मानव समाज को एकजुट कैसे करें ?




  

मानव समाज को एकजुट कैसे करें?

- श्री प्रभात रंजन सरकार 


लोगों और समाज के विकाश और समृद्धि के लिए प्रयास करते हुए, हमें केवल विभिन्न समुदायों के बीच समान बिंदुओं को ही प्रोत्साहित करना चाहिए - अंतर या भिन्नता के बिंदुओं को नहीं।  समाज में पहनावे, रीति-रिवाजों, सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों, खान-पान, भाषा आदि को लेकर मतभेद होना स्वाभाविक है । लेकिन अगर इन मतभेदों को अनुचित महत्व दिया जाता है, तो सामाजिक समस्याएँ केवल बढ़ेंगी, और परिणामस्वरूप एकता और समाज का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा। यदि समकालीन समाज की गिरावट को रोकने के लिए तत्काल कुछ नहीं किया गया, तो विभिन्न कारकों के परिणामस्वरूप, समय आने पर समाज अपने आप कुछ समान या साझा सिद्धांतों को विकशित कर लेगा। इसलिए मतभेद के बिंदुओं को कभी भी किसी भी तरह से प्रोत्साहित नहीं करना चाहिए।


सामाजिक और राजनीतिक नेताओं को समाज में मतभेद के मुद्दों का राग अलापने से बचना चाहिए। इसके बजाय, उन्हें लगातार इस बात पर जोर देना चाहिए कि जटिल विभाजनकारी मुद्दों को उठाने का यह उपयुक्त समय नहीं है। उदाहरण के लिए भारतीय भाषाओं का ही उदाहरण लें। भारत में बहुत से लोग हैं जो भाषा के मुद्दे पर बेवजह लड़ते हैं, लेकिन क्याअभी इस मुद्दे को उठाने का उचित समय है जब भूख, अकाल, बीमारी, शैक्षिक पिछड़ेपन, आर्थिक संकट आदि से बहुत सारे लोग पीड़ित हैं? क्या भारत के लोग तुलनात्मक रूप से महत्वहीन भाषा के मुद्दे पर अपना बहुमूल्य समय बर्बाद कर सकते हैं? इसके विपरीत, उन्हें तुरंत शोषण के खिलाफ एक अभियान शुरू करना चाहिए, क्योंकि इससे विभाजनकारी ताकतें नियंत्रण में रहेंगी। यदि ऐसा नहीं किया जाता है, तो विघटनकारी ताकतें समाज में रुकावटें और कलह पैदा करेंगी, और लोगों के सामने आने वाले महत्वपूर्ण ज्वलंत मुद्दे असुलझे रहेंगे।


एकता के बिंदु


किसी भी देश की प्रगति एकता पर निर्भर करती है, इसलिए एकीकरण के कारकों पर ही जोर दिया जाना चाहिए। विखंडनीय ताकतों को खत्म करने के लिए हमें निम्नलिखित तीन क्षेत्रों में फूट के खिलाफ एक अथक युद्ध लड़ना होगा :


सामाजिक-आर्थिक क्षेत्र


जहाँ एक ओर कुछ लोग बहुत धनी हैं, तो दूसरी ओर जनसंख्या का एक बड़ा प्रतिशत गरीबी में तड़प रहा है। स्वाभाविक रूप से, एक मजबूत समाज के निर्माण के लिए, सामाजिक-आर्थिक असमानता को पूरी तरह से मिटाना होगा।

सामाजिक-आर्थिक विषमता के उन्मूलन के साथ-साथ समाज की सामूहिक संपत्ति को भी उत्तरोत्तर बढ़ाना होगा, तभी जनसंख्या की बढ़ती मांगों को सफलतापूर्वक पूरा किया जा सकता है। आइए हम उड़ीसा का उदाहरण लें: यहाँ कृषि उत्पादन, विशेषकर बरसात के मौसम में, लगभग पूरी तरह से मानसून पर निर्भर करता है। लेकिन अगर सिंचाई प्रणाली को ठीक से विकशित किया जाए, तो राज्य में कुल कृषि उत्पादन में 300 प्रतिशत की वृद्धि होगी, और अतिरिक्त 4 करोड़ लोगों को भोजन खिलाया जा सकता है। आज [यानी 1970 में उत्पादन के वर्तमान स्तर पर  केवल डेढ़ करोड़ लोगों को  भोजन कराया जा रहा है। उड़ीसा खनिज संसाधनों में भी समृद्ध है। राज्य में प्रचुर मात्रा में कोयला, बॉक्साइट, मैंगनीज और अन्य खनिज आसानी से उपलब्ध हैं, लेकिन इनमें से कई खनिजों का निर्यात अन्य देशों में किया जा रहा है। यदि राज्य में तैयार माल के निर्माण के लिए इन कच्चे माल का उचित उपयोग किया जाए , तो उड़ीसा कम से कम चार बड़े पैमाने के इस्पात संयंत्र स्थापित कर सकता है। इससे लोगों की क्रय शक्ति में काफी वृद्धि होगी। दुर्भाग्य से, देश के अक्षम राजनीतिक नेता तर्कसंगत तरीके से नहीं सोचते हैं। इसके विपरीत, वे ऐसी योजनाएँ बनाते हैं जो न तो सामाजिक-आर्थिक विषमता को दूर करती हैं और न ही सामूहिक संपत्ति को बढ़ाती हैं।  उलटी गंगा बहाकर इन नेताओं ने बड़ी भूल की है।


दुनिया के सभी देशों में, आर्थिक रूप से वंचित लोगों को एक तरफ सामाजिक-आर्थिक संघर्ष के एक साझे कार्यक्रम के माध्यम से और क्रूर पूंजीवादी शोषण के खिलाफ लड़कर, तथा दूसरी तरफ सामूहिक संपत्ति की मात्रा बढ़ाने के लिए विकाशात्मक कार्यक्रमों को लागू करके एकजुट किया जा सकता है। व्यापक सिंचाई, खनन, कृषि और औद्योगिक विकाश करके किसी भी देश की सामूहिक संपत्ति को आसानी से बढ़ाया जा सकता है।


