लोकतांत्रिक संकीर्णता: बारंबार चुनाव का अभिशाप



डेल्टा, ओमीक्रॉन और उनके खौफनाक संयोजन के साथ कोरोना की तीसरी लहर के डर के बावजूद जल्द ही भारत के पांच राज्यों में विधान सभा चुनाव होने वाले हैं। बहुत सी बातें परस्पर जुड़ी होकर वातावरण पर प्रभाव डालती हैं। आज क्या है? वोट पाने के लिए सरकार गरीबों की बात करती हैं और नोट पाने के लिए क्या करती है? पहले सत्ताधारी राजनीतिक दल नेताओं को दलाल की तरह इस्तेमाल करके लूट मचाते थे और अब कंपनियों को दलाल की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है, भ्रष्टाचार का निगमीकरण कर इसे कानूनी जामा पहना दिया गया है। कंपनियां पहले आवश्यक वस्तुओं के दाम बढ़ाकर अपने और सत्तासीन राजनीतिक दलों के उनकी जेबें में भरती हैं और फिर किसी अवसर पर किसी बहाने दाम घटाने की घोषणा हो जाती है। लूट तो अभी भी चल ही रही है।

इसका स्पष्ट उदाहरण तो नौकरशाही की स्वार्थ पूर्ण आक्रामकता के रूप में देखा जा रहा है। भारतीय विश्वविद्यालयों में देखें। कुलपति से लेकर आम अध्यापक और कर्मचारी तक के पद महगे दाम पर बेचे जा रहे हैं। गधों को विचारधारा या पैसे की आड़ में घोड़े के रूप में पेश किया जा रहा है। ये गधे अपनी सनक को समझ के रूप में संस्था पर थोपते हैं। गुणवत्ता के नाम पर अपनी एकतरफा सोच को पहले जबरन लागू करते हैं और फिर अधिक दबाव पड़ने पर इसे वापस लेते हैं। यह सब क्या है? विश्वविद्यालयों का यह उदाहरण अन्य सरकारी-अर्ध-सरकारी संस्थाओं पर भी लागू होता है।

यह सारी बातें व्यवस्था को कमजोर करती जा रही हैं। संकीर्णताएं मानवता का हनन ही नहीं करती हैं, व्यवस्था को भी हर तरह से कमजोर करती हैं। संकीर्णताओं को सांस्कृतिक या नैसर्गिक विविधता के नाम पर पाला नहीं जा सकता। आज चीन हर क्षेत्र में हावी हो रहा है भारतीय उपमहाद्वीप में तो यह लद्दाख अरुणाचल और भूटान में घुस चुका है, आधा भारत खतरे में है। चीन के पास भारत से तीन गुनी ज़मीन है लेकिन हम उनकी एक इंच ज़मीन हथियाने का साहस नहीं कर पाते। 6 सितंबर, 2019 को विक्रम लैंडर और चंद्रयान-2 के तहत प्रज्ञान लूनर रोवर के दुर्घटनाग्रस्त होने के बाद अब तक हम चंद्रमा पर अपने रोवर को लैंड करने में सफल नहीं रहे हैं, जबकि चीन ने मंगल ग्रह पर सफलतापूर्वक अपने रोवर को उतार लिया है ।रास्ता क्या है? यह समझने के लिए कुछ बातों पर दृष्टि डालना आवश्यक है।

1950 से पहले चालाकी के बल पर ब्रिटेन आधी दुनिया पर काबिज था, भारत को तो इसने एक मामूली कंपनी बनाकर के कब्जा कर लिया था और वही ब्रिटेन आज भी अमेरिका और रूस के साथ मिलकर मजबूत बना हुआ है। खुले विचारों और विज्ञान व टेक्नोलॉजी को अपनाकर अमेरिका ने अपनी जड़ता को कम की और तथाकथित मुक्त बाजार के माध्यम से सबसे आगे पहुंचा और दुनिया की 40% सम्पत्ति का मालिक बन बैठा था। लेकिन अब उसे पीछे धकेल कर चीन साम्यवादी जड़ताओं के बावजूद विज्ञान-प्रौद्योगिकी और अनुशासन के बल पर सबसे आगे निकल चुका है, दुनिया की एक तिहाई संपत्ति का मालिक बन चुका है। रूस और मुस्लिम देशों के साथ वह आज सबसे ज्यादा ताकतवर बन चुका है। भारत उससे बौद्धिक और सैनिक स्तर पर मुकाबला करने में कमजोर पड़ रहा है। जड़ताओं को ढीला कर विश्व मंच पर इनका हावी होना स्वाभाविक है जबकि अमेरिका और उसके सहयोगी भीड़ तंत्र को लोकतंत्र पूंजीवाद को मुक्त अर्थव्यवस्था, डॉग्मा को धर्म और निरंकुश चिंतन को मुक्त चिंतन समझने का भ्रम पाले हुए हैं। भारत संकीर्णताओं से मुक्त कर इनसे भी आगे निकल सकता है।

हमारे लिए क्या रास्ता है? हम तेरह सौ वर्षों से अपने हाथ-पैर भावगत व पदार्थगत जड़ताओं के शिकंजे से बांधे हुए हैं। आगे बढें तो कैसे! हमारे लिए पूंजीवादी और साम्यवादी जड़ताओं से मुक्त होना कठिन नहीं है। लेकिन जातीय और सांप्रदायिक जड़ताओं से भी मुक्त होना होगा। कानूनी सुधारों से यह भी सुनिश्चित करना बहुत आसान हो गया है।

