं के हाथों से व्यवस्था को अपने कट्टरपंथी आगोश में ले लिया

महात्मा बुद्ध ने मज़्झिम निकाय पर बल दिया था अर्थात मध्यम मार्ग का अनुसरण करो। मैं गौतम बुद्ध का अंधभक्त तो नहीं हूँ, किंतु आज जिस तरह से ध्रुवीकरण के नाम पर पूरी दुनिया में हर तरफ से अतिवाद व कट्टरपंथ को बढ़ावा दिया जा रहा है उसमें बुद्ध की बात को निश्चित रूप से प्रासंगिक समझता हूँ ।  यह देखा जा रहा है कि दुनिया में जितने भी मुख्य धर्म मत हैं—ईसाई, इस्लाम, हिंदू, बौद्ध, सिख आदि -- इनमें से हरेक अपनी बात को सही तथा पूरी दुनिया के लिए अनुकरणीय मांनता है और बाकी सब को किसी न किसी रूप में गलत ठहराने का उपाय करता है।  हर एक अपनी कमियों को छुपाता है और अपनी खूबियों को आदर्श बता कर के दूसरों पर हावी होने का प्रयास करता है। प्रत्येक धर्म मत अपनी सनक और संकीर्णताओं को दुनिया पर थोप कर अच्छी खासी सुंदर धरती को नर्क बनाने पर आमादा हैरूढ़ी, जाति, नस्ल या क्षेत्रवाद के नाम पर मानवता का हनन करने पर तुला है । भारत से 5 गुना छोटा और महज 3 करोड़ की आबादी वाले पर्वत पठार युक्त खूबसूरत अफगानिस्तान को भी अतिवादी मजहबी आतंकवाद ने नरक में तब्दील कर दिया है।

दूर कहाँ जायें, हिंदुत्व की ही बात लें तो यह भाजपा या आरएसएस की संपत्ति नहीं रही है। गांधी और उनकी कांग्रेस ने भी हिंदुत्व और रामराज्य का उपयोग अपने ढंग से करके अपने पक्ष में जनाधार बढ़ाने का उपाय किया था। आज भाजपा भी यही कर रही है और उसके राजनीतिक व अन्य सहयोगी भी वही कर रहे हैं। किंतु गांधी से लेकर के आज तक हिंदुत्व की जो राजनीति हुई इसने भारत को लगातार कमजोर ही किया। पहले बर्मा भारत से अलग हुआ1938 में, फिर बटवारा हुआ, फिर तिब्बत भारत के प्रभाव क्षेत्र से बाहर हो गया। आज हिंदुत्व के कट्टरवादी ध्रुवीकरण की मुहिम में जातियों में बंटा हिंदू भले ही एक न हो पा रहा हो, किंतु भारत के भीतर और बाहर उसकी प्रतिक्रिया में इस्लामी कट्टरवाद लगातार बढ़ रहा है।  भारत के बाहर अमेरिकी पूंजीवाद का समर्थन पाने की लालसा में एक और रूस से दूरी बढ़ी है तो दूसरी तरफ रूस और चीन जैसे देश इस्लामी कट्टरवाद के और नजदीक आए हैं। नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका, बर्मा और अब तो तालिबानी अफगानिस्तान भी भारत के प्रभाव क्षेत्र से बाहर जा चुका है। अब जो स्थितियाँ बन रही हैं उनमें कश्मीर और अरुणाचल पर ही खतरा नहीं है बल्कि बंगाल और झारखंड समेत समूचे नॉर्थ ईस्ट और आगे तमिलनाडु पर भी खतरा है।

जिस तरह की बातें आज सोशल मीडिया में आ रही हैं वह साबित करती हैं कि आज हिंदुत्व के कट्टरवादी तालिबान व लश्कर की नकल पर उतारू हैं।  भारत को बचाना है तो धार्मिक, जातीय या किसी भी प्रकार के कट्टरवाद व  अतिवाद का कठोरता से दमन कर मध्य मार्ग का अनुसरण करना होगा जो कि वैश्विक और मानव धर्मी दृष्टिकोण में निहित है। 

हमारे नेता सिर्फ अपनी शेखी बघारने में लगे हुए हैं और उनका जाति-धर्मवादी लोकतंत्र इस देश को बर्बाद कर रहा है — वास्तव में यह लोकतंत्र नहीं है बल्कि नेता तंत्र और दल तंत्र है। आम जनता का ध्यान केवल फालतू बातों और नेताओं का ध्यान केवल फालतू कामों में लगाया जा रहा है। समय आ गया है कि लोकतंत्र का ढोंग छोड़कर वास्तविक नैतिक शक्तियों की पहचान कर सत्ता उनको हस्तांतरित की जाय।

अमेरिका, यूरोप या अन्य किसी पूंजीवादी या साम्यवादी गिरोह का भारत को पिछलग्गू बनने की आवश्यकता नहीं है। भारत को मजहबी और जातीय कट्टरवाद को समूल नष्ट करने में स्वयं ही वैश्विक स्तर पर बड़ी भूमिका निभानी होगी। इसके लिए भारत को संकीर्ण मानसिकता वाले स्वार्थी नेताओं, संगठनों व गिरोहों से मुक्त होना होगा, और अतिवादी तथा धर्ममतवादी वैश्विक अपेक्षाओं को स्थानीय अपेक्षाओं के अधीन लाना होगा, इनमें मिला देना होगा। दुनिया छोटी हो चुकी है। अब राष्ट्रवाद के समाधान कारगर नहीं होने वाले। इससे देश और कमजोर हुआ है। संकीर्णताओं को छोड़ समय रहते एक ईश्वर और 'वसुधैव कुटुंबकम' के आह्वान युक्त ‘भागवत धर्म’ की शरण लें तथा खुले मस्तिष्क से विज्ञान और टेक्नालाजी के साथ चल दुनिया में अपनी स्वीकार्यता बढ़ावे।

मास-मीडिया में दिखने-छपने की प्रवृत्ति कम करनी होगी, इससे संगठन को मजबूत नहीं होता है, न ही आंतरिक जागरूकता आती है, लेकिन संकीर्ण ताकतों को विचारधारा के विरुद्ध आक्रामक होने का मौका मिल जाता है।  इसीलिए प्रउत प्रणेता श्री प्रभात रंजन सरकार ने ऐसे आंतरिक प्रकाशनों पर जोर दिया था जो संगठन को मजबूत बनाएं। आज बदली हुई प्राविधिकी के साथ इन प्रकाशनों/चैनल्स को प्रोत्साहित करना और बढ़ाना आवश्यक है।

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प्रोफेसर आर पी सिंह

वाणिज्य विभाग, दी द उ गोरखपुर विश्वविद्यालय

ईमेल: rp_singh20@rediffmail.com

फ़ोन : 99355 41965

8299530659

 

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1 Comments

  1. I think you should add somey more regarding your headline, rather than criticizing Hindu, BJP and RSS.

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