सामाजिक विषमता को सुचारू रूप से समाप्त करने और सामूहिक संपत्ति को बढ़ाने के लिए पूरे विश्व में आत्मनिर्भर सामाजिक-आर्थिक क्षेत्र स्थापित किए जाने चाहिए। राजनीतिक आधार पर राज्यों का गठन करने से सावधानीपूर्वक बचना चाहिए। एक राजनीतिक इकाई में कई सामाजिक-आर्थिक क्षेत्र हो सकते हैं जिनकी अपनी-अपनी समस्याएँ हो सकती हैं। उदाहरण के लिए, बिहार राज्य एक राजनीतिक इकाई है, लेकिन यहाँ छोटानागपुर पहाड़ियाँ जहाँ सिंचाई की समस्या से जूझ रही हैं, वहीं उत्तरी बिहार के मैदानी इलाके जल निकासी की समस्या से जूझ रहे हैं। आंध्र प्रदेश के रॉयलसीमा, श्रीकुलम और तेलंगाना क्षेत्र आंध्र प्रदेश की राजनीतिक इकाई में स्थित हैं, लेकिन उनकी सामाजिक-आर्थिक क्षमताएँ काफी भिन्न हैं। इन क्षेत्रों से अधिकतम लाभ प्राप्त करने के लिए, अलग-अलग सामाजिक-आर्थिक क्षेत्रों का गठन किया जाना चाहिए, भले ही वे एक ही राजनीतिक इकाई में रहें या नहीं। राजनीति या भाषा के आधार पर राज्य बनाना बहुत बड़ी भूल है। यदि पूंजीपति और मजदूर एक ही भाषा बोलते हैं, तो क्या कहा जा सकता है कि वे अपनी भाषाई समानता के कारण मित्र हैं?


मनो-भावनात्मक क्षेत्र


मानसिक क्षेत्र में, कुछ ऐसे कारक हैं जो लोगों के विभिन्न भाषाई समूहों को एकजुट करने का काम करते हैं। उदाहरण के लिए, सभी उत्तर भारतीय भाषाओं और कुछ दक्षिण भारतीय भाषाओं की उत्पत्ति और विकास संस्कृत से हुआ है। इन भाषाओं पर संस्कृत का अत्यधिक प्रभाव पड़ा है। ऐसे में किसी को भी संस्कृत के अध्ययन का विरोध नहीं करना चाहिए। यह एक मामूली बात प्रतीत हो सकती है, लेकिन अगर इसे प्रोत्साहित किया जाता है, तो यह भारतीय समाज में एक महान एकीकरण कारक होगा।

सामाजिक परंपराओं में भी, कुछ समान या साझे बिंदुओं को विकसित किया जा सकता है। गौरवशाली अतीत की सभ्यताओं और महान व्यक्तित्वों पर अनुसंधान और पुरातात्विक उत्खनन एक मजबूत राष्ट्रीय भावना को जगाने में मदद करेगा। उदाहरण के लिए, महेंजोदड़ो और हड़प्पा सभ्यताओं की खुदाई ने प्राचीन भारतीय संस्कृति की उपलब्धियों पर प्रकाश डाला।

इतिहास के अध्ययन को भी प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। इतिहास संस्कृत शब्द इतिकाथा का पर्याय नहीं है, जिसका अर्थ है "हिस्ट्री"अर्थात जो मात्र पिछली घटनाओं का कालानुक्रमिक रिकॉर्ड है। इतिहास शब्द का अर्थ है इतिकथा या हिस्ट्री का वह हिस्सा जिसका शिक्षाप्रद मूल्य है। इतिहास या किसी देश के सांस्कृतिक इतिहास का अध्ययन समाज के सदस्यों के बीच एकता की भावना पैदा करता है, और वे सांस्कृतिक विरासत पर उनके प्रभाव से अवगत हो जाते हैं। उदाहरण के लिए, ऐतिहासिक महाकाव्य महाभारत का अध्ययन लोगों के मन में गर्व और प्रेरणा की भावना पैदा करता है, और यह सामूहिक एकता की भावना को बढ़ावा देता है।


महापुरुषों, संतों और ऋषियों की स्मृति भी लोगों को आत्मीयता के समान बंधनों से बांधती है। जब लोग अपने पिछले नेताओं और संतों की धरोहर को संजोते हैं, तो सामूहिक एकता के लिए यह एक मजबूत नींव डालती है।

  

जहाँ कहीं  भी लोगों के बीच एक समान बिंदु है, उसे प्रोत्साहित किया जाना चाहिए, जबकि मतभेद के बिंदुओं को हतोत्साहित और समाप्त करना होगा। एकता को बढ़ावा देने और लोगों की समृद्धि बढ़ाने के लिए, यह मौलिक दृष्टिकोण होना चाहिए।


अध्यात्म-भावनात्मक क्षेत्र (स्पिरिचुओ-सेंटीमेंटल स्फीयर)