हम जापान में मेजी बहाली के अनुभव से सीख सकते हैं जिसमें चार जातियों, बहिर्जातियों और गुलामी की तत्कालीन प्रचलित प्रणाली (बौद्ध धर्म के अलावा भारतीय समाज से पहले के समय की नकल) को जड़ से बाहर कर दिया गया था और दाइमों (विप्र) और समुराई (योद्धा) की स्थानीय ताकतों को कमोडोर मैथ्यू सी पेरी के माध्यम से अमेरिका की पहल और समर्थन से गठित आधुनिक सेना की मदद से कुचल दिया गया था । यह सम्राट मेजी के नेतृत्व में 1860 के दशक के दौरान व्यापक सुधारों की एक पूरी शृंखला की कड़ी की तरह से किया गया था ।

लेकिन एक मजबूत सरकार में भी इस दिशा में राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव है, डोगमा युक्त विचारधारा की प्रतिबद्धता भी इसमें बहुत बड़ी बाधा है। आज क्या स्थिति है? इतिहास और संस्कृति की आड़ में अपने लालच और अकुशलता को छुपाया जा रहा है, इतिहास से काम नहीं चल रहा है तो मिथकों को इतिहास के रूप में पेश किया जा रहा है। वंशव्यवस्था (सूर्यवंशी), जातिव्यवस्था (क्षत्रियजाति), राजतंत्र जैसी प्रवृत्तियों को अक्षुण्णता प्रदान करने वाली रामकथा को ऐतिहासिक बताने वाले इस बात को इतिहास मानने इंकार कैसे करेंगे कि भगवान परशुराम ने धरती से 36 बार क्षत्रियों का दमन किया था? फिर दक्षिण भारत के लोगों का दानव, दैत्य, राक्षस, असुर, अनार्य आदि के रूप में प्रतीकीकरण की संस्कृति क्या भारत के लिए हितकर है?

राजनीतिक आजादी के बाद के 75 वर्षों में हम अपने को जाति और संप्रदाय के पहचान से मुक्त नहीं कर सके बल्कि ऐसे नेताओं को ही चुना जो जाति और संप्रदाय को खत्म करने के लिए गंभीर कभी थे ही नहीं। दूसरी तरफ बगल में चीन और रूस इन आडम्बरों से प्राय: मुक्त हो काफी आगे बढ़ चुके हैं। पर हम ऐसा नहीं कर पा रहे हैं, इसके प्रति कभी गंभीर भी नहीं हुए। यही कमजोरी भारत के लिए बहुत भारी पढ़ने जा रही है। आप चाहे विश्व गुरु हो जाएं या विश्व नेता हो जाए मत भूलिए कि महाभारत के लिए महायुद्ध यदि कभी हुआ था तो उसका असली अखाड़ा भारत ही था।

ऐसी व्यवस्था कायम करनी पड़ेगी कि लोग याद करने से परहेज करें कि वह मुसलमान हैं कि ईसाई, हिंदू हैं या सिख, बौद्ध हैं या जैन और वह भूल जाएं कि वह सवर्ण हैं कि अवर्ण, अगड़े हैं कि पिछड़े हैं। पूरी दुनिया को इस्लाम या ईसाई या कुछ अन्य बनाने की मनोवृत्ति को धूल धूसरित कर स्थानीय समाजों में मिला देना होगा। तभी यह देश मजबूती के साथ दुनिया के सामने और साथ खड़ा हो सकेगा तथा और कुशलता और आतंकवाद से निजात पाने में दुनिया का सफल नेतृत्व कर सकेगा। निश्चित रूप से जातीय और सांप्रदायिक जड़ताओ से मुक्त होना बेहद कठिन है। लेकिन ऐसा न करके हम आने वाले समय में जो स्थितियां बन रही हैं उसमें देश व दुनिया की बड़ी आबादी के अस्तित्व को संकट में डालने जा रहे हैं—यह कोई भविष्यवाणी नहीं, अनुमान है।

अफगानिस्तान दुनिया के लिए सबक है। यदि डॉगमा को खत्म न किया जाए तो वह भारत और पूरी दुनिया की बर्बादी का जरिया बन सकता है।

आज भारत का लोकतंत्र राजनेताओं के सालों-साल रोजगार का माध्यम बन चुका है। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि राजनीतिक चुनाव प्रत्यक्ष रूप में केवल समाज या राज्य इकाइयों के विधानसभाओं के स्तर पर ही संपादित हों; बाकी पंचायत, जिला या राष्ट्रीय स्तर पर सभी राजनीतिक चुनाव प्रतिनिधियों के मतदान/सलेक्टो-इलेक्शनल/नियुक्ति के द्वारा हों। इससे हम भी नियामक लोकतांत्रिक व्यवस्था में अनुशासन कायम करने में सक्षम हो पाएंगे और साधनों और समय की उस फालतू बर्बादी से बच सकेंगे जो राजनेताओं को सालों साल रोजगार देने के उपाय में किया जाता है। सामाजिक-सांस्कृतिक और आर्थिक इकाइयों के यथा शैक्षिक संस्थाओं सरकारी संस्थाओं इत्यादि के चुनाव समय-समय पर होते रहे विभिन्न स्तरों पर इसमें कोई कठिनाई नहीं है।

प्रोफेसर आर पी सिंह
वाणिज्य विभाग, गोरखपुर विश्वविद्यालय
E-mail: rp_singh20@rediffmail.com
Contact : 9935541965


    






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