मनो-आर्थिक शोषण का मुकाबला कैसे करें ?



- श्री प्रभात रंजन सरकार 

मनो-आर्थिक शोषण खतरनाक और सर्वभक्षी पूंजीवादी शोषण का नवीनतम रूप है। यह एक विशेष प्रकार का शोषण है जो पहले लोगों को विभिन्न तरीकों से मानसिक रूप से कमजोर और पंगु बना देता है, और फिर आर्थिक रूप से उनका शोषण करता है। मनो-आर्थिक शोषण निम्नलिखित ढंग से कार्य करता है :

१. पहला, स्थानीय लोगों की स्वदेशी भाषा और संस्कृति का दमन; 
२. दूसरे, छद्म संस्कृति का व्यापक प्रसार; अश्लील साहित्य द्वारा लोगों के मन को कलुषित करता है और युवाओं की जीवनी शक्ति को कमजोर करता है; 
३. तीसरा, महिलाओं पर कई प्रतिबंध लगाना, उन्हें आर्थिक रूप से पुरुषों पर निर्भर होने के लिए मजबूर करना; 
४. निहित स्वार्थी तत्त्वों द्वारा बार-बार राजनीतिक हस्तक्षेप के साथ एक गैर-मनोवैज्ञानिक शिक्षा प्रणाली की स्थापना ; 
५. पाँचवाँ, धर्मनिरपेक्षता के नाम पर वास्तविक धर्म की उपेक्षा; 
६. छठा, मानव समाज को कई जातियों और समूहों में  खंडित करना ; 
७. सातवाँ, जन्म नियंत्रण के अप्राकृतिक और हानिकारक तरीकों के इस्तेमाल से समाज को नुकसान पहुँचाना; 
८. और आठवाँ, अखबारों, रेडियो और टेलीविजन जैसे विभिन्न जनसंचार माध्यमों का नियंत्रण पूंजीपतियों के हाथों में देना। 

बौद्धिक शोषण और मनो-आर्थिक शोषण आज पूरी मानवता के लिए बड़ा खतरा हैं।

बौद्धिक शोषण और मनो-आर्थिक शोषण आज पूरी मानवता के लिए बड़ा खतरा हैं। इस खतरे का मुकाबला करने के लिए व बुद्धि की मुक्ति के लिए एक शक्तिशाली लोकप्रिय भावना तुरंत उत्पन्न की जानी चाहिए। इसके लिए सबसे पहली आवश्यकता यह है कि समाज के बुद्धिजीवी अपनी बुद्धि को शुद्ध और निष्कलंक रखें। उन्हें अपनी जड़ता और पूर्वाग्रही धारणाओं को दरकिनार करते हुए आम लोगों के स्तर के साथ तालमेल बिठाना होगा। उन्हें जनता के विकाश में सहायता करनी चाहिए और सभी शोषण-विरोधी आंदोलनों को अपना समर्थन देना चाहिए। यह दृष्टिकोण यह सुनिश्चित करेगा कि शोषण जड़ से खत्म हो, सामाजिक संरचना स्थिर हो और मानव मन के बौद्धिक क्षितिज का विस्तार हो। अगर मानवता ऐसे ही रास्ते पर चले तो मानव समाज तेज कदमों के साथ एक शानदार भविष्य की ओर अग्रसर होगा।

(स्त्रोत : ए फ्यू प्रॉब्लमज सॉल्वड - 9 )

चित्र: इंटरनेट से 

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