एक समान आध्यात्मिक विरासत की भावनाएँ और एक साझा आध्यात्मिक लक्ष्य ही ऐसी बातें हैं जो लोगों को स्थायी रूप से एक साथ बाँध सकती हैं। समाजार्थिक और मनो-भावनात्मक मुद्दे सामाजिक एकता और सामंजस्य बनाने के लिए अत्यंत उपयोगी हैं, लेकिन इन मुद्दों से उत्पन्न होने वाली भावनाएँ अस्थायी हैं। बृहत् (कॉज़्मिक) भावनाएँ स्थायी हैं। सार्वभौमिक (यूनिवर्सल) भावनाओं को जगाकर सामाजिक-आर्थिक एकता और बंधुत्व एक मजबूत बुनियाद पर आधारित होगा। लोग ब्रह्मांडीय पितृत्व और सार्वभौमिक बंधुत्व के संदर्भ में सोचेंगे। मेरा दृढ़ विश्वास है कि हम सभी एक ही सत्ता से आए हैं और हम सभी उसी सत्ता में विलीन हो जाएंगे। इस भावना से एक अद्वितीय एकीकरण की भावना उत्पन्न होगी। सभी लोग सार्वभौमिक प्रेम और मित्रता के बंधन से एकजुटता महसूस करेंगे, जो अंततः एक सार्वभौमिक समाज का मार्ग प्रशस्त करेगी।  महान सार्वभौमवादी कवि सत्येंद्र दत्त ने इस भाव को निम्नलिखित कविता में बखूबी व्यक्त किया है:

 रागे अनुरागे निद्रिता जागे असल मानुष प्रकट हय

वर्णे वर्णेना नाहिक विशेष निखिल भुवन ब्रह्ममय!

निविर एके याय मिशे' याय सकल भाग्य सब हृदय

मानुषे मानुषे नायको प्रभेद निखिल मानव ब्रह्ममय।


अर्थात, जब सोई हुई आत्माओं में प्रेम जागेगा, तब सच्चे मनुष्यों का उदय होगा।

एक व्यक्ति, एक जाति और दूसरी में कोई अंतर नहीं है, क्योंकि संपूर्ण ब्रह्मांड एक ही अनंत चेतना व्याप्त है! 


 जहाँ कहीं  भीलोगों के बीच एक समान बिंदु है, उसे प्रोत्साहित किया जाना चाहिए, जबकि मतभेद के बिंदुओं को हतोत्साहित और समाप्त करना होगा। एकता को बढ़ावा देने और लोगों की समृद्धि बढ़ाने के लिए, यह मौलिक दृष्टिकोण होना चाहिए। हमें हमेशा याद रखना चाहिए:


जगत जुड़िया एकजात आछे 

से जातिर नाम मानुष जाति

एक पृथ्वीर स्तनय पलित

एक रवि शशि मोदेर साथी।


[पूरी दुनिया में एक ही जाति है,

और उस जाति का नाम मानव जाति है।

हम सब एक धरती माँ के दूध से बंधे हैं,

और वही सूर्य और चंद्रमा हमारे साझे साथी हैं।]


 अंतर के बिंदु

मानव समाज के चार मुख्य क्षेत्रों - भोजन,वस्त्र, भाषा और धर्म - में स्पष्ट भिन्नताएँ हैं।


भोजन 

भारत में चार अलग-अलग खाद्य क्षेत्र हैं जहाँ नारियल का तेल, सरसों का तेल, तिल का तेल, या वनस्पति तेल या घी का उपयोग किया जाता है। पंजाब और उत्तर प्रदेश में ज्यादातर लोग रोटी पसंद करते हैं, जबकि पूर्वी और दक्षिणी भारत में लोग चावल पसंद करते हैं। लोग जो भोजन करते हैं वह भू-भौतिकीय (जिओ-फिजिकल) स्थितियों पर निर्भर करता है। यदि भारत के सभी लोगों को उनकी भू-भौतिकीय आवश्यकताओं को ध्यान में रखे बगैर एक ही भोजन करने के लिए मजबूर किया जाता है, तो यह एक बहुत बड़ी गलती होगी।

 वस्त्र या कपड़े 

इसी तरह, पोशाक और रीति-रिवाज भी विभिन्न भू-भौतिकीय कारकों पर निर्भर करते हैं। उदाहरण के लिए, सूखे रेगिस्तान में रहने वाले अरबों का मामला लें। गर्म हवाएँ और जलती रेत उनके निरंतर साथी हैं। स्वाभाविक रूप से, वे अपने शरीर को सिर से पैर तक ढकने और अपने घर भूमिगत बनाने के लिए मजबूर हैं, अन्यथा उनका जीवित रहना असंभव है। वहीं दूसरी ओर, उत्तर बिहार में रहने वाले लोगों को सतर्क रहना पड़ता है कि उनके कपड़े भारी बारिश के कारण कीचड़ से गंदे न हों। अत्यधिक ठंडे देशों में रहने वाले लोग अपने आप ही गर्म कपड़े पहनते हैं, जबकि उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में रहने वाले लोग ऐसा नहीं करते हैं। जाहिर है, किसी भी क्षेत्र में लोग जो पोशाक पहनते हैं वह काफी हद तक वहाँ की जलवायु से निर्धारित होती है। पर्यावरणीय परिस्थितियों की परवाह किए बिना लोगों को एक समान कपड़े पहनने के लिए कहना हास्यास्पद है। 




 भाषा

प्रत्येक देश में, भाषाएँ नस्लीय और सांस्कृतिक कारकों के अनुसार उत्पन्न और विकसित होती हैं। हालाँकि भाषाओं की उत्पत्ति मूल रूप से हर जगह समान है, फिर भी भाषाएँ जगह-जगह बदलती रहती हैं।


 रक्त की प्रकृति, नाक, ऑंख , बाल और त्वचा की संरचना नस्लीय विशेषताओं को परिभाषित करती है। इन कारकों के गठन में अंतर नस्लीय विशेषताओं में भिन्नता के लिए जिम्मेदार है। दुनिया में चार मुख्य नस्लें हैं - आर्य, मंगोल, ऑस्ट्रिक और नेग्रोइड। आर्य लाल या गोरे, मंगोल पीले, ऑस्ट्रिक गहरे भूरे और नीग्रो काले रंग के होते हैं। ऑस्ट्रिक-नेग्रोइड्स को "द्रविड़ियन" कहा जाता है।

                                                                       

आर्यों को तीन समूहों में विभाजित किया जा सकता है। सबसे पहले, नॉर्डिक आर्य जिनकी त्वचा लाल-सफेद,   बाल लाल या सुनहरे, आंखें बिल्लियों की तरह भूरे रंग की, रक्त गर्म और नाक तोते जैसी होती हैं। दूसरे, अल्पाइन आर्य जिनकी त्वचा दूधिया सफेद, बाल खारे नीले, आँखें नीली, रक्त नॉर्डिक की तुलना में थोड़ा ठंडा और नाक बाज जैसी होती है। तीसरे, भूमध्यसागरीय आर्य जिनकी  त्वचा गोरी,  बाल काले, आँखें काली, नाक  साधारण, अल्पाइन की तुलना में रक्त ठंडा और कद मध्यम के होता है। दक्षिणी फ्रांस, अरब देशों और बाल्कन राज्यों में रहने वाले लोग भूमध्यसागरीय उपजाति के हैं।


मंगोलियाई लोगों को पाँच समूहों में विभाजित किया जा सकता है। सबसे पहले, निप्पोनीज के जो बड़े चेहरे, सपाट नाक और बड़े शरीर वाले होते हैं। दूसरे, चीनी जो सपाट नाक और तिरछी आँखों वाले होते हैं। तीसरे, मलेशिया के जो छोटे शरीर और सपाट नाक वाले होते हैं। चौथे, इंडो-बर्मी लोग जो नाक सपाट और तुलनात्मक रूप से बड़े शरीर वाले होते हैं। पाँचवे, इंडो-तिब्बती लोग जिनकी नाक सपाट होती है। इन समूहों के सभी लोगों की त्वचा पीली और इनके शरीर पर छोटे बाल होते हैं।


ऑस्ट्रिक्स मध्यम आकार वाले शरीर और पंक-काले रंग की खाल वाले होते हैं।


नीग्रो लोगों की त्वचा काली, बाल गांठदार और होंठ मोटे होते हैं। आर्यों की तुलना में उनका खून थोड़ा ठंडा होता है और कद अक्सर लंबा होता है।


भारत में कई नस्लीय विभाजन हैं, जिनमें शामिल हैं इंडो-तिब्बती, जैसे लद्दाखी, किन्नरी, गढ़वाली, नेपाली, सिक्किम, भूटानी, नेवाड़ी, मिज़ो और गारो; भूमध्यसागरीय आर्य, जैसे कि कश्मीरी ब्राह्मण और वे जिनका रंग लाल या गोरा होता है; और द्रविड़, जैसे आंध्र प्रदेशी, कन्नड़, केरलवासी और तमिल।




प्रागैतिहासिक काल में संपूर्ण उत्तर भारत - अर्थात विंध्य पहाड़ियों के उत्तर में तिब्बत तक का पूरा क्षेत्र - समुद्र के नीचे था। विंध्य के दक्षिण क्षेत्र, वर्तमान अरब सागर, दक्षिण अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण पूर्व एशिया ने गोंडवाना द्वीपसमूह का गठन किया। ऑस्ट्रिक्स गोंडवानालैंड के दक्षिणी हिस्से में रहते थे, नीग्रो दक्षिण-पश्चिमी हिस्से में रहते थे और ऑस्ट्रिको-नेग्रोइड्स, यानी आज के द्रविड़, मध्य भाग में बसे हुए थे। विभिन्न जातीय समूहों की जैव-नस्लीय संरचना उस जाति को इंगित करती है जिससे वे संबंधित हैं।

नियमतः, एक मजबूत संस्कृति कमजोर संस्कृति पर बहुत प्रभाव डालती है। जब विभिन्न सांस्कृतिक पृष्ठभूमि वाले लोग साथ-साथ रहते हैं, तो मजबूत संस्कृति के लोगों द्वारा बोली जाने वाली भाषा स्वतः ही अन्य समूहों को प्रभावित करती है। उदाहरण के लिए, हालाँकि आर्य और गैर-आर्य संस्कृतियों के बीच स्पष्ट अंतर थे, आर्य भाषा इतनी शक्तिशाली थी कि पूर्वी और उत्तरी भारत की सभी भाषाओं को मुख्य रूप से संस्कृत पर निर्भर होना पड़ता था। संस्कृत का प्रभाव इतना व्यापक था कि दक्षिण भारत में भी इसने द्रविड़ भाषाओं पर जबरदस्त प्रभाव डाला। निम्नलिखित आँकड़े दर्शाते हैं कि पूर्वी और उत्तरी भारतीय भाषाएँ वैदिक संस्कृत से किस हद तक प्रभावित थीं। बंगाली में 92% संस्कृत शब्द हैं, उड़िया में 90%, मैथिली में 85%, तमिल में 3% और मलयालम में 75% । उत्तर भारत के कुछ लोगों ने समुद्र के रास्ते मद्रास के पश्चिमी भाग की यात्रा की और वहाँ बस गए, इसलिए मलयालम संस्कृत शब्दों से भरा है, हालाँकि क्रियाएँ तमिल से हैं।

आर्य संस्कृति का प्रभाव समाज के उच्च वर्गों पर प्रमुख था, यद्यपि अन्य वर्गों पर इसका सामान्य प्रभाव था। कुछ ऑस्ट्रिक समुदाय हैं जैसे साहा, धनग्रश आदि, जो घर पर एक ऑस्ट्रिक बोली बोलते हैं लेकिन अपने परिवार के दायरे से बाहर भोजपुरी बोलते हैं। इसी तरह, रांची जिले के सिंहमुंडा व सरकार, और त्रिपुरा के तिनेरा घर में अपनी बोली और बाहर बंगाली बोलते हैं। गढ़वाल और कुमायूं के लोगों ने तिब्बती और चीनी के बजाय इंडो-आर्यन भाषा बोलना शुरू कर दिया है। द्रविड़ भाषाओं में तमिल, तेलुगु, मलयालम, कन्नड़ और तुलु शामिल हैं। तिब्बती, चीनी और इंडो-चीनी भाषाओं के अक्षर समान हैं, हालाँकि चीनी और जापानी लिपियाँ चित्रमय हैं। सीलोन के निवासी सिंहली (जिसमें 87% संस्कृत शब्द हैं) और तमिल (13% संस्कृत शब्द) बोलते हैं। बंगाल के गुणतिलक और बंदर नायक समुदायों के सदस्य श्रीलंका चले गए और सिंहली समुदाय बन गए। बर्मा के लोग कई भाषाएँ बोलते हैं - बर्मी, चिन, काचिन, शुन और अन्य महत्वपूर्ण और महत्वहीन भाषाएँ। सिंहली की तरह, उनके अक्षर इंडो-आर्यन वर्णमाला पर आधारित हैं।



इंडो-आर्यन भाषाएँ  हैं : मराठी, राजस्थानी, गुजराती, पंजाबी, कश्मीरी, खारी, बाली, व्रजा, बुंदेलखंडी, अवधी, छत्तीसगढ़ी, भोजपुरी, अंगिका, मगही, मैथिली, बंगाली, उड़िया, असमिया, गढ़वाली, कुमाऊँनी और गोरखाली। ऑस्ट्रिक भाषाओं में सभी मुंडा भाषाएँ , संताल, केरई और मानखमेर समूह की बोलियाँ शामिल हैं। तिब्बती-बर्मी भाषाओं में असम की सभी भाषाएँ और बोलियाँ शामिल हैं, असमिया, मणिपुरी और नागर बोलियों को छोड़कर। तिब्बती-चीनी भाषाओं में लद्दाखी, बठी, किन्नरी, किरात, लेप्चा, तहरू, नेवारी, गारो, काशी और मिजो शामिल हैं। चीन-जापानी भाषाओं में मंदारिन सिनालिस, कैंटोनीज़, जापानी, कंबोडियन, इंडोनेशियाई और मलेशियाई भाषाएँ और बोलियाँ शामिल हैं।

मूल रूप से चार प्रकार की लिपि हैं - (1) इंडो-आर्यन, (2) रोमन, (3) सेमिटिक (अल्फा, बीटा, गामा, आदि  ग्रीक में, और  एलेफ, बेथ, गिमेल आदि हेब्रू में) और (4)चीनी या सचित्र लिपि। सबसे पुरानी लिपि का आविष्कार 6,000 साल पहले हुआ था और इसे "समलहापति" लिपि कहा जाता है। 1000 साल बाद खरोष्ठी का उदय हुआ। ब्राह्मी दाएँ से बाएँ और खरोष्ठी बाएँ से बाएँ लिखी जाती है।


इलाहाबाद और पूर्वी इलाहाबाद में कुथिला का प्रयोग होता था। राजस्थान, बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश, बंगाल, उड़ीसा और असम में ब्राह्मी लिपि का व्यापक रूप से उपयोग किया जाता था। सम्राट अशोक के पुराने शिलालेख कुथिला में लिखे गए थे। इलाहाबाद, ढाका, कलकत्ता, पटना आदि में मिले प्राचीन शिलालेख सभी कुथिला लिपि में लिखे गए हैं। बाद में, राजा हर्षवर्धन के बाद, इस लिपि को "श्री हर्ष लिपि" के रूप में जाना जाने लगा, जिन्होंने अपने  शिलालेखों या आधिकारिक मुहरों में कुथिला का इस्तेमाल किया था। वर्तमान बंगाली लिपि श्रीहर्ष लिपि है।

 

सारदा लिपि का उपयोग उत्तर-पश्चिमी भारत में किया जाता है जबकि नारदा या नागरी लिपि का उपयोग दक्षिण-पश्चिमी भारत में किया जाता है। नागरी लिपि में अक्षरों के ऊपर मात्रा या रेखा का प्रयोग नहीं किया गया है। जब ऐसी रेखा का प्रयोग किया जाता है तो उसे देवनागरी लिपि कहते हैं। कश्मीर और पंजाब के सारस्वत ब्राह्मण सारदा लिपि का उपयोग करते हैं, और गुजरात के नागर ब्राह्मण नागरी लिपि का उपयोग करते हैं। वर्तमान श्री हर्ष लिपि लगभग 1300 वर्ष पुरानी है और नागरी लिपि लगभग 300 वर्ष पुरानी है।


प्राचीन भारत में, वैदिक संस्कृत ने द्रविड़ और ऑस्ट्रिक भाषाओं को दबाने की कोशिश की, जैसे यूरोप में लैटिन ने अन्य सभी यूरोपीय भाषाओं को नष्ट करने की कोशिश की। मध्य पूर्व में, अरबी ने सभी फारसी भाषाओं को नष्ट करने की कोशिश की, और भारत में संस्कृत ने सभी प्राकृत भाषाओं को दबाने की कोशिश की। जब बुद्ध ने पाली में अपने दर्शन का प्रचार करना शुरू किया, तो संस्कृत के विद्वानों ने उन्हें संस्कृत का उपयोग करने की सलाह दी, लेकिन बुद्ध ने मना कर दिया। मध्यकालीन भारत में, कबीर ने अभिव्यक्ति के माध्यम के रूप में संस्कृत के उपयोग के खिलाफ विद्रोह किया। उन्होंने कहा:


'संस्कृत कूपोदका भाखा बहता नीरा'


अर्थात, संस्कृत कएँ में ठहरे हुए पानी की तरह है, जबकि लोगों की भाषाएँ ताजे, बहते पानी की तरह हैं।

 

बंगाल में, संस्कृत के विद्वानों ने बंगाली भाषा को दबाने की कोशिश की, लेकिन नवाब हुसैन शाह ने बंगाली भाषा के विकास के लिए हर तरह की मदद और प्रोत्साहन दिया। उस समय तक, रामायण, महाभारत और भगवद  गीता केवल संस्कृत में ही लिखी जाती थी। बाद में, कवि कृत्तिवास, काशीरामदास और मल्लधर बसु (गुण राजा खान) ने क्रमशः रामायण, महाभारत और भगवद  गीता का बंगाली में अनुवाद किया। संस्कृत के विद्वानों ने झूठी अफवाह फैलाना शुरू कर दिया कि नवाब हुसैन शाह हिंदू धर्म को नष्ट करने की साजिश कर रहे हैं क्योंकि हिंदुओं के पवित्र ग्रंथों का बंगाली में अनुवाद किया जा रहा है। उन्होंने कृतिवास ओझा पर सामाजिक प्रतिबंध लगाए और उन्हें हिंदू धर्म से बहिष्कृत कर दिया। यह लगभग 450 साल पहले हुआ था। हाल ही में, कनाडा और वेल्स में कुछ लोगों ने अंग्रेजी थोपने के खिलाफ विद्रोह किया क्योंकि वे अपनी भाषा को अभिव्यक्ति के माध्यम के रूप में इस्तेमाल करना चाहते थे। इसी तरह, आज भोजपुरी, मैथिली, मगही, छत्तीसगढ़ी, अंगिका, अवधी, बुंदेली, मारवाड़ी, कोंकनी और कई अन्य महत्वपूर्ण भारतीय भाषाओं को विभिन्न निहित स्वार्थों द्वारा दबाया जा रहा है।

 धर्म  

हर कोई एक ही धर्म (रिलिजन/धर्ममत) का पालन नहीं करता है, न ही धर्म (रिलिजन/धर्ममत) मानव समाज में एक समान कारक है। बल्कि, स्थिति इसके विपरीत है, और बहुत बार यह मानव समाज को विभाजित करता है। रिलिजन/धर्ममत के लिए अरबी शब्द है मज़हब, जबकि व्युत्पत्ति के अर्थ में धर्म का अर्थ है "विशेषता" या "संपत्ति"। वास्तव में, यदि धर्म को सही अर्थों में समझा जाए, तो वह एक है और पूरी मानव जाति के लिए अविभाज्य है। धर्म एक मनो-आध्यात्मिक संकाय है। यह धीरे-धीरे मानव हृदय के सुषुप्त दिव्य गुणों को सामने लाता है, और मनुष्य को सर्वोच्च सत्ता के साथ एक होने में मदद करता है। इसका भौतिक वस्तुओं से कोई लेना-देना नहीं है। दूसरी ओर, रिलिजन/धर्ममत एक मनो-भावनात्मक कारक है। यह भौतिक और कर्मकांडों का एक संग्रह है। कई रिलिजन/धर्ममत हो सकते हैं, लेकिन धर्म एक है।

 


रिलिजन/धर्ममत हमेशा विभिन्न कर्मकांडों का पालन करते हैं जैसे कि एक विशेष तरीके से दीपक जलाना, एक निर्दिष्ट तरीके से मोमबत्तियां पकड़ना, एक तरह से बैठना या दूसरे तरह से खड़े होना,  एक निश्चित संख्या में माला के मनके गिनना आदि; केवल स्वीकृत लोगों द्वारा विशेष देवताओं की पूजा की जाती है, निश्चित दक्षिणा (शुल्क) ली जाती है, या देवताओं को निर्धारित जानवरों की बलि/कुर्बानी दी जाती है, एक विशेष तरीके से पूजा का स्थान तैयार किया जाता है आदि-आदि। ऐसे अनुष्ठानों का पालन करते हुए, मन कर्मकांडों और भौतिक वस्तुओं में तल्लीन रहता है, तो वह एक आदर्शात्मक प्रवाह में एक भक्तिमय लक्ष्य की ओर कैसे बढ़ सकता है? जो लोग एक विशेष मज़हब (इस्लाम) का पालन करते हैं, उनसे एक निश्चित संख्या में घुटने टेककर खड़े होने की अपेक्षा की जाती है, इसलिए स्वाभाविक रूप से वे हमेशा अपने उठने-बैठने के क्रम को गिन रहे होते हैं, फलस्वरूप उनका मन शारीरिक गतिविधियों और बाहरी गतिविधियों में लगा रहता है।  

कुछ लोग हैं जो दृढ़ता से मानते हैं कि केवल मंदिर ही पवित्र स्थान हैं,जबकि मस्जिद, चर्च और सिनेगोग (यहूदी उपासनागृह) पवित्र नहीं हैं। लेकिन ईंटें, पत्थर, गारा आदि पवित्र या अपवित्र कैसे हो सकते हैं? वे केवल भौतिक वस्तुएँ हैं। कुछ धर्ममतों के अनुयायी खुद को ईश्वर के चुने हुए शिष्यों के रूप में देखते हैं, और दूसरों को नास्तिक या काफिरों के रूप में देखते हैं।  मंदिरों के निर्माण के लिए नियोजित अधिकांश राजमिस्त्री और बढ़ई दूसरे धर्मों के होते हैं, फिर भी एक बार मंदिर बनने के बाद, मंदिर को पवित्र घोषित कर दिया जाता है, भले ही उसे किसने भी बनाया हो।  




धर्ममत बाहरी कर्मकांडों पर आधारित होते हैं, इसलिए वे भौतिक वस्तुओं को लेकर व्यस्त रहते हैं। कालांतर में ये भौतिक वस्तुएँ ही उनके ध्यान की वस्तु बन जाती हैं। गाय का ही उदाहरण लें। गायों को हिंदुओं द्वारा पवित्र माना जाता है क्योंकि वे दूध देती हैं। अब अगर इसी वजह से गायों को पवित्र माना जाता है, तो उन भैंसों का क्या जो ज्यादा दूध देती हैं? उन्हें गायों से अधिक पवित्र माना जाना चाहिए। धार्मिक हठधर्मिता के अनुयायी ऐसे मुद्दों पर चर्चा करना पसंद नहीं करते हैं। धर्ममत या रिलिजन के बारे में चिंतन करते रहने के फलस्वरूप मनुष्य का मन निष्क्रिय या जड़ हो जाता है। कोई भी बौद्धिक चर्चा उन्हें मानसिक जड़ता से निकाल नहीं पाती। बचपन से ही मनुष्य को तर्कहीन विचार सिखाए जाते हैं, इसलिए जब वे बड़े हो जाते हैं तो उनकी धारणाओं को दूर करना बेहद मुश्किल हो जाता है। उदाहरण के लिए, विज्ञान के जानकार छात्र जानते हैं कि सूर्य या चंद्र ग्रहण वैज्ञानिक कारकों के कारण होता है और इसका पौराणिक राक्षसों - राहु और केतु - से कोई लेना-देना नहीं है। लेकिन फिर भी, अपने अंतर्निहित संस्कारों के कारण, वे गंगा में जाते हैं और पवित्र स्नान करते हैं। क्या यह उनके धर्ममत की मान्यताओं के कारण नहीं है, जो उनके मन में गहराई से जड़ जमा चुकी हैं?

 

जब लोगों के विचार इतने स्थिर हो जाते हैं कि वे किसी भी चर्चा या तर्क को स्वीकार नहीं करते हैं, तो इसे "कट्टरता" कहा जाता है। कहा जाता है कि यह धार्मिक आस्था का प्रश्न है, तर्क का नहीं। भारत में, कई धार्मिक कट्टरपंथी हैं। धार्मिक कट्टरता और हठधर्मिता के कारण अतीत में असंख्य हिंसक झड़पें हो चुकी हैं। यह कितना घिनौनी  बात है कि एक बाल के नाम पर हज़ारों लोगों की हत्या कर दी गई! इन [इस्लामिक] कट्टरपंथियों ने कभी भी दूसरों के विश्वासों या विचारों को सुनने की जहमत नहीं उठाई, बल्कि उनके लिए दूसरों को सुनना भी पाप है। एक मायने में वे जानवरों से भी बदतर हैं, क्योंकि जानवरों में कोई सांप्रदायिक भावना नहीं होती है। ऐसे धार्मिक भावों में शारीरिक या भौतिक भावनाएँ प्रबल होती हैं। लोगों को धर्ममत या रिलिजन के बंधनों से दूर रहना चाहिए। सभी धार्मिक हठधर्मिता के पीछे, भौतिक विचार प्रमुख हैं। एक समुदाय गोमाँस खाना पाप मानता है, लेकिन बकरी या हिरण नहीं। इसी तरह, भारतीय महिलाओं द्वारा सिर और माथे पर सिंदूर का निशान लगाने की प्रथा धार्मिक भावना की अभिव्यक्ति है, जबकि अन्य देशों की महिलाएँ इस प्रथा का पालन नहीं करती हैं। भारतीय महिलाएँ अगर सिंदूर का इस्तेमाल बंद कर दें, तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। इस तरह, सभी धर्ममत धार्मिक भावनाओं को भड़काकर लोगों का शोषण करते हैं।

 

ऐसे कई लोग हैं जो विशेष शास्त्रों की पूजा करते हैं। इस बात की अधिक संभावना है कि अन्य धर्मों के अनुयायियों ने इन धर्मग्रंथों की छपाई की हो और उन पर जिल्द चढ़ाई हो। लेकिन जब ये पुस्तकें शास्त्र के रूप में प्रकाशित होतीं हैं, तो हिंदू इसे देवी सरस्वती के रूप में मानते हैं। बहुत से लोग ऐसे होते हैं जो मूर्तियों के निर्माण के लिए बहुत सा पैसा खर्च करते हैं, फिर एक-दो दिन बाद खूब धूमधाम से एक जुलूस निकाल कर उस मूर्ति को नदी में विसर्जित कर देते हैं। यदि किसी अन्य धर्ममत (रिलिजन) का सदस्य गलती से मूर्ति के किसी हिस्से को गलती से भी नुकसान पहुँचा दे, तो इसके बहुत गंभीर परिणाम हो सकते हैं।


कट्टरता तब होती है जब भौतिक या लौकिक बातों का पलड़ा तर्कसंगतता से अधिक भारी हो जाता है। धार्मिक कट्टरता तब होती है जब कट्टरता किसी विशेष रिलिजन/धर्ममत पर केंद्रित होती है। धार्मिक कट्टरपंथियों को सही रास्ते पर लाने के लिए बल प्रयोग के बजाय एक शक्तिशाली बौद्धिक अपील की आवश्यकता है, क्योंकि बल केवल एक प्रतिक्रिया पैदा करेगा जो धार्मिक कट्टरता को सशक्त करेगा।


कुछ प्रथाएँ मूल रूप से धार्मिक अनुष्ठान नहीं थीं, बल्कि परंपराएँ या रीति-रिवाज थे। बहुत पहले यहूदियों ने खतना करना शुरू कर दिया था। जब मूसा ने अपने कुछ समकालीनों को यहूदी धर्म में परिवर्तित किया, और बाद में जब मोहम्मद ने कुछ स्थानीय लोगों को इस्लाम में परिवर्तित किया, तो इन दोनों  पैगंबरों में से किसी ने भी अपने नए अनुयायियों को पुराने रीति-रिवाजों को त्यागने का निर्देश देने की हिम्मत नही की, फलस्वरूप पुराने रीति-रिवाज उनके रूपांतरण के बाद भी जारी रहे। इसी तरह, प्राचीन समय में, ऑस्ट्रिक लोग सूर्य देवता की पूजा करते थे क्योंकि उनका मानना ​​था कि अगर सूर्य को संतुष्ट किया गया, तो यह प्रचुर मात्रा में अपनी किरणें भेजेगा औरखूब फसल पैदा करेगा; ऑस्ट्रिक समाज में महिलाओं की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका है, फलस्वरूप पुजारियों की भूमिका इतनी महत्वपूर्ण नहीं है। ऑस्ट्रिक्स का मानना ​​​​था कि सूर्य एक महिला देवता है और चंद्रमा एक पुरुष देवता, इसलिए उन्होंने सूर्य को माता के रूप में संबोधित किया। उन्होंने छठ पूजा की शुरुआत की, जो सूर्य देवी की पूजा है। पुराने समय में, लोग साल में केवल एक बार सूर्य देवी की पूजा करते थे, लेकिन मगध में दो प्रमुख फसल के दौरान इसकी दो बार पूजा की जाती है। मगध के निवासियों के बीच छठ पूजा की परंपरा इतनी मजबूत हो गई कि आर्यों, बौद्धों और मुसलमानों के भारी प्रभाव के बावजूद, छठ पूजा की प्रथा अपरिवर्तित रही। मगध के कुछ इलाकों में आज भी मुसलमान सूर्य देवी की पूजा करते हैं। कहीं वे स्वयं पूजा करते हैं, तो कहीं हिंदुओं से करवाते हैं। इसी तरह, बंगाल में मुसलमान सत्य नारायण और ओलाबीबी देवताओं की पूजा करते हैं। ये पारंपरिक मान्यताओं की अभिव्यक्ति हैं जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तांतरित होती रही हैं।



धार्मिक कट्टरता का मुकाबला करने का एकमात्र तरीका है तार्किक तरंग को मजबूत करना है। विज्ञान के अध्ययन से हम जानते हैं कि ग्रहण एक भौतिक घटना है। राहु और केतु देवताओं का इससे कोई लेना-देना नहीं है। यद्यपि इस प्रकार की अंधविश्वासी मान्यता निस्संदेह कम हो रही है, किन्तु कुछ लोग अभी भी पौराणिक देवताओं की पूजा करते हैं क्योंकि उनका मानना ​​है कि देवताओं को सूर्य और चंद्रमा को ग्रहण से मुक्त करने के लिए प्रसन्न किया जा सकता है। कारण यह है कि मनुष्य में भय मनोविकृति तर्क से अधिक प्रबल होती है। जब मानवीय तर्कशक्ति मजबूत होगी, तो समाज से तर्कहीन विचार गायब हो जाएँगे।


बहुत से लोग आज धार्मिक राज्यों (धर्मराष्ट्र) के गठन की वकालत करते हैं। लेकिन जब वे  धार्मिक राज्य शब्द का प्रयोग करते हैं, तो उनका अर्थ  रिलिजन या धर्ममत आधारित राज्यों से है, न कि ऐसे राज्य से जो अच्छाई [सच्चाई, दिव्यता] की रक्षा करता हो। हमें ऐसे राज्य स्थापित करने का प्रयास करना चाहिए जो धर्म को उसके वास्तविक [सार्वभौमिक] स्वरुप में स्थापित करे, और इसके लिए भौतिक/लौकिक भावनाओं को जो कि धर्म (रिलिजन/धर्ममत) का आधार हैं, उनकी उपेक्षा की जानी चाहिए। लोगों को हठधर्मी [भावजड़ता-आधारित] धार्मिक विचारों से दूर रहना चाहिए। कुछ लोग चंद्रमा से संबंधित धार्मिक अनुष्ठान करते हैं - चंद्रमा को देखने के बाद, वे अपनी धार्मिक तपस्या शुरू करते हैं। लेकिन उनका क्या होगा जो [भविष्य में] चाँद पर ही रहेंगे। तर्कसंगत सोच मानव मन से भय मनोविकृति को दूर करेगी - तर्कसंगतता कट्टरता को हरा देगी।

 

भारत में आर्यों ने आस्ट्रिक धर्म को नष्ट कर वैदिक धर्म की स्थापना करने का प्रयास किया। बौद्ध काल में, विशेष रूप से मगध के राजा बिम्बिसार के शासनकाल के दौरान, बौद्ध धर्म गैर-बौद्धों पर थोपा गया था। बाद में, हिंदुओं ने बौद्धों और जैनियों को जबरन हिंदू धर्म में परिवर्तित कर दिया। मुस्लिम काल के दौरान, इस्लामी शासकों ने भारत, ईरान और मिस्र में जबरन इस्लाम लागू किया।  समकालीन मिस्र अरब सभ्यता और इस्लामी धर्म का मिश्रण है। इसी तरह, अनगिनत यहूदियों को जबरन ईसाई बनाया गया। भारत में, ब्रिटिश शासन के दौरान, ईसाइयों ने बहुत ही मनोवैज्ञानिक तरीके से ईसाई धर्म का प्रचार किया, फलस्वरूप हजारों हिंदू ईसाई बन गए। अंग्रेजों के भारत आने से पहले देश में शायद ही कोई ईसाई था। मुस्लिम काल में, कई हिंदुओं को मनोवैज्ञानिक दबाव और शारीरिक बल द्वारा इस्लाम में परिवर्तित किया गया था। इसके अलावा, कई हिंदुओं ने इस्लाम धर्म ग्रहण किया क्योंकि वे हिंदू धर्म में दोषों से घृणा करते थे। उस समय, गंभीर धार्मिक उथल-पुथल के साथ-साथ अत्यधिक सामाजिक विषमता भी थी, और परिणामस्वरूप कई लोगों ने इस्लाम की ओर रुख किया। आज भी कुछ ईसाई मिशनरी लोगों के शैक्षिक पिछड़ेपन, अंधविश्वास और गरीबी का फायदा उठाकर लोगों को ईसाई धर्म में परिवर्तित कर रहे हैं। मध्ययुगीन धर्मयुद्ध भी एक धर्म का दूसरे धर्म द्वारा दमन का ज्वलंत उदाहरण हैं। 

(जनवरी 1970, आरयू, पटना,  कणिका में प्रउत -21 )